7 Minute Cancer Injection: फेफड़ों के कैंसर के इलाज में अब एक नई उम्मीद सामने आई है। भारत में हाल ही में ऐसा इंजेक्शन लॉन्च किया गया है, जिसे सिर्फ 7 मिनट में दिया जा सकता है। पहले इसी दवा को नसों के जरिए शरीर में पहुंचाने में करीब 30 से 60 मिनट तक का समय लगता था। अब इस नई तकनीक से मरीजों को लंबे समय तक अस्पताल में बैठने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस नई थेरेपी का नाम टेसेंट्रिक है, जिसमें एटेजोलिजुमैब नाम की दवा इस्तेमाल की जाती है। यह इम्यूनोथेरेपी पर आधारित इलाज है, जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को कैंसर से लड़ने में मदद करता है।
कैंसर सर्जन डॉ. अंशुमान कुमार ने पत्रिका से बातचीत में बताया कि यह इंजेक्शन खासतौर पर उन मरीजों के लिए फायदेमंद हो सकता है, जिन्हें नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर (NSCLC) यानी फेफड़ों के कैंसर का एक आम प्रकार है। यह इलाज उन मरीजों को दिया जाता है जिनकी स्थिति, कैंसर का स्टेज और शरीर की प्रतिक्रिया डॉक्टर द्वारा जांचने के बाद उपयुक्त पाई जाती है।
किन मरीजों को मिल सकता है फायदा?
डॉ. कुमार के अनुसार, यह इंजेक्शन हर मरीज के लिए नहीं होता। इसे आमतौर पर उन मरीजों में इस्तेमाल किया जा सकता है-
- जिनमें नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर की पुष्टि हो चुकी हो
- जिनका कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल चुका हो या एडवांस स्टेज में हो
- जिन्हें इम्यूनोथेरेपी की जरूरत हो
- जिन मरीजों को बार-बार अस्पताल आने में परेशानी होती हो
- जो लंबे समय तक ड्रिप के जरिए दवा लेने में असहज महसूस करते हों
उन्होंने बताया कि यह इंजेक्शन शरीर की इम्यून सिस्टम को सक्रिय करने में मदद करता है ताकि शरीर खुद कैंसर सेल्स से लड़ सके।
इलाज में क्या होगा बड़ा बदलाव?
नई इंजेक्शन तकनीक से मरीजों का समय बचेगा और अस्पतालों में भी इलाज की प्रक्रिया तेज हो सकेगी। कई कैंसर मरीजों को हर कुछ हफ्तों में अस्पताल जाना पड़ता है और लंबे समय तक चेयर पर बैठकर दवा लेनी पड़ती है। ऐसे में 7 मिनट वाला इंजेक्शन मरीजों के लिए काफी राहत देने वाला माना जा रहा है।
डॉक्टर ने बताया कि कम समय में दवा देने से मरीजों का मानसिक तनाव भी कम हो सकता है। हालांकि डॉक्टर की सलाह के बिना इस इलाज को लेकर कोई फैसला नहीं लेना चाहिए। हर मरीज की मेडिकल स्थिति अलग होती है और उसी हिसाब से इलाज तय किया जाता है।
क्या हैं इसके साइड इफेक्ट?
डॉ. कुमार ने बताया कि दूसरे इम्यूनोथेरेपी इलाज की तरह इसमें भी कुछ साइड इफेक्ट हो सकते हैं। जैसे थकान, कमजोरी, भूख कम लगना, त्वचा पर रिएक्शन या सांस लेने में दिक्कत। इसलिए इलाज के दौरान डॉक्टर की निगरानी जरूरी होती है। कैंसर के इलाज में नई तकनीकें मरीजों की जिंदगी आसान बनाने की दिशा में बड़ा कदम हैं। लेकिन सही इलाज वही होता है जो मरीज की रिपोर्ट, स्टेज और स्वास्थ्य स्थिति को देखकर तय किया जाए।
डिस्क्लेमरः इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ऑपिनियन का विकल्प है। लेकिन पाठकों को सलाह दी जाती है कि वह कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से ना आजमाएं बल्कि इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।


