जमुई का सुदूर गुरमाहा गांव, जो कभी नक्सली आतंक के साये में था, अब बदलाव की नई कहानी लिख रहा है। 80वें स्वतंत्रता दिवस पर शनिवार को इस गांव में करीब 25 वर्षों बाद राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। इस ऐतिहासिक पल के साक्षी प्रखंड कृषि पदाधिकारी ऋषिकेश कुमार और बड़ी संख्या में ग्रामीण बने, जिन्होंने तिरंगे को सलामी दी और राष्ट्रगान गाया। ग्रामीणों के अनुसार, दो दशक पहले गुरमाहा और आसपास का इलाका नक्सली गतिविधियों का गढ़ था। उस दौरान राष्ट्रीय ध्वज फहराना तो दूर, लोग अपने घरों पर तिरंगा लगाने से भी डरते थे। नक्सली ग्रामीणों को पुलिस का मुखबिर बताकर प्रताड़ित करते थे और मृत नक्सलियों की याद में बनाए गए पिंडों पर जबरन माला चढ़ाने को मजबूर करते थे। 2000 के आसपास माओवादियों का था प्रभाव पूर्व पंचायत समिति सदस्य नरेश कोड़ा ने बताया कि वर्ष 2000 के आसपास माओवादियों का प्रभाव चरम पर था। कई परिवारों के युवाओं को जबरन संगठन में शामिल होने का दबाव बनाया गया। इस डर के कारण जमीन-जायदाद वाले कई परिवार गांव छोड़कर चले गए, जबकि बड़ी संख्या में युवा मजदूरी के लिए दूसरे इलाकों में पलायन कर गए। गांव के 75 वर्षीय जानकी कोड़ा के लिए यह दिन बेहद भावुक करने वाला रहा। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी जिंदगी में पहली बार गुरमाहा में तिरंगा फहरते देखा है। गांव में करीब 45 परिवार रहते हैं और अधिकांश लोग खेती-मजदूरी पर निर्भर हैं। प्रशासन की पहुंच थी बेहद कम जानकी कोड़ा ने बताया कि पहले प्रशासन की पहुंच बेहद कम थी और राशन जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नियमित नहीं मिलती थीं, लेकिन अब राशन, बिजली और नल-जल जैसी योजनाओं का लाभ मिलने लगा है। गुरमाहा तक पहुंचना प्रशासन और सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि यह दुर्गम जंगल और पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है। जमुई, लखीसराय और मुंगेर की सीमा से जुड़े भीमबांध इलाके को नक्सलियों ने अपने सुरक्षित ठिकाने के रूप में इस्तेमाल किया था। हालांकि, लगातार चलाए गए एंटी-नक्सल अभियानों और सुरक्षाबलों के स्थायी कैंप स्थापित होने के बाद इलाके में नक्सली प्रभाव कमजोर हुआ और धीरे-धीरे यह क्षेत्र मुख्यधारा से जुड़ने लगा। ग्रामीणों ने मतदान केंद्रों पर डाला वोट नक्सल प्रभाव खत्म होने के बाद लोकतांत्रिक भागीदारी भी बढ़ी। वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में गुरमाहा, चोरमारा, मुसहरीटांड, जमुनियाटांड और कुमरतरी के ग्रामीणों ने अपने क्षेत्र में बने मतदान केंद्रों पर वोट डाला। इससे पहले स्कूल को नुकसान पहुंचाए जाने के कारण लोगों को करीब 40 किलोमीटर दूर जाकर मतदान करना पड़ता था। 2026 में प्रशासनिक पहल से राशन, बिजली और नल-जल जैसी सुविधाओं का विस्तार हुआ। जिस स्थान पर कभी नक्सली स्मारक हुआ करता था, वहीं अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर योग शिविर आयोजित किया गया। स्वतंत्रता दिवस पर उसी क्षेत्र में तिरंगा फहरना बदलाव की सबसे बड़ी तस्वीर बनकर सामने आया। ग्रामीण महिलाओं प्रमिला देवी, सबिता देवी, सुशीला देवी और आरती कुमारी ने भी पहली बार गांव में तिरंगा फहरने पर खुशी जताई। प्रशासन ने भरोसा दिलाया कि गुरमाहा को भी जिले के अन्य गांवों की तरह विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जाएगा। जमुई का सुदूर गुरमाहा गांव, जो कभी नक्सली आतंक के साये में था, अब बदलाव की नई कहानी लिख रहा है। 80वें स्वतंत्रता दिवस पर शनिवार को इस गांव में करीब 25 वर्षों बाद राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। इस ऐतिहासिक पल के साक्षी प्रखंड कृषि पदाधिकारी ऋषिकेश कुमार और बड़ी संख्या में ग्रामीण बने, जिन्होंने तिरंगे को सलामी दी और राष्ट्रगान गाया। ग्रामीणों के अनुसार, दो दशक पहले गुरमाहा और आसपास का इलाका नक्सली गतिविधियों का गढ़ था। उस दौरान राष्ट्रीय ध्वज फहराना तो दूर, लोग अपने घरों पर तिरंगा लगाने से भी डरते थे। नक्सली ग्रामीणों को पुलिस का मुखबिर बताकर प्रताड़ित करते थे और मृत नक्सलियों की याद में बनाए गए पिंडों पर जबरन माला चढ़ाने को मजबूर करते थे। 2000 के आसपास माओवादियों का था प्रभाव पूर्व पंचायत समिति सदस्य नरेश कोड़ा ने बताया कि वर्ष 2000 के आसपास माओवादियों का प्रभाव चरम पर था। कई परिवारों के युवाओं को जबरन संगठन में शामिल होने का दबाव बनाया गया। इस डर के कारण जमीन-जायदाद वाले कई परिवार गांव छोड़कर चले गए, जबकि बड़ी संख्या में युवा मजदूरी के लिए दूसरे इलाकों में पलायन कर गए। गांव के 75 वर्षीय जानकी कोड़ा के लिए यह दिन बेहद भावुक करने वाला रहा। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी जिंदगी में पहली बार गुरमाहा में तिरंगा फहरते देखा है। गांव में करीब 45 परिवार रहते हैं और अधिकांश लोग खेती-मजदूरी पर निर्भर हैं। प्रशासन की पहुंच थी बेहद कम जानकी कोड़ा ने बताया कि पहले प्रशासन की पहुंच बेहद कम थी और राशन जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नियमित नहीं मिलती थीं, लेकिन अब राशन, बिजली और नल-जल जैसी योजनाओं का लाभ मिलने लगा है। गुरमाहा तक पहुंचना प्रशासन और सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि यह दुर्गम जंगल और पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है। जमुई, लखीसराय और मुंगेर की सीमा से जुड़े भीमबांध इलाके को नक्सलियों ने अपने सुरक्षित ठिकाने के रूप में इस्तेमाल किया था। हालांकि, लगातार चलाए गए एंटी-नक्सल अभियानों और सुरक्षाबलों के स्थायी कैंप स्थापित होने के बाद इलाके में नक्सली प्रभाव कमजोर हुआ और धीरे-धीरे यह क्षेत्र मुख्यधारा से जुड़ने लगा। ग्रामीणों ने मतदान केंद्रों पर डाला वोट नक्सल प्रभाव खत्म होने के बाद लोकतांत्रिक भागीदारी भी बढ़ी। वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में गुरमाहा, चोरमारा, मुसहरीटांड, जमुनियाटांड और कुमरतरी के ग्रामीणों ने अपने क्षेत्र में बने मतदान केंद्रों पर वोट डाला। इससे पहले स्कूल को नुकसान पहुंचाए जाने के कारण लोगों को करीब 40 किलोमीटर दूर जाकर मतदान करना पड़ता था। 2026 में प्रशासनिक पहल से राशन, बिजली और नल-जल जैसी सुविधाओं का विस्तार हुआ। जिस स्थान पर कभी नक्सली स्मारक हुआ करता था, वहीं अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर योग शिविर आयोजित किया गया। स्वतंत्रता दिवस पर उसी क्षेत्र में तिरंगा फहरना बदलाव की सबसे बड़ी तस्वीर बनकर सामने आया। ग्रामीण महिलाओं प्रमिला देवी, सबिता देवी, सुशीला देवी और आरती कुमारी ने भी पहली बार गांव में तिरंगा फहरने पर खुशी जताई। प्रशासन ने भरोसा दिलाया कि गुरमाहा को भी जिले के अन्य गांवों की तरह विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जाएगा।


