चीनी और प्याज की कमी और कीमतों में तेज उछाल ने मोदी सरकार के सामने नई मुश्किल खड़ी कर दी है। हालांकि सरकार अपने स्तर पर समाधान के लिए लगातार प्रयास कर रही है और जल्द राहत मिलने की संभावना जता रही है, लेकिन विपक्ष ने आगामी त्योहारी मौसम में चीनी और प्याज की कमी को लेकर सरकार पर निशाना साध दिया है और उस पर महंगाई बढ़ाने का आरोप लगाया है। आम उपभोक्ता के लिए परेशानी यह है कि रसोई की दो अहम चीजें यानि चीनी और प्याज लगातार महंगी हो रही हैं, जबकि सरकार का दावा है कि वास्तविक कमी नहीं, बल्कि आपूर्ति व्यवस्था, जमाखोरी और सट्टेबाजी जैसे कारक कीमतों को असामान्य रूप से ऊपर ले जा रहे हैं।
प्याज के मोर्चे पर स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक हो गई है। 24 अगस्त को देश में प्याज की औसत खुदरा कीमत सालाना आधार पर 59 प्रतिशत बढ़कर 43.53 रुपये प्रति किलो पहुंच गई, जबकि एक साल पहले यह 27.37 रुपये थी। औसत थोक कीमत भी 68 प्रतिशत उछलकर 35.58 रुपये प्रति किलो हो गई। बड़े शहरों में स्थिति और भी तीखी है। चेन्नई में प्याज 60 रुपये, दिल्ली में 55 रुपये और कोलकाता में 53 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है।
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जम्मू में तो खुदरा कीमत 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की खबर है, जबकि नरवाल मंडी में थोक भाव करीब 50 रुपये प्रति किलो रहा। व्यापारियों का कहना है कि बारिश से फसल को नुकसान और ईरान, अफगानिस्तान तथा मिस्र से आपूर्ति में कमी ने बाजार पर दबाव बढ़ाया है। उनका अनुमान है कि कीमतें अगले तीन महीने तक ऊंची रह सकती हैं, हालांकि नई घरेलू फसल आने के बाद दीपावली तक कुछ राहत मिलने की उम्मीद है।
कीमतों की इस आग को बुझाने के लिए केंद्र सरकार ने अब अपने बफर स्टॉक का सहारा लिया है। महाराष्ट्र के नासिक से बड़े उपभोक्ता केंद्रों तक विशेष रेलवे रेक के जरिए भारी मात्रा में प्याज भेजा जा रहा है। इस पहल को ‘कांदा एक्सप्रेस’ नाम दिया गया है। शुरुआती चरण में चेन्नई, मदुरै, दिल्ली, एर्नाकुलम और गुवाहाटी को प्याज की आपूर्ति की जाएगी। बाजार की जरूरत के आधार पर बाद में अन्य शहरों को भी इसमें शामिल किया जाएगा।
केंद्र सरकार ने यह भी तय किया है कि NCCF और NAFED जैसी एजेंसियों के जरिए प्याज 35 रुपये प्रति किलो की दर से उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराया जाएगा। दिल्ली-एनसीआर में NCCF अपने रिटेल आउटलेट्स और भारत ब्रांड स्टोर्स के माध्यम से इस दर पर बिक्री शुरू करने की तैयारी में है। उम्मीद है कि नासिक से विशेष रेलगाड़ियों के पहुंचते ही सब्सिडी वाले प्याज की आपूर्ति शुरू हो जाएगी।
इस बीच, कंज्यूमर अफेयर्स सेक्रेटरी निधि खरे ने कीमतों के असामान्य व्यवहार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि नासिक में मंडी भाव का दिल्ली से अधिक होना सामान्य स्थिति नहीं है। इससे कार्टेलाइजेशन और सट्टेबाजी की आशंका पैदा होती है। सरकार के पास चालू वर्ष के लिए 1.21 लाख टन प्याज का बफर स्टॉक है और उसका दावा है कि जरूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप के लिए यह पर्याप्त है।
साथ ही सरकार उत्पादन के मोर्चे पर भी राहत की तस्वीर पेश कर रही है। 2025-26 में प्याज का अनुमानित उत्पादन 307.37 लाख टन है, जो पिछले वर्ष के 307.67 लाख टन के लगभग बराबर है। यानी उत्पादन में कोई बड़ी गिरावट नहीं दिख रही। यही वजह है कि सरकार का मानना है कि बफर स्टॉक और सक्रिय बाजार हस्तक्षेप के जरिए मौसमी महंगाई पर काबू पाया जा सकता है।
‘कांदा एक्सप्रेस’ का विस्तार भी सरकार की बड़ी रणनीति का हिस्सा है। 2024-25 में जहां 14 रेलवे रेक के जरिए करीब 12,000 टन प्याज पांच शहरों तक भेजा गया था, वहीं 2025-26 में यह व्यवस्था बढ़कर 86 रेक और करीब 88,000 टन तक पहुंच गई है। अब देश के 16 प्रमुख शहरों तक प्याज पहुंचाने की तैयारी है।
उधर, चीनी के मामले में भी तस्वीर कम चिंताजनक नहीं है। देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत एक महीने में करीब 29 प्रतिशत बढ़कर 63 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई, जबकि एक महीने पहले यह 48.7 रुपये प्रति किलो थी। लेकिन चीनी उद्योग की शीर्ष संस्था इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) का दावा है कि देश में चीनी की वास्तविक कमी नहीं है और कीमतों में तेजी प्राकृतिक नहीं, बल्कि जमाखोरी तथा सट्टेबाजी से पैदा हुई है।
ISMA के अनुसार, कुछ व्यापारियों ने बाजार में कमी का माहौल बनाया, जिसके बाद सामान्यतः जरूरत के हिसाब से खरीद करने वाले बड़े उपभोक्ताओं ने डेढ़ से दो महीने का अतिरिक्त स्टॉक जमा करना शुरू कर दिया। इससे चीनी बाजार से निकलकर गोदामों में पहुंच गई और कृत्रिम तंगी पैदा हो गई। हालांकि कम उत्पादन, मौसम की प्रतिकूलता और फसल पर कीटों के असर जैसे कारकों ने भी कीमतों पर दबाव डाला है।
चीनी को एथेनॉल उत्पादन में मोड़े जाने को लेकर उठ रहे सवालों को भी उद्योग ने खारिज किया है। उसका कहना है कि अक्टूबर 2025 से सितंबर 2026 के एथेनॉल आपूर्ति वर्ष में कुल 1,200 करोड़ लीटर एथेनॉल में से केवल 290 करोड़ लीटर ही चीनी से तैयार हुआ। घरेलू जरूरत और पर्याप्त शुरुआती स्टॉक सुनिश्चित करने के बाद ही एथेनॉल के लिए चीनी के उपयोग का फैसला किया जाता है।
चीनी उद्योग को सितंबर के अंत तक करीब 35 लाख टन का क्लोजिंग स्टॉक रहने की उम्मीद है, जिसे सामान्य घरेलू मांग के लिए स्वस्थ बफर माना जा रहा है। सरकार की ड्यूटी-फ्री आयात व्यवस्था, स्टॉक रखने की सीमा सख्त करने, विशेष क्रशिंग और नए सीजन की जल्दी शुरुआत जैसे कदमों से भी आपूर्ति बढ़ने और कीमतों पर अंकुश लगने की उम्मीद है।
लेकिन सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि उत्पादन संतोषजनक है, बफर स्टॉक पर्याप्त है और वास्तविक कमी नहीं है, तो आम उपभोक्ता को 60-70 रुपये किलो प्याज और 63 रुपये किलो चीनी क्यों खरीदनी पड़ रही है? विपक्ष ने इसी सवाल को हथियार बनाते हुए सरकार पर त्योहारी मौसम से पहले महंगाई को नियंत्रित करने में विफल रहने का आरोप लगाया है। अब सरकार के सामने सिर्फ स्टॉक जारी करना ही चुनौती नहीं है, बल्कि यह साबित करना भी है कि ‘कृत्रिम कमी’ पैदा करने वालों पर कार्रवाई होगी और राहत का फायदा वास्तव में आम रसोई तक पहुंचेगा। आने वाले दिनों में कांदा एक्सप्रेस और चीनी बाजार में सरकारी हस्तक्षेप की सफलता ही तय करेगी कि त्योहारी मौसम में महंगाई की मार कितनी कम होती है।

