मिथिलांचल में नवविवाहिताओं का प्रमुख लोकपर्व मधुश्रावणी पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है। सावन की हरियाली के बीच गांव-गांव में नवविवाहिताएं भगवान शिव, माता पार्वती, विषहरी, नाग देवता की पूजा-अर्चना कर पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना कर रही हैं। इस वर्ष मधुश्रावणी पर्व का शुभारंभ 3 अगस्त से हुआ है और 15 अगस्त को समापन होगा। समापन के दिन सदियों पुरानी ‘टेमी दागने’ की रस्म निभाई जाएगी। पर्व की शुरुआत नाग पंचमी से होती है। इस दिन नवविवाहिताएं मां विषहारी को दूध और धान का लावा अर्पित करती हैं। इसके बाद पूरे पर्व के दौरान प्रतिदिन पूजा, कथा श्रवण और पारंपरिक गीतों का आयोजन होता है। नवविवाहिताएं इस अवधि में मायके में रहकर व्रत करती हैं। ससुराल पक्ष की ओर से उनके लिए श्रृंगार पेटी और पूजा सामग्री भेजी जाती है। इसमें नई साड़ी, लाह की लहठी, सिंदूर, फूल-पत्तियां सहित अन्य सामग्री शामिल होती है। हरियाली के बीच फूल-पत्तियों से होती है पूजा मधुश्रावणी के दौरान हर शाम नवविवाहिताएं अपनी सखियों के साथ गांव के बगीचों और उपवनों में जाकर फूल-पत्तियां तोड़ती हैं। इन्हें डालियों में सजाकर शिव मंदिर या पूजा स्थल पर ले जाया जाता है। इसके बाद सामूहिक रूप से भगवान शिव, माता पार्वती, विषहरी और नाग देवता की पूजा की जाती है। पूजा के दौरान पारंपरिक गीतों की गूंज से गांव का वातावरण भक्तिमय हो जाता है। ‘कथी में लोढ़ब हे’, ‘बेली चमेली’ और ‘कथीमे अढ़हुल फूल मलिया बारी में’ जैसे लोकगीतों के साथ कोहबर गीत, भगवती गीत और विद्यापति की रचनाएं भी महिलाओं द्वारा गाई जाती हैं। सावन की हरियाली और लोकगीतों से गांवों में उत्सव का माहौल बना हुआ है। बासी फूल-पत्तियों से पूजा की अनूठी परंपरा मधुश्रावणी की पूजा की सबसे खास विशेषताओं में एक यह है कि इसमें एक दिन पहले तोड़े गए फूल-पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके साथ ही पूजा और कथा वाचन का संचालन गांव की बुजुर्ग महिला पुरोहित करती हैं। यही कारण है कि मधुश्रावणी को मिथिला की उन विशिष्ट परंपराओं में गिना जाता है, जिसमें महिला पुरोहितों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पंडित सरोज कुमार झा के अनुसार मधुश्रावणी प्रकृति, नाग देवता और नागेश्वरी देवी की आराधना से जुड़ा पर्व है। नवविवाहिताएं प्रतिदिन बगीचे से फूल-पत्तियां लाकर शिव-पार्वती और नाग देवता की पूजा करती हैं। मान्यता है कि विवाह के पहले वर्ष में जो नवविवाहिता पांचों बहनों और नाग देवता की पूजा करती है, वह और उसका पति जीवनभर नाग देवता के कोप से सुरक्षित रहते हैं। नाग देवता से जुड़ी है पौराणिक कथा मधुश्रावणी से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती ने भगवान शंकर की पुत्रियों को कीड़ा-मकोड़ा समझकर कुचलना चाहा। तब भगवान शिव ने उन्हें बताया कि वे उनकी ही पांच पुत्रियां हैं और नाग स्वरूप में हैं। मान्यता है कि भगवान शिव ने कहा कि कलियुग में जो नवविवाहिता श्रावण कृष्ण पक्ष की पंचमी को इनकी पूजा करेगी, उसका परिवार सर्पदंश से सुरक्षित रहेगा। इसी आस्था के कारण मधुश्रावणी में नाग देवता और विषहरी की पूजा का विशेष महत्व है। व्रती महिलाएं पर्व के दौरान अलग-अलग देव कथाएं सुनती हैं। सावित्री-सत्यवान, राम-सीता, शिव-पार्वती, राधा-कृष्ण, नाग देवता, मैना, पंचमी, बिहुला, विषहरी, मंगला गौरी, पृथ्वी जन्म, समुद्र मंथन और माता सती से जुड़ी कथाओं का वाचन किया जाता है। 15 अगस्त को होगी टेमी दागने की रस्म मधुश्रावणी के समापन पर 15 अगस्त को ‘टेमी दागने’ की रस्म होगी। इसमें नवविवाहिता के घुटनों और पैरों पर जलती हुई बाती से दागने की परंपरा है। लोक मान्यता के अनुसार, जिन नवविवाहिताओं के घुटनों पर टेमी के निशान के बाद फफोले पड़ते हैं, उन्हें सौभाग्यवती माना जाता है। इसके साथ ही नवविवाहिता का व्रत पूर्ण होता है। इस पर्व के दौरान नवविवाहिताएं दिन में एक बार भोजन करती हैं और कई परिवारों में पूरे व्रतकाल में बिना नमक के भोजन करने की परंपरा है। इस कारण यह व्रत नवविवाहिताओं के लिए तपस्या के समान माना जाता है। हरी साड़ी और हरी चूड़ियां पहनना भी इस पर्व की प्रमुख परंपराओं में शामिल है। इन्हें सौभाग्य, समर्पण और दांपत्य जीवन की मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है। दर्जनों गांवों में मनाया जा रहा पर्व दरभंगा जिले के मझौलिया, श्रीरामपुर, बसहा, गोरा पट्टी, थलवाड़ा, होरलपट्टी, सिधौली, बिशनपुर, देकुली, केवटी, रनवे, दड़िमा, समैला, फुलकाही, बंसरा, नयागांव, पिंडारुच, लदारी, कर्जापट्टी, बरिऔल, मझिगामा, सुंदरपुर, नारायणपुर, पटनिया, पोखराम, सहसराम, कोरथु, सुपौल, औराही, उछटी, घनश्यामपुर, रसियारी, बलौर, उजान, सखवार, भदहर, हरौली, हिरणी, खराजपुर, बरहेता, ओझौल, तारालाही, बीसहत, बघांत, मेहसारी, भरवाड़ा, जाले, लखनपुर, पैरा, रतनपुर, बहादुरपुर, बहेड़ा, महिनाम, कहुआ, पोहद्दी, नवादा, बेनीपुर, कसरर, बैगनी, आशी और हावीभौआर समेत दर्जनों गांवों में मधुश्रावणी का आयोजन हो रहा है। सीमावर्ती नेपाल के मिथिला क्षेत्र में भी नवविवाहिताएं पारंपरिक परिधान में सज-धजकर पूजा-अर्चना कर रही हैं। शाम होते ही गांवों में महिलाओं के सामूहिक गीतों से वातावरण संगीतमय हो जाता है। 11वें दिन शिव-पार्वती की पूजा मधुश्रावणी के 11वें दिन नवविवाहिताएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर पति की लंबी आयु और दांपत्य जीवन की सुख-शांति की कामना करती हैं। ससुराल से भेजे गए कपड़े, भोजन और पूजा सामग्री का उपयोग कर वे निर्धारित विधि से पूजा करेंगी और कथा श्रवण करती हैं। मिथिला की परंपरा में मधुश्रावणी को शादी के बाद नवविवाहिता के लिए विशेष महत्व रखने वाला पर्व माना जाता है। मुख्य रूप से मैथिल ब्राह्मण और कर्ण कायस्थ परिवारों में मनाए जाने वाले इस पर्व में धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति, लोकगीत, महिला परंपरा और नवदांपत्य जीवन की मंगलकामना का अनूठा संगम देखने को मिलता है। सावन की हरियाली के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व मिथिला की समृद्ध लोक-संस्कृति और परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बनाए हुए है। मिथिलांचल में नवविवाहिताओं का प्रमुख लोकपर्व मधुश्रावणी पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है। सावन की हरियाली के बीच गांव-गांव में नवविवाहिताएं भगवान शिव, माता पार्वती, विषहरी, नाग देवता की पूजा-अर्चना कर पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना कर रही हैं। इस वर्ष मधुश्रावणी पर्व का शुभारंभ 3 अगस्त से हुआ है और 15 अगस्त को समापन होगा। समापन के दिन सदियों पुरानी ‘टेमी दागने’ की रस्म निभाई जाएगी। पर्व की शुरुआत नाग पंचमी से होती है। इस दिन नवविवाहिताएं मां विषहारी को दूध और धान का लावा अर्पित करती हैं। इसके बाद पूरे पर्व के दौरान प्रतिदिन पूजा, कथा श्रवण और पारंपरिक गीतों का आयोजन होता है। नवविवाहिताएं इस अवधि में मायके में रहकर व्रत करती हैं। ससुराल पक्ष की ओर से उनके लिए श्रृंगार पेटी और पूजा सामग्री भेजी जाती है। इसमें नई साड़ी, लाह की लहठी, सिंदूर, फूल-पत्तियां सहित अन्य सामग्री शामिल होती है। हरियाली के बीच फूल-पत्तियों से होती है पूजा मधुश्रावणी के दौरान हर शाम नवविवाहिताएं अपनी सखियों के साथ गांव के बगीचों और उपवनों में जाकर फूल-पत्तियां तोड़ती हैं। इन्हें डालियों में सजाकर शिव मंदिर या पूजा स्थल पर ले जाया जाता है। इसके बाद सामूहिक रूप से भगवान शिव, माता पार्वती, विषहरी और नाग देवता की पूजा की जाती है। पूजा के दौरान पारंपरिक गीतों की गूंज से गांव का वातावरण भक्तिमय हो जाता है। ‘कथी में लोढ़ब हे’, ‘बेली चमेली’ और ‘कथीमे अढ़हुल फूल मलिया बारी में’ जैसे लोकगीतों के साथ कोहबर गीत, भगवती गीत और विद्यापति की रचनाएं भी महिलाओं द्वारा गाई जाती हैं। सावन की हरियाली और लोकगीतों से गांवों में उत्सव का माहौल बना हुआ है। बासी फूल-पत्तियों से पूजा की अनूठी परंपरा मधुश्रावणी की पूजा की सबसे खास विशेषताओं में एक यह है कि इसमें एक दिन पहले तोड़े गए फूल-पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके साथ ही पूजा और कथा वाचन का संचालन गांव की बुजुर्ग महिला पुरोहित करती हैं। यही कारण है कि मधुश्रावणी को मिथिला की उन विशिष्ट परंपराओं में गिना जाता है, जिसमें महिला पुरोहितों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पंडित सरोज कुमार झा के अनुसार मधुश्रावणी प्रकृति, नाग देवता और नागेश्वरी देवी की आराधना से जुड़ा पर्व है। नवविवाहिताएं प्रतिदिन बगीचे से फूल-पत्तियां लाकर शिव-पार्वती और नाग देवता की पूजा करती हैं। मान्यता है कि विवाह के पहले वर्ष में जो नवविवाहिता पांचों बहनों और नाग देवता की पूजा करती है, वह और उसका पति जीवनभर नाग देवता के कोप से सुरक्षित रहते हैं। नाग देवता से जुड़ी है पौराणिक कथा मधुश्रावणी से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती ने भगवान शंकर की पुत्रियों को कीड़ा-मकोड़ा समझकर कुचलना चाहा। तब भगवान शिव ने उन्हें बताया कि वे उनकी ही पांच पुत्रियां हैं और नाग स्वरूप में हैं। मान्यता है कि भगवान शिव ने कहा कि कलियुग में जो नवविवाहिता श्रावण कृष्ण पक्ष की पंचमी को इनकी पूजा करेगी, उसका परिवार सर्पदंश से सुरक्षित रहेगा। इसी आस्था के कारण मधुश्रावणी में नाग देवता और विषहरी की पूजा का विशेष महत्व है। व्रती महिलाएं पर्व के दौरान अलग-अलग देव कथाएं सुनती हैं। सावित्री-सत्यवान, राम-सीता, शिव-पार्वती, राधा-कृष्ण, नाग देवता, मैना, पंचमी, बिहुला, विषहरी, मंगला गौरी, पृथ्वी जन्म, समुद्र मंथन और माता सती से जुड़ी कथाओं का वाचन किया जाता है। 15 अगस्त को होगी टेमी दागने की रस्म मधुश्रावणी के समापन पर 15 अगस्त को ‘टेमी दागने’ की रस्म होगी। इसमें नवविवाहिता के घुटनों और पैरों पर जलती हुई बाती से दागने की परंपरा है। लोक मान्यता के अनुसार, जिन नवविवाहिताओं के घुटनों पर टेमी के निशान के बाद फफोले पड़ते हैं, उन्हें सौभाग्यवती माना जाता है। इसके साथ ही नवविवाहिता का व्रत पूर्ण होता है। इस पर्व के दौरान नवविवाहिताएं दिन में एक बार भोजन करती हैं और कई परिवारों में पूरे व्रतकाल में बिना नमक के भोजन करने की परंपरा है। इस कारण यह व्रत नवविवाहिताओं के लिए तपस्या के समान माना जाता है। हरी साड़ी और हरी चूड़ियां पहनना भी इस पर्व की प्रमुख परंपराओं में शामिल है। इन्हें सौभाग्य, समर्पण और दांपत्य जीवन की मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है। दर्जनों गांवों में मनाया जा रहा पर्व दरभंगा जिले के मझौलिया, श्रीरामपुर, बसहा, गोरा पट्टी, थलवाड़ा, होरलपट्टी, सिधौली, बिशनपुर, देकुली, केवटी, रनवे, दड़िमा, समैला, फुलकाही, बंसरा, नयागांव, पिंडारुच, लदारी, कर्जापट्टी, बरिऔल, मझिगामा, सुंदरपुर, नारायणपुर, पटनिया, पोखराम, सहसराम, कोरथु, सुपौल, औराही, उछटी, घनश्यामपुर, रसियारी, बलौर, उजान, सखवार, भदहर, हरौली, हिरणी, खराजपुर, बरहेता, ओझौल, तारालाही, बीसहत, बघांत, मेहसारी, भरवाड़ा, जाले, लखनपुर, पैरा, रतनपुर, बहादुरपुर, बहेड़ा, महिनाम, कहुआ, पोहद्दी, नवादा, बेनीपुर, कसरर, बैगनी, आशी और हावीभौआर समेत दर्जनों गांवों में मधुश्रावणी का आयोजन हो रहा है। सीमावर्ती नेपाल के मिथिला क्षेत्र में भी नवविवाहिताएं पारंपरिक परिधान में सज-धजकर पूजा-अर्चना कर रही हैं। शाम होते ही गांवों में महिलाओं के सामूहिक गीतों से वातावरण संगीतमय हो जाता है। 11वें दिन शिव-पार्वती की पूजा मधुश्रावणी के 11वें दिन नवविवाहिताएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर पति की लंबी आयु और दांपत्य जीवन की सुख-शांति की कामना करती हैं। ससुराल से भेजे गए कपड़े, भोजन और पूजा सामग्री का उपयोग कर वे निर्धारित विधि से पूजा करेंगी और कथा श्रवण करती हैं। मिथिला की परंपरा में मधुश्रावणी को शादी के बाद नवविवाहिता के लिए विशेष महत्व रखने वाला पर्व माना जाता है। मुख्य रूप से मैथिल ब्राह्मण और कर्ण कायस्थ परिवारों में मनाए जाने वाले इस पर्व में धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति, लोकगीत, महिला परंपरा और नवदांपत्य जीवन की मंगलकामना का अनूठा संगम देखने को मिलता है। सावन की हरियाली के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व मिथिला की समृद्ध लोक-संस्कृति और परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बनाए हुए है।


