रोहतास जिले के ऐतिहासिक रोहतासगढ़ किला परिसर में मौजूद अति प्राचीन करम वृक्षों के संरक्षण का कार्य शुरू कर दिया गया है। कैमूर पहाड़ी पर स्थित इस किले तक रोहतास प्रखंड मुख्यालय से पहुंचने में कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। संरक्षण अभियान के तहत कृषि विभाग की एक टीम ने किला परिसर का दौरा किया। टीम ने प्राचीन वृक्षों की स्थिति का जायजा लिया और उनके तने, जड़ों तथा आसपास की मिट्टी की बारीकी से जांच की। जड़ों की वास्तविक स्थिति और उनकी सेहत का पता लगाने के लिए पेड़ों के आसपास की जमीन की खुदाई भी की गई। वृक्षों का दीर्घकालिक संरक्षण उदेश्य जांच के बाद वृक्षों की जड़ों के पास आवश्यक दवाइयां और पोषक तत्व डाले गए। इस पहल का उद्देश्य वृक्षों को मजबूती प्रदान करना और उनके दीर्घकालिक संरक्षण को सुनिश्चित करना है। ऐतिहासिक रोहतासगढ़ किला अपनी स्थापत्य कला और गौरवशाली इतिहास के साथ-साथ प्राचीन पेड़-पौधों के लिए भी प्रसिद्ध है। ऐसे में करम वृक्षों का संरक्षण प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। स्थानीय लोगों ने भी इस पहल की सराहना की है। आदिवासी समाज द्वारा हर वर्ष इन पेड़ों की पूजा भी की जाती है। रोहतास जिले के ऐतिहासिक रोहतासगढ़ किला परिसर में मौजूद अति प्राचीन करम वृक्षों के संरक्षण का कार्य शुरू कर दिया गया है। कैमूर पहाड़ी पर स्थित इस किले तक रोहतास प्रखंड मुख्यालय से पहुंचने में कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। संरक्षण अभियान के तहत कृषि विभाग की एक टीम ने किला परिसर का दौरा किया। टीम ने प्राचीन वृक्षों की स्थिति का जायजा लिया और उनके तने, जड़ों तथा आसपास की मिट्टी की बारीकी से जांच की। जड़ों की वास्तविक स्थिति और उनकी सेहत का पता लगाने के लिए पेड़ों के आसपास की जमीन की खुदाई भी की गई। वृक्षों का दीर्घकालिक संरक्षण उदेश्य जांच के बाद वृक्षों की जड़ों के पास आवश्यक दवाइयां और पोषक तत्व डाले गए। इस पहल का उद्देश्य वृक्षों को मजबूती प्रदान करना और उनके दीर्घकालिक संरक्षण को सुनिश्चित करना है। ऐतिहासिक रोहतासगढ़ किला अपनी स्थापत्य कला और गौरवशाली इतिहास के साथ-साथ प्राचीन पेड़-पौधों के लिए भी प्रसिद्ध है। ऐसे में करम वृक्षों का संरक्षण प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। स्थानीय लोगों ने भी इस पहल की सराहना की है। आदिवासी समाज द्वारा हर वर्ष इन पेड़ों की पूजा भी की जाती है।

