पैकेज्ड फूड पर वॉर्निंग लेबल लगाकर जो चिली-मैक्सिको ने कर दिखाया, भारत क्यों नहीं कर पा रहा?

पैकेज्ड फूड पर वॉर्निंग लेबल लगाकर जो चिली-मैक्सिको ने कर दिखाया, भारत क्यों नहीं कर पा रहा?

चिप्स, बिस्किट, नमकीन, कोल्ड ड्रिंक जैसे पैकेट बंद खाद्य पदार्थों पर ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबल’ (एफओपीएल) यानी पैकेट के आगे वाले हिस्से पर वॉर्निंग लेबल (Warning Label) लगाने की मांग भारत (India) में काफी समय से चल रही है, जिससे हर कोई तुरंत देख सके कि उस पैकेज्ड फूड (Packaged Food) में चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट तय सुरक्षित सीमा से ज़्यादा है या नहीं। लेकिन हद तो यह हो रही है कि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के दिशानिर्देशों को लागू करने में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) टालमटोल करता नज़र आ रहा है। इससे नाराज होकर सुप्रीम कोर्ट को एफएसएसएआई से पूछना पड़ा कि क्या वो फूड इंडस्ट्री के लिए काम करती है। आइए समझते हैं इस पूरे विवाद को।

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कब हुई विवाद की शुरुआत?

इसकी शुरुआत 2018 में हुई थी, लेकिन विवाद तब भड़का जब बोर्नविटा को ‘हेल्थ ड्रिंक’ कहे जाने पर सवाल उठे। इसके बाद हॉर्लिक्स, बूस्ट, प्रोटीनेक्स जैसे ब्रांड भी घेरे में आए, क्योंकि इनमें 37% तक ज़्यादा चीनी पाई गई।

एफएसएसएआई ने क्या प्रस्ताव रखा?

एफएसएसएआईने वॉर्निंग लेबल के बजाय ‘न्यूट्रिशन स्टार रेटिंग’ का प्रस्ताव दिया। यानी सीधी चेतावनी की जगह स्टार में रेटिंग।

विशेषज्ञों ने इसे ‘चालबाजी’ क्यों कहा?

इस सिस्टम में कंपनियाँ प्रोटीन या फाइबर जैसे तत्व ज़्यादा मिलाकर ऊंची स्टार रेटिंग हासिल कर सकती हैं और उसी आड़ में प्रोडक्ट में मौजूद ज़्यादा चीनी-नमक को छिपा सकती हैं। ज्यादातर ग्राहक वैसे भी रेटिंग पर ध्यान नहीं देते।

सुप्रीम कोर्ट में केस कैसे पहुंचा?

याचिका कब दायर हुई?

मई 2024 में स्वास्थ्य संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर पैकेट पर बड़े अक्षरों में वॉर्निंग (जैसे ‘चीनी की मात्रा ज़्यादा’) अनिवार्य करने की मांग रखी।

एफएसएसएआई ने इसमें कैसी ढिलाई दिखाई?

अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने तीन महीने में रिपोर्ट मांगी, लेकिन एफएसएसएआई ने रिपोर्ट नहीं सौंपी। 10 महीने बाद फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने फिर फटकार लगाकर चार हफ्ते की मोहलत दी।

सुप्रीम कोर्ट ने सबसे तीखी टिप्पणी कब की?

13 अगस्त 2026 को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने साफ चेतावनी दी कि अगर अधिकारी यह काम नहीं कर सकते तो सुप्रीम कोर्ट खुद यह जिम्मेदारी संभाल लेगा। बेंच ने सीधे पूछा – “क्या अधिकारी फूड इंडस्ट्री के दबाव में झुक रहे हैं?”

एफएसएसएआई की दलीलें और उन पर सवाल

एफएसएसएआई ने विदेशी मॉडल क्यों नहीं अपनाया?

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बृजेंदर चाहर ने दलील दी कि भारत की खान-पान की आदतें अलग हैं, इसलिए विदेशी वॉर्निंग लेबल का मॉडल यहाँ लागू नहीं किए जा सकते।

एफएसएसएआई ने फूड इंडस्ट्री से सलाह कब ली?

19 मार्च की बैठक में फूड इंडस्ट्री संगठनों ने वॉर्निंग लेबल का खुलकर विरोध किया और इसके बदले सिर्फ ‘सुरक्षित सीमा’ के आंकड़े पैकेट पर दिखाने का प्रस्ताव रखा।

विशेषज्ञों की आपत्ति क्या है?

सिर्फ आंकड़े छापना काफी नहीं है। सामान्य नागरिक इतने जागरूक नहीं होते कि पहले सुरक्षित सीमा जानें, फिर प्रोडक्ट में मौजूद मात्रा पढ़े, और फिर खुद हिसाब लगाएं कि कितनी क्वांटिटी खाना सुरक्षित है। यह हिसाब बड़ों और बच्चों के लिए अलग-अलग भी होता है।

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चिली का मॉडल क्या है?

चिली (Chile) में 2016 से ही पैकेज्ड फूड पर साफ वॉर्निंग लेबल अनिवार्य हैं। नतीजतन हाई-रिस्क प्रोडक्ट्स की खरीद घटी और बच्चों को टारगेट करने वाले विज्ञापन 73% तक कम हो गए।

मैक्सिको ने क्या किया?

मेक्सिको ने भी एफओपीएल वॉर्निंग अनिवार्य की और 2019 में सिर्फ आंकड़े दिखाने वाले पुराने लेबल हटा दिए। ठीक वही बहस जो अभी भारत में चल रही है।

आखिर असली लड़ाई किस बात पर अटकी है?

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि एफएसएसएआई फूड इंडस्ट्री के दबाव में साफ और आसान वॉर्निंग देने से बच रहा है, जबकि सेहत के पक्षधर चाहते हैं कि लेबल इतना सरल हो कि हर सामान्य इंसान एक नज़र में समझ जाए।

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