इतिहास के पन्नों पर स्याही से तो बहुत कुछ लिखा जाता है, लेकिन कुछ दास्तां ऐसी होती हैं जिन्हें लिखने के लिए वीर अपना खून बहाते हैं। यह गाथा है पटना के बिक्रम की माटी के उस जांबाज सपूत ‘शहीद त्रिवेणी सिंह’ की है, जिन्होंने तिरंगे की शान को बनाए रखने के लिए अपने माथे पर अंग्रेजी हुकूमत की गर्म गोलियां खा लीं। गांधी जी ने फूंका अगस्त क्रांति का बिगुल वो साल 1942 था। देश का सब्र अब पूरी तरह जवाब देने लगा था। दूसरे विश्व युद्ध के काले बादल मंडरा रहे थे। भारत आया क्रिप्स मिशन फेल हो गया था। अंग्रेज अपने वादे से एक बार फिर मुकर चुके थे। वे भारतीयों का समर्थन तो चाहते थे, लेकिन आजादी के बदले डोमिनियन स्टेट के खोखले आश्वासन दे रहे थे। भारत की जनता समझ चुकी थी कि गुलामी की ये बेड़ियां अब गिड़गिड़ाने से नहीं, बल्कि पूर्ण स्वराज के लिए आंदोलन से ही टूटेंगी। ऐसे में महात्मा गांधी ने मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान से एक फाइनल कॉल किया – अंग्रेजों भारत छोड़ो!”…। और इसी के साथ देश के युवाओं के रगों में जोश का संचार करते हुए एक मंत्र दिया – “करो या मरो!”। इस एक नारे ने पूरे देश में नई उर्जा का संचार कर दिया। बिहार के कोने-कोने तक भी इसी नई उर्जा का संचार हुआ और अगस्त क्रांति का केन्द्र राजधानी पटना बन गई। 11 अगस्त को पटना सचिवालय के सामने सात युवा छात्रों ने अपनी छाती पर अंग्रेजी हुकूमत की गोलियां खाकर तिरंगा फहराया। इस शहादत ने पूरे बिहार को हिलाकर रख दिया था। ब्रिटिश सरकार के इस दमन ने खौफ नहीं, बल्कि प्रतिशोध और देशभक्ति की आग सुलगा दी जो पटना के ग्रामीण इलाकों सहित पूरे बिहार में फैल गई। विक्रम में शहीद हुए त्रिवेणी सिंह और उनके दो साथी पटना सचिवालय पर 11 अगस्त को भले ही अंग्रेजों ने सात युवाओं को मौत के घाट उतारकर इस क्रांति को कुचलने का प्रयास किया था। लेकिन इन वीरों की शहादत पूरे बिहार में चिगांरी की तरह फैली। पटना के ग्रामीण इलाकों में भी युवाओं के मन में अब यूनियन जैक को नीचे उतारने और तिरंगे को फहराने का सपना घर करने लगा। 3 दिन बाद ही पटना के बिक्रम में एक ऐसा ही प्रयास फिर से हुआ। उस दिन बिक्रम में सुबह से ही एक अजीब सी बेचैनी और भारी उत्साह भरा हुआ था। गांवों से निकलकर लोग सड़कों पर जुटने लगे थे। ‘इंकलाब जिंदाबाद’, ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ के गगनभेदी उद्घोष के साथ स्वतंत्रता सेनानियों का एक विशाल हुजूम बिक्रम थाने की तरफ बढ़ रहा था। देश की आजादी का सपना संजोए त्रिवेणी सिंह भी इस आंदोलन में जुड़ना चाहते थे, लेकिन उम्र केवल 15 साल थी ऐसे में घर के बड़ें लोगों ने उन्हें रोका। लेकिन त्रिवेणी कहां रुकने वाले थे। सुबह करीब आठ बजे त्रिवेणी सिंह ने घर पर नाश्ता किया। इसके बाद परिवार के लोगों को बिना कुछ बताए अपने दो साथियो बुटाई राम और रंगनाथ सिंह के साथ चुके से इस आंदोलन में शामिल हो गए। उनका मकसद था बिक्रम थाना परिसर में घुसकर अंग्रेजी हुकूमत के सामने यूनियन जैक को हटाना और उसकी जगह देश की शान तिरंगा को फहराना। साथियों के साथ छिपते-छिपाते त्रिवेणी सिंह थाना के नजदीक पहुंच गए। इसी दौरान वहां मौजूद एक अंग्रेज कप्तान की नजर उन पर पड़ गई। अंग्रेज अधिकारी ने उन्हें रोकने की कोशिश की। लेकिन देश की आजादी के जुनून से भरे त्रिवेणी और उनके दोस्त पीछे हटने को तैयार नहीं थे। अग्रेजी पुलिसवाले तीनों लड़को को रोकने का प्रयास करते रहे और इसी जद्दोजहद में त्रिवेणी ने सड़क किनारे पड़ा एक पत्थर उठाया और अंग्रेज कप्तान की ओर फेंक दिया।वो पत्थर अंग्रेज कप्तान के सिर में जा लगा और उसके सिर से खून निकलने लगा। घटना के बाद वहां मौजूद अंग्रेज पुलिसकर्मियों के बीच अफरा-तफरी मच गई। अंग्रेज सिपाहियों ने त्रिवेणी सिंह को निशाना बनाकर गोली चला दी। उनके सिर में लगी और वे वहीं शहीद हो गए। ठीक उसी वक्त दूसरी और तीसरी गोली बुटाई राम और रंगनाथ सिंह को लगी। जिस उम्र में बच्चे अपने भविष्य के सपने देखते हैं, उस उम्र में त्रिवेणी सिंह और उनके साथियों ने भारत की आजादी के लिए अपना सर्वोच्च्य बलिदान दिया। त्रिवेणी और उनके साथियों के लहू ने बिक्रम की माटी का ऐसा तिलक किया जिसे इतिहास कभी मिटा नहीं सका। पटना और बिहार के इतिहास में त्रिवेणी सिंह, बुटाई राम और रंगनाथ सिंह हमेशा के लिए अमर हो गए। शादी के तीन साल बाद ही उजड़ गया परिवार त्रिवेणी सिंह की शहादत की कहानी सिर्फ देशभक्ति और संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक ऐसा पारिवारिक दर्द भी छिपा है, जिसे उनका परिवार आज तक याद करता है। त्रिवेणी सिंह के पोते सतेंद्र सिंह, सतीश कुमार और रामकिशोर शर्मा बताते हैं कि दादा त्रिवेणी सिंह की शादी उनकी शहादत से करीब तीन वर्ष पहले हुई थी। उस दौर में समाज में कई ऐसी परंपराएं थीं, जिनके कारण विवाह के बाद भी पति-पत्नी एक-दूसरे का चेहरा तक नहीं देखते थे। परिवार के अनुसार, त्रिवेणी सिंह अपनी पत्नी मुनाकि कुंवर का चेहरा तक नहीं देख पाए थे। शादी के कुछ ही वर्षों बाद देश की आजादी के लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया। जब त्रिवेणी सिंह की शहादत की खबर उनकी पत्नी और परिवार तक पहुंची तो घर में मातम छा गया। एक ओर देश ने अपना वीर सपूत खो दिया था, तो दूसरी ओर परिवार ने अपना बेटा और एक पत्नी ने अपना पति। इसके बाद मुनाकि कुंवर ने पूरी जिंदगी शहीद की विधवा के रूप में गुजारी। वर्ष 2022 में उनका भी निधन हो गया। आज परिवार के पास त्रिवेणी सिंह की यादें और उनकी शहादत की कहानी ही उनकी सबसे बड़ी विरासत है। बिक्रम शहीद चौक पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज है नाम देश आजाद हुआ तो त्रिवेणी सिंह जैसे अनगिनत गुमनाम और स्थानीय शहीदों के बलिदान को याद किया गया। बिक्रम के शहीद चौक पर त्रिवेणी सिंह का नाम अमर शहीद के रूप में सुनहरे अक्षरों में अंकित है। हर वर्ष 15 अगस्त और 26 जनवरी को काब गांव और आसपास के लोग बिक्रम शहीद चौक पहुंचते हैं और त्रिवेणी सिंह सहित आजादी की लड़ाई में शहीद हुए वीर सपूतों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। आज भी बिक्रम शहीद स्मारक पर तिरंगा शान से लहराता है। वहां पहुंचने वाले लोगों को 17 अगस्त 1942 के उन वीर सपूतों के अदम्य साहस और बलिदान की कहानी सुनाई जाती है। महज 15 वर्ष की उम्र में अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने वाले त्रिवेणी सिंह की कहानी आज भी यह याद दिलाती है कि देश की आजादी केवल एक बड़े आंदोलन का परिणाम नहीं थी। इसके पीछे हजारों युवाओं, छात्रों और आम लोगों का साहस, संघर्ष और बलिदान छिपा था। त्रिवेणी सिंह की यह अनसुनी गाथा अगस्त क्रांति के उन गुमनाम नायकों की कहानी है, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की और देश की मिट्टी में मिलकर अमर हो गए। इतिहास के पन्नों पर स्याही से तो बहुत कुछ लिखा जाता है, लेकिन कुछ दास्तां ऐसी होती हैं जिन्हें लिखने के लिए वीर अपना खून बहाते हैं। यह गाथा है पटना के बिक्रम की माटी के उस जांबाज सपूत ‘शहीद त्रिवेणी सिंह’ की है, जिन्होंने तिरंगे की शान को बनाए रखने के लिए अपने माथे पर अंग्रेजी हुकूमत की गर्म गोलियां खा लीं। गांधी जी ने फूंका अगस्त क्रांति का बिगुल वो साल 1942 था। देश का सब्र अब पूरी तरह जवाब देने लगा था। दूसरे विश्व युद्ध के काले बादल मंडरा रहे थे। भारत आया क्रिप्स मिशन फेल हो गया था। अंग्रेज अपने वादे से एक बार फिर मुकर चुके थे। वे भारतीयों का समर्थन तो चाहते थे, लेकिन आजादी के बदले डोमिनियन स्टेट के खोखले आश्वासन दे रहे थे। भारत की जनता समझ चुकी थी कि गुलामी की ये बेड़ियां अब गिड़गिड़ाने से नहीं, बल्कि पूर्ण स्वराज के लिए आंदोलन से ही टूटेंगी। ऐसे में महात्मा गांधी ने मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान से एक फाइनल कॉल किया – अंग्रेजों भारत छोड़ो!”…। और इसी के साथ देश के युवाओं के रगों में जोश का संचार करते हुए एक मंत्र दिया – “करो या मरो!”। इस एक नारे ने पूरे देश में नई उर्जा का संचार कर दिया। बिहार के कोने-कोने तक भी इसी नई उर्जा का संचार हुआ और अगस्त क्रांति का केन्द्र राजधानी पटना बन गई। 11 अगस्त को पटना सचिवालय के सामने सात युवा छात्रों ने अपनी छाती पर अंग्रेजी हुकूमत की गोलियां खाकर तिरंगा फहराया। इस शहादत ने पूरे बिहार को हिलाकर रख दिया था। ब्रिटिश सरकार के इस दमन ने खौफ नहीं, बल्कि प्रतिशोध और देशभक्ति की आग सुलगा दी जो पटना के ग्रामीण इलाकों सहित पूरे बिहार में फैल गई। विक्रम में शहीद हुए त्रिवेणी सिंह और उनके दो साथी पटना सचिवालय पर 11 अगस्त को भले ही अंग्रेजों ने सात युवाओं को मौत के घाट उतारकर इस क्रांति को कुचलने का प्रयास किया था। लेकिन इन वीरों की शहादत पूरे बिहार में चिगांरी की तरह फैली। पटना के ग्रामीण इलाकों में भी युवाओं के मन में अब यूनियन जैक को नीचे उतारने और तिरंगे को फहराने का सपना घर करने लगा। 3 दिन बाद ही पटना के बिक्रम में एक ऐसा ही प्रयास फिर से हुआ। उस दिन बिक्रम में सुबह से ही एक अजीब सी बेचैनी और भारी उत्साह भरा हुआ था। गांवों से निकलकर लोग सड़कों पर जुटने लगे थे। ‘इंकलाब जिंदाबाद’, ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ के गगनभेदी उद्घोष के साथ स्वतंत्रता सेनानियों का एक विशाल हुजूम बिक्रम थाने की तरफ बढ़ रहा था। देश की आजादी का सपना संजोए त्रिवेणी सिंह भी इस आंदोलन में जुड़ना चाहते थे, लेकिन उम्र केवल 15 साल थी ऐसे में घर के बड़ें लोगों ने उन्हें रोका। लेकिन त्रिवेणी कहां रुकने वाले थे। सुबह करीब आठ बजे त्रिवेणी सिंह ने घर पर नाश्ता किया। इसके बाद परिवार के लोगों को बिना कुछ बताए अपने दो साथियो बुटाई राम और रंगनाथ सिंह के साथ चुके से इस आंदोलन में शामिल हो गए। उनका मकसद था बिक्रम थाना परिसर में घुसकर अंग्रेजी हुकूमत के सामने यूनियन जैक को हटाना और उसकी जगह देश की शान तिरंगा को फहराना। साथियों के साथ छिपते-छिपाते त्रिवेणी सिंह थाना के नजदीक पहुंच गए। इसी दौरान वहां मौजूद एक अंग्रेज कप्तान की नजर उन पर पड़ गई। अंग्रेज अधिकारी ने उन्हें रोकने की कोशिश की। लेकिन देश की आजादी के जुनून से भरे त्रिवेणी और उनके दोस्त पीछे हटने को तैयार नहीं थे। अग्रेजी पुलिसवाले तीनों लड़को को रोकने का प्रयास करते रहे और इसी जद्दोजहद में त्रिवेणी ने सड़क किनारे पड़ा एक पत्थर उठाया और अंग्रेज कप्तान की ओर फेंक दिया।वो पत्थर अंग्रेज कप्तान के सिर में जा लगा और उसके सिर से खून निकलने लगा। घटना के बाद वहां मौजूद अंग्रेज पुलिसकर्मियों के बीच अफरा-तफरी मच गई। अंग्रेज सिपाहियों ने त्रिवेणी सिंह को निशाना बनाकर गोली चला दी। उनके सिर में लगी और वे वहीं शहीद हो गए। ठीक उसी वक्त दूसरी और तीसरी गोली बुटाई राम और रंगनाथ सिंह को लगी। जिस उम्र में बच्चे अपने भविष्य के सपने देखते हैं, उस उम्र में त्रिवेणी सिंह और उनके साथियों ने भारत की आजादी के लिए अपना सर्वोच्च्य बलिदान दिया। त्रिवेणी और उनके साथियों के लहू ने बिक्रम की माटी का ऐसा तिलक किया जिसे इतिहास कभी मिटा नहीं सका। पटना और बिहार के इतिहास में त्रिवेणी सिंह, बुटाई राम और रंगनाथ सिंह हमेशा के लिए अमर हो गए। शादी के तीन साल बाद ही उजड़ गया परिवार त्रिवेणी सिंह की शहादत की कहानी सिर्फ देशभक्ति और संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक ऐसा पारिवारिक दर्द भी छिपा है, जिसे उनका परिवार आज तक याद करता है। त्रिवेणी सिंह के पोते सतेंद्र सिंह, सतीश कुमार और रामकिशोर शर्मा बताते हैं कि दादा त्रिवेणी सिंह की शादी उनकी शहादत से करीब तीन वर्ष पहले हुई थी। उस दौर में समाज में कई ऐसी परंपराएं थीं, जिनके कारण विवाह के बाद भी पति-पत्नी एक-दूसरे का चेहरा तक नहीं देखते थे। परिवार के अनुसार, त्रिवेणी सिंह अपनी पत्नी मुनाकि कुंवर का चेहरा तक नहीं देख पाए थे। शादी के कुछ ही वर्षों बाद देश की आजादी के लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया। जब त्रिवेणी सिंह की शहादत की खबर उनकी पत्नी और परिवार तक पहुंची तो घर में मातम छा गया। एक ओर देश ने अपना वीर सपूत खो दिया था, तो दूसरी ओर परिवार ने अपना बेटा और एक पत्नी ने अपना पति। इसके बाद मुनाकि कुंवर ने पूरी जिंदगी शहीद की विधवा के रूप में गुजारी। वर्ष 2022 में उनका भी निधन हो गया। आज परिवार के पास त्रिवेणी सिंह की यादें और उनकी शहादत की कहानी ही उनकी सबसे बड़ी विरासत है। बिक्रम शहीद चौक पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज है नाम देश आजाद हुआ तो त्रिवेणी सिंह जैसे अनगिनत गुमनाम और स्थानीय शहीदों के बलिदान को याद किया गया। बिक्रम के शहीद चौक पर त्रिवेणी सिंह का नाम अमर शहीद के रूप में सुनहरे अक्षरों में अंकित है। हर वर्ष 15 अगस्त और 26 जनवरी को काब गांव और आसपास के लोग बिक्रम शहीद चौक पहुंचते हैं और त्रिवेणी सिंह सहित आजादी की लड़ाई में शहीद हुए वीर सपूतों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। आज भी बिक्रम शहीद स्मारक पर तिरंगा शान से लहराता है। वहां पहुंचने वाले लोगों को 17 अगस्त 1942 के उन वीर सपूतों के अदम्य साहस और बलिदान की कहानी सुनाई जाती है। महज 15 वर्ष की उम्र में अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने वाले त्रिवेणी सिंह की कहानी आज भी यह याद दिलाती है कि देश की आजादी केवल एक बड़े आंदोलन का परिणाम नहीं थी। इसके पीछे हजारों युवाओं, छात्रों और आम लोगों का साहस, संघर्ष और बलिदान छिपा था। त्रिवेणी सिंह की यह अनसुनी गाथा अगस्त क्रांति के उन गुमनाम नायकों की कहानी है, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की और देश की मिट्टी में मिलकर अमर हो गए।


