विश्वशांति, साहित्य और सामाजिक समरसता पर दो दिन चला मंथन, 109 शोध-पत्रों और ग्रंथ लोकार्पण ने बढ़ाई गरिमा

विश्वशांति, साहित्य और सामाजिक समरसता पर दो दिन चला मंथन, 109 शोध-पत्रों और ग्रंथ लोकार्पण ने बढ़ाई गरिमा

बड़ी संख्या में साहित्यकारों और शिक्षाविदों की उपस्थिति रही
समापन समारोह में प्रो. सीताराम के. पवार के शैक्षणिक, साहित्यिक और सामाजिक योगदान को प्रमुखता से रेखांकित किया गया। वक्ताओं ने कहा कि उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करते हुए अनेक विद्यार्थियों और शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया है। उनके सम्मान में आयोजित अभिनंदन समारोह में बड़ी संख्या में साहित्यकारों और शिक्षाविदों की उपस्थिति रही।

पवार का जीवन समाज और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
इस अवसर पर सोमलिंग स्वामी ने समाज सुधार और सांस्कृतिक मूल्यों पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जीवन में बढ़ते आडंबरों के बीच शिव संकल्प और सकारात्मक चिंतन की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति का आहार, विचार, संस्कार और संस्कृति ही उसके व्यक्तित्व की वास्तविक पहचान होते हैं। समाज में सूर्य के तेज की तरह सकारात्मक ऊर्जा फैलाने वाले कार्य होने चाहिए। उन्होंने बंजारा समाज की समरस जीवन शैली का उल्लेख करते हुए कहा कि सामाजिक जीवन में प्रेम, भाईचारा और समरसता का भाव बना रहना चाहिए। उन्होंने प्रो. सीताराम के. पवार के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका जीवन समाज और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। उन्होंने कहा कि इस अभिनंदन समारोह में शामिल होकर उन्हें अत्यंत खुशी हुई।

व्यक्तिगत जीवन में सकारात्मक बदलाव से विश्वशांति संभव
इस अवसर पर साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. अर्जुन चव्हाण ने कहा कि यदि हम चाहें तो दुनिया के लिए विश्वगुरु बन सकते हैं, लेकिन इसकी शुरुआत स्वयं से करनी होगी। उन्होंने कहा कि विश्वशांति केवल विचारों से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जीवन में सकारात्मक बदलाव से संभव है। जब व्यक्ति अपने भीतर शांति, सद्भाव और मानवीय मूल्यों को स्थान देगा, तभी समाज और विश्व में स्थायी शांति स्थापित हो सकेगी।

प्रवासी साहित्य और विश्वशांति जैसे विषयों पर गहन मंथन
दो दिवसीय इस संगोष्ठी में कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और केरल सहित कई राज्यों से आए विद्वानों ने कुल 109 शोध-पत्र प्रस्तुत किए। कन्नड़, हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, उर्दू तथा संस्कृत सहित विभिन्न भाषाओं में शोध-पत्रों का वाचन हुआ। तकनीकी सत्रों में समकालीन साहित्य, प्रवासी साहित्य और विश्वशांति जैसे विषयों पर गहन मंथन किया गया।

मानवीय संवेदनाओं को बढ़ावा देने की आवश्यकता
इस अवसर पर प्रो. सीताराम के. पवार, प्रसिद्ध साहित्यकार बी. टी. ललिता नायक, साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. महेश दिवाकर, कर्नाटक विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. मृत्युंजय अंगड़ी समेत अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने साहित्य को समाज परिवर्तन, मानवीय मूल्यों और विश्वशांति का सशक्त माध्यम बताते हुए कहा कि साहित्य केवल ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करने का माध्यम भी है। उन्होंने साहित्य के जरिए समाज में सकारात्मक बदलाव और मानवीय संवेदनाओं को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया।

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