छत्तीसगढ़, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की सीमाओं को जोड़ने वाली कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों का इलाका कभी नक्सलियों के लिए सबसे सुरक्षित ठिकानों में गिना जाता था। इसे नक्सलियों का ‘ब्लैक फॉरेस्ट’ कहा जाता था। पहाड़, घना जंगल और 3 राज्यों की सीमाओं से इसकी नजदीकी ने इसे नक्सलियों के लिए ऐसा रास्ता बना दिया था, जहां से वे एक राज्य से दूसरे राज्य तक आसानी से आवाजाही कर सकते थे। इसी कर्रेगुट्टा की छत्तीसगढ़ की तरफ तलहटी में एक गांव था, ताड़पाला। कभी यहां ग्रामीणों की झोपड़ियां थीं। लोग खेती-किसानी और जंगल से मिलने वाली चीजों के सहारे रहते थे। आसपास के बाजारों में जाकर अपनी बनाई चीजें बेचते थे, लेकिन नक्सलवाद के बढ़ते प्रभाव ने इस गांव की तस्वीर बदल दी। नक्सली आए और गांव खाली हो गया। एक-एक कर ग्रामीणों को गांव छोड़ना पड़ा। घरों में ताले नहीं लगे, क्योंकि वहां बचा ही कुछ नहीं। झोपड़ियां खाली हो गईं और धीरे-धीरे पूरा गांव वीरान हो गया। इसके बाद इस इलाके में ग्रामीणों की जगह नक्सलियों ने ले ली। ग्रामीण मानो कहीं गायब हो गए, जिनका कोई रिकॉर्ड तक नहीं है। वहीं, नक्सलियों के खात्मे के बाद अब यहां सुरक्षा बलों के जवानों का डेरा है। समय के साथ इस गांव की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। पढ़िए यह रिपोर्ट… जिस रास्ते से ग्रामीण बाजार जाते थे, वहीं नक्सलियों का कॉरिडोर बन गया स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, 1990 के दशक के मध्य तक ताड़पाला में लोग रहते थे। यह बीजापुर जिले के पुजारी कांकेर गांव का आश्रित गांव है। ताड़पाला समेत आसपास के गांवों के ग्रामीण इसी रास्ते से बाजार आते-जाते थे। उस समय मोबाइल और नेटवर्क जैसी सुविधाएं नहीं थीं। गांवों के बीच संपर्क भी बेहद सीमित था। ऐसे में जो ग्रामीण यहां से चले गए, वे कहां गए और वापस क्यों नहीं लौटे, इसकी पूरी जानकारी आज भी किसी के पास नहीं है। पुजारी कांकेर गांव के रहने वाले ग्रामीण सड़वाली गौतुल ने बताया कि 1995-96 तक ताड़पाला में लोग रहते थे। ग्रामीण बाजार जाने के लिए इसी रास्ते का इस्तेमाल करते थे। वे जंगल से झाड़ू और अन्य सामान बनाकर बाजार में बेचते थे। इसके बाद क्षेत्र में नक्सलियों का प्रभाव बढ़ा और गांव धीरे-धीरे खाली हो गया। जो रास्ता कभी ग्रामीणों की आवाजाही का जरिया था, वही बाद में नक्सलियों के लिए तीन राज्यों के बीच आने-जाने का कॉरिडोर बन गया। बीजापुर कलेक्टर विश्वदीप कुमार ने बताया कि ताड़पाला गांव फिलहाल वीरान है। यह दो राज्यों की सीमा पर स्थित है। जिस हिस्से में सुरक्षा कैंप बनाया गया है, वह बीजापुर जिले के क्षेत्र में आता है, जबकि इसका बड़ा हिस्सा तेलंगाना में है। इसी वजह से गांव के लोगों से जुड़ा कोई स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। उन्होंने बताया कि ताड़पाला पुजारी कांकेर गांव का ही एक हिस्सा है। तेलंगाना-आंध्र प्रदेश के नक्सलियों के लिए सुरक्षित रास्ता कर्रेगुट्टा की भौगोलिक स्थिति नक्सलियों के लिए बेहद अहम थी। पहाड़ी के दूसरी तरफ तेलंगाना की सीमा नजदीक है और आंध्र प्रदेश का इलाका भी बहुत दूर नहीं है। यही वजह थी कि आंध्र और तेलंगाना क्षेत्र के नक्सली भी इस इलाके का इस्तेमाल करते थे। पहाड़ी और जंगल की आड़ में बैठकर नक्सलियों ने बस्तर के अंदर अपना नेटवर्क मजबूत किया। आसपास के गांवों पर प्रभाव बढ़ाया और पूरे इलाके को अपने कब्जे में लिया। यहां नक्सलियों की बटालियन की मौजूदगी रही। बड़े कैडर के नक्सली कमांडर भी इसी इलाके में सक्रिय रहे। हिड़मा, दामोदर, आजाद समेत कई बड़े नक्सलियों का ये ठिकाना था। नक्सलियों ने इस इलाके को सिर्फ छिपने के लिए इस्तेमाल नहीं किया था, बल्कि इसे अपनी राजधानी बना दिया था। यहीं से उनकी माओवाद सरकार ऑपरेट होती थी। पोलित ब्यूरो मेंबर, सेंट्रल कमेटी जैसे बड़े कैडर्स के नक्सली यहीं से प्लानिंग बनाते थे। यहां हथियार और IED तैयार करने से लेकर उन्हें बस्तर के अलग-अलग इलाकों तक पहुंचाने का नेटवर्क भी बनाया गया। हजारों IED बनाने का दावा सुरक्षा बलों के मुताबिक, कर्रेगुट्टा का यह इलाका नक्सलियों के लिए हथियार और विस्फोटक तैयार करने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण रहा। यहां बड़ी संख्या में IED तैयार की गईं और फिर बस्तर के अलग-अलग हिस्सों में भेजी गईं। यही वजह रही कि इस पूरे इलाके में सुरक्षा बलों के लिए कदम रखना आसान नहीं था। जंगल और पहाड़ी के साथ सबसे बड़ा खतरा IED का था। नक्सलियों ने गांव खाली कराया और उसके बाद जिस इलाके में कभी ग्रामीण रहते थे, उसी इलाके को अपने सुरक्षित क्षेत्र में बदल दिया। ताड़पाला इलाके में भी नक्सलियों ने भारी संख्या में IED प्लांट कर रखी हुई थी। कई को फोर्स ने बरामद किया। आज भी IED की तलाश जारी है। सरकारी रिकॉर्ड में गांव की पूरी तस्वीर नहीं छत्तीसगढ़ राज्य का गठन के बाद भी कर्रेगुट्टा की तलहटी का यह इलाका लंबे समय तक प्रशासन और आम लोगों की पहुंच से बाहर रहा। यहां तक कि इलाके का पूरा सर्वे भी नहीं हो पाया था। प्रशासनिक रिकॉर्ड में भी इस गांव और यहां रहने वाले परिवारों की पूरी तस्वीर स्पष्ट नहीं है। नक्सलियों का ऐसा दबदबा था कि सरकारी अमला यहां कभी पहुंच ही नहीं पाया था। यानी राज्य बनने के बाद भी राज्य की पहुंच इस इलाके तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाई थी। 2025 में सुरक्षा बल पहुंचे, अब गांव में सिर्फ कैंप लंबे समय तक नक्सलियों के कब्जे में रहे इस इलाके में साल 2025 में सुरक्षा बलों ने कैंप स्थापित किया। इसके बाद पहली बार इलाके में सुरक्षा बलों की स्थायी मौजूदगी बनी। पहाड़ के नीचे ताड़पाला में CRPF ने एक बेस कैंप बनाया। वहीं 7 किमी पहाड़ी के ऊपर दूसरा कैंप स्थापित किया। आज ताड़पाला में अगर कुछ है तो वह सुरक्षा बलों का कैंप है, पर ग्रामीण नहीं हैं। यहां सिर्फ वर्दी में जवान नजर आते हैं, कोई ग्रामीण नहीं। गांव के आसपास कुछ डेरे दिखाई दिए, लेकिन वे ग्रामीणों के घर नहीं थे। यहां बन रही सड़क में काम करने वाले मजदूरों के डेरे थे, जो बस्तर के बाहर जिले के रहने वाले हैं। पुराने ग्रामीण घरों की जगह अब जंगल और सुरक्षा बलों की मौजूदगी है। हमने यहां गांव के अंदर जंगलों के बीच जाने की कोशिश भी की लेकिन यहां दबी IED के खतरे की वजह से फोर्स ने जाने की अनुमति नहीं दी। सड़क पहुंच रही है, लेकिन गांव अब भी खाली जिस गांव तक कभी नक्सलियों के डर से सरकार नहीं पहुंच पाती थी, वहां अब सड़क बनाई जा रही है। सड़क निर्माण का काम BRO कर रहा है। सड़क के साथ सुरक्षा बलों की पहुंच भी बढ़ रही है। यह सिर्फ सड़क का निर्माण नहीं है। यह उस इलाके तक पहुंच बनाने की कोशिश है, जिसे नक्सलियों ने सालों तक अपने कब्जे में रखा। आसपास के कुछ और गांव भी ऐसे हैं, जो लंबे समय से खाली पड़े हैं। इन गांवों में कभी लोग रहते थे, लेकिन नक्सलवाद के कारण उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा। क्या ग्रामीण फिर लौटेंगे? वन मंत्री केदार कश्यप ने दैनिक भास्कर से बातचीत में कहा कि अब इलाके में हालात बदल चुके हैं। पहाड़ और आसपास का क्षेत्र नक्सलियों के कब्जे से मुक्त हुआ है। ऐसे में ग्रामीण चाहें तो अपने गांव लौट सकते हैं। उन्होंने कहा कि, पूरे देश से नक्सलवाद खत्म हो चुका है। जिन कारणों की वजह से गांव वालों को यहां से जाना पड़ा था अब वे बिना किसी डर, दहशत के लौट सकते हैं। वे क्षेत्र उनका है। कहां हैं ग्रामीण, कोई रिकॉर्ड नहीं असल मुद्दा सिर्फ लौटने का नहीं, बल्कि उन परिवारों का है जिन्होंने 20-30 साल पहले गांव छोड़ा था। वे आज किस हाल में हैं, उनकी जमीन-जायदाद का क्या हुआ और उनकी नई पीढ़ी वापस बसना भी चाहती है या नहीं। ………………… इससे जुड़ी यह खबर भी पढ़िए… नक्सलियों के ‘ब्लैक फॉरेस्ट’ कर्रेगुट्टा पर लहराया तिरंगा:यहीं झीरम हमले, MLA हत्या की प्लानिंग हुई थी, 7km ऊपर पहाड़ी पर पहुंची तिरंगा यात्रा यह वही कर्रेगुट्टा है, जहां कभी 3 राज्यों की सीमा से लगे घने जंगलों के बीच नक्सलियों की सरकार चलती थी। पहाड़ी की ढलानों पर उनके ठिकाने थे, हथियार बनाने की फैक्ट्री थी और गुफाओं में हथियार, IED छिपाकर रखे जाते थे। पढ़ें पूरी खबर…


