गौ-माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग को लेकर ‘गविष्ट यात्रा’ पर निकले उत्तराखंड के ज्योतिष पीठ के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने एक नए विवाद को जन्म दिया। फतेहपुर प्रवास के दौरान उन्होंने ऐतिहासिक तांबेश्वर महादेव मंदिर के मुख्य गर्भगृह में प्रवेश करने और शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने से इनकार कर दिया। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्पष्ट किया कि मंदिर परिसर में साईं और ‘संतोषी माता’ की मूर्तियां स्थापित हैं। उन्होंने शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार इन्हें देवी नहीं माना। इसी शास्त्रीय मर्यादा का हवाला देते हुए उन्होंने गर्भगृह में जाकर महादेव के दर्शन नहीं किए। तय कार्यक्रम के अनुसार, शंकराचार्य को गुरुवार पूर्वाह्न 11 बजे मंदिर पहुंचकर गर्भगृह में पूजन करना था। हालांकि, सुबह अचानक उनके आगमन का समय बदलकर 8 बजे कर दिया गया। तमाम सुरक्षा और व्यवस्था के बीच स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद गुरुवार सुबह करीब साढ़े नौ बजे अपने विशेष वाहन से मंदिर परिसर पहुंचे। लेकिन, गर्भगृह के द्वार पर आकर उन्होंने भीतर जाने से मना कर दिया। बिंदकी पहुंचने पर उन्होंने मंदिर में पूजा न करने के अपने फैसले पर बात रखी। इस पूरे प्रवास के दौरान मंच और पंडाल में गैर-भाजपा दलों, विशेषकर कांग्रेस नेताओं का भारी जमावड़ा रहा। कार्यक्रम में कांग्रेस नेत्री श्रीमती संतोष कुमारी शुक्ला, सुधाकर अवस्थी, सरदार नरिंदर सिंह रिक्की, मणि प्रकाश दुबे (एडवोकेट), पीएस अवस्थी और शिवकांत तिवारी जैसे नेता उपस्थित रहे। उल्लेखनीय है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के ‘शंकराचार्य’ पद को लेकर संत समाज और अदालतों में एक लंबा विवाद चल रहा है। सितंबर 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के बाद उनके गुट ने तुरंत इनके नाम की घोषणा की थी। इसके खिलाफ संत समाज का एक हिस्सा सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। अक्टूबर 2022 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश जारी कर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के आधिकारिक ‘पट्टाभिषेक’ पर रोक लगा दी थी, और यह मुख्य विवाद वर्तमान में भी शीर्ष अदालत में विचाराधीन है।


