राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र निदेशक ने बागानों का निरीक्षण किया:मणिका बिशनपुर चांद के किसानों को आधुनिक खेती की जानकारी दी

राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र निदेशक ने बागानों का निरीक्षण किया:मणिका बिशनपुर चांद के किसानों को आधुनिक खेती की जानकारी दी

मुसहरी प्रखंड की मनिका बिशनपुर चांद पंचायत में राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र (एनआरसीएल) के निदेशक डॉ. विकास दास ने किसानों के बागानों का निरीक्षण किया। उन्होंने किसानों को लीची की खेती और बागवानी के बेहतर प्रबंधन के लिए आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों की जानकारी दी। निरीक्षण के दौरान, निदेशक डॉ. दास ने किसान विजय पासवान के खेत का दौरा किया। यहां लीची के बागान के साथ हल्दी की अंतरवर्ती खेती की जा रही थी। उन्होंने हल्दी की उपज और इस खेती पद्धति के बारे में जानकारी ली। डॉ. दास ने लीची के पेड़ों की वैज्ञानिक तरीके से कटाई-छंटाई (प्रूनिंग) करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि नियमित कटाई-छंटाई से बाग में पर्याप्त धूप और हवा पहुंचती है, जिससे उत्पादन बढ़ता है और किसान बागान में अन्य फसलें भी उगा सकते हैं। इसके बाद, निदेशक ने किसान प्रभाकर सिंह से लीची के पौधों के संबंध में चर्चा की। प्रभाकर सिंह ने बताया कि राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के एक वर्षीय पौधे बेहतर विकास करते हैं। हालांकि, नीलगाय जैसे जंगली जानवरों से नुकसान की आशंका के कारण किसान बाहर की नर्सरियों से चार से पांच वर्ष पुराने बड़े पौधे खरीदना अधिक सुरक्षित समझते हैं। इस पर डॉ. विकास दास ने किसानों को आश्वस्त किया कि संस्थान के विशेषज्ञ उनके बागानों का निरीक्षण कर वैज्ञानिक तरीके से पेड़ों की कटाई-छंटाई और रखरखाव में सहयोग करेंगे। उन्होंने किसानों से संस्थान आकर विशेषज्ञों से प्रशिक्षण लेने और नई तकनीकों को अपनाने की अपील की। डॉ. दास ने किसानों द्वारा अपनाई जा रही पारंपरिक बागवानी पद्धतियों की भी जानकारी ली और उन्हें वैज्ञानिक अनुसंधान पर आधारित नई तकनीकों से अवगत कराया। निदेशक ने किसानों से आगामी अगस्त माह से आयोजित होने वाले किसान महोत्सव में अधिक से अधिक संख्या में भाग लेने का आह्वान किया। इसका उद्देश्य आधुनिक कृषि एवं बागवानी तकनीकों की जानकारी प्राप्त कर अपनी आय और उत्पादन में वृद्धि करना है। मुसहरी प्रखंड की मनिका बिशनपुर चांद पंचायत में राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र (एनआरसीएल) के निदेशक डॉ. विकास दास ने किसानों के बागानों का निरीक्षण किया। उन्होंने किसानों को लीची की खेती और बागवानी के बेहतर प्रबंधन के लिए आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों की जानकारी दी। निरीक्षण के दौरान, निदेशक डॉ. दास ने किसान विजय पासवान के खेत का दौरा किया। यहां लीची के बागान के साथ हल्दी की अंतरवर्ती खेती की जा रही थी। उन्होंने हल्दी की उपज और इस खेती पद्धति के बारे में जानकारी ली। डॉ. दास ने लीची के पेड़ों की वैज्ञानिक तरीके से कटाई-छंटाई (प्रूनिंग) करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि नियमित कटाई-छंटाई से बाग में पर्याप्त धूप और हवा पहुंचती है, जिससे उत्पादन बढ़ता है और किसान बागान में अन्य फसलें भी उगा सकते हैं। इसके बाद, निदेशक ने किसान प्रभाकर सिंह से लीची के पौधों के संबंध में चर्चा की। प्रभाकर सिंह ने बताया कि राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के एक वर्षीय पौधे बेहतर विकास करते हैं। हालांकि, नीलगाय जैसे जंगली जानवरों से नुकसान की आशंका के कारण किसान बाहर की नर्सरियों से चार से पांच वर्ष पुराने बड़े पौधे खरीदना अधिक सुरक्षित समझते हैं। इस पर डॉ. विकास दास ने किसानों को आश्वस्त किया कि संस्थान के विशेषज्ञ उनके बागानों का निरीक्षण कर वैज्ञानिक तरीके से पेड़ों की कटाई-छंटाई और रखरखाव में सहयोग करेंगे। उन्होंने किसानों से संस्थान आकर विशेषज्ञों से प्रशिक्षण लेने और नई तकनीकों को अपनाने की अपील की। डॉ. दास ने किसानों द्वारा अपनाई जा रही पारंपरिक बागवानी पद्धतियों की भी जानकारी ली और उन्हें वैज्ञानिक अनुसंधान पर आधारित नई तकनीकों से अवगत कराया। निदेशक ने किसानों से आगामी अगस्त माह से आयोजित होने वाले किसान महोत्सव में अधिक से अधिक संख्या में भाग लेने का आह्वान किया। इसका उद्देश्य आधुनिक कृषि एवं बागवानी तकनीकों की जानकारी प्राप्त कर अपनी आय और उत्पादन में वृद्धि करना है।  

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