तीन दोस्तों ने मिलकर खोज निकाला प्लास्टिक-फ्री पैकेजिंग का तरीका, छोटी-सी लैब से शुरू कर बना डाली 2 करोड़ रुपये की कंपनी

तीन दोस्तों ने मिलकर खोज निकाला प्लास्टिक-फ्री पैकेजिंग का तरीका, छोटी-सी लैब से शुरू कर बना डाली 2 करोड़ रुपये की कंपनी

Plastic Free Packaging Startup: सालों से पैकेजिंग इंडस्ट्री प्लास्टिक, केमिकल इंक और सिंथेटिक गोंद पर टिकी हुई है। ऐसे में यह सोचना भी मुश्किल हो जाता है कि बिना प्लास्टिक के पैकेजिंग हो भी सकती है क्या। लेकिन पुणे के तीन दोस्तों ने इस चैलेंज को ही अपने लिए अवसर साबित किया। उनके पास न तो बड़ी फैक्ट्री थी और न ही करोड़ों की फंडिंग। उनके पास बस 100 स्क्वायर फीट की एक छोटी-सी लैब, कुछ लाख रुपये की बचत और पर्यावरण के लिए कुछ बड़ा करने का सपना था। आज यही स्टार्टअप 2 करोड़ रुपये का कारोबार कर रहा है और 100 से ज्यादा ब्रांड्स के साथ काम कर चुका है। साथ ही 200 टन से अधिक सिंगल-यूज प्लास्टिक को रिप्लेस कर चुका है। यह कहानी है Go Do Good की, जिसने एक छोटे से आइडिया को बड़ी सफलता में बदल दिया।

सफलता के पीछे तीन दोस्तों की मेहनत

इस कंपनी की सफलता के पीछे तीन दोस्तों का कड़ी मेहनत है। ये तीनों अलग-अलग कार्य क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं। कंपनी की शुरुआत खुशबू गांधी ने की थी। वह 12 साल से ज्यादा पैकेजिंग डिजाइनिंग में अनुभव रखती हैं। न्होंने मटेरियल डेवलपमेंट में मास्टर्स की पढ़ाई की है। दूसरे दोस्त का नाम चाणक्य मेध है। वह एक प्रोफेशनल क्रिकेटर रह चुके हैं और इंजीनियर होने के साथ-साथ बड़ौदा के लिए रणजी ट्रॉफी खेल चुके हैं। वह इस कंपनी की स्ट्रेटिजी और ग्रोथ वाले सेक्शन को संभालते हैं। तीसरे दोस्त का नाम रोनक गांधी है। इन्हें कॉरपोरेट की दुनिया में 16 साल का अनुभव है और वह कंपनी का पूरा पैसा और ऑपरेशंस संभालते हैं।

कहां से आया आइडिया?

खुशबू गांधी ने लगभग 12 साल तक उन्होंने Nivea जैसे बड़े ब्रांड्स से लेकर छोटे स्टार्टअप्स और लोकल रेस्टोरेंट्स तक के लिए पैकेजिंग डिजाइन की। काम करते-करते उन्हें महसूस हुआ कि भारत में वास्तव में ईको-फ्रेंडली पैकेजिंग के ऑप्शन बहुत कम हैं। कई बार ब्रांड्स चाहकर भी पूरी तरह इको-फ्रेंडली पैकेजिंग नहीं अपना पाते थे, क्योंकि बाजार में उपलब्ध ज्यादातर विकल्पों में कहीं न कहीं प्लास्टिक या ऐसे मटेरियल का इस्तेमाल होता था जो आसानी से रिसाइकिल नहीं हो सकते। इसी समस्या को देखते हुए खुशबू गांधी, चाणक्य मेध और रोनक गांधी ने मिलकर ईको-फ्रेडली पैकेजिंग स्टार्ट करने का फैसला लिया।

छोटी-सी लैब से शुरू हुआ सफर

इस आइडिया पर काम साल 2019 में शुरू हुआ और फाउंडर्स ने अलग-अलग पैकेजिंग मटेरियल्स पर रिसर्च करनी शुरू की। करीब दो साल की तैयारी और एक्सपेरिमेंट्स के बाद मार्च 2021 में पुणे में एक छोटे से किराए के कमरे से स्टार्टअप की शुरुआत हुई। कंपनी शुरू करने के लिए तीनों फाउंडर्स ने अपनी बचत से लगभग 8 से 10 लाख रुपये का निवेश किया और एक छोटी-सी R&D लैब तैयार की। शुरुआती दिनों में संसाधन बहुत सीमित थे, इसलिए कई महीनों तक लैब में लगातार नए-नए प्रयोग किए गए। बाद में जब काम आगे बढ़ने लगा, तब टीम को बढ़ाया गया और हायरिंग की गई।

प्लास्टिक पैकेजिंग का अल्टरनेटिव क्या मिला ?

कई सालों की रिसर्च और लगातार प्रयोगों के बाद Go Do Good ने ऐसे विकल्प विकसित किए जिन्होंने प्लास्टिक पैकेजिंग की जगह ली। कंपनी ने सीवीड और पौधों से बनी इको-फ्रेंडली इंक तैयार की। इमली के बीजों से प्राकृतिक गोंद बनाया और प्लांट-बेस्ड कोटिंग विकसित की। इसके अलावा, प्लास्टिक बबल रैप के ऑप्शन के लिए नारियल के रेशों से बना बायोडिग्रेडेबल कुशनिंग मटेरियल भी तैयार कियाष खास बात यह है कि ये सभी उत्पाद पूरी तरह प्लास्टिक-फ्री हैं और इस्तेमाल के बाद आसानी से प्राकृतिक रूप से नष्ट हो सकते हैं।

सबसे बड़ा चैलेंज क्या रहा?

शुरुआत में कंपनी के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों का भरोसा जीतना था। कई ब्रांड्स को लगता था कि सस्टेनेबल पैकेजिंग बहुत महंगी होगी या फिर उसकी क्वालिटी अच्छी नहीं होगी। ऐसे में Go Do Good ने सिर्फ प्रोडक्ट बेचने के बजाय लोगों को जागरूक करना शुरू किया। कंपनी ने वर्कशॉप्स, सैंपल किट और लाइव डेमो के जरिए ब्रांड्स को दिखाया कि उनकी पैकेजिंग प्लास्टिक जितनी ही मजबूत और उपयोगी है।

सैंपल किट वाला प्रयोग कपनी के लिए गेमचेंजर साबित हुआ। इसमें संभावित क्लाइंट्स को पैकेजिंग सैंपल भेजे जाते थे। ब्रांड्स इन सैंपल्स को छूकर, इस्तेमाल करके और टेस्ट करके देख सकते थे। इससे लोगों का भरोसा बढ़ा और धीरे-धीरे बड़े ऑर्डर मिलने लगे।

आज कितनी बड़ी बन चुकी है कंपनी?

छोटे स्तर पर शुरू हुई Go Do Good आज तेजी से बढ़ती हुई कंपनी बन चुकी है। कंपनी अब तक 100 से ज्यादा ब्रांड्स के साथ काम कर चुकी है और हर महीने करीब 15 से 20 ग्राहकों को संभाल रही है। कारोबार की बात करें तो शुरुआत में कंपनी की सालाना बिक्री केवल 5 लाख रुपये थी, लेकिन समय के साथ इसमें लगातार बढ़ोतरी हुई। 2024 में कंपनी का रेवेन्यू करीब 25 लाख रुपये रहा, जो अगले साल बढ़कर 50 से 60 लाख रुपये तक पहुंच गया। वहीं, 2026 में कंपनी ने 2 करोड़ रुपये का बिजनेस किया। बिजनेस के साथ-साथ कंपनी ने पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ा योगदान दिया है और अब तक 200 टन से ज्यादा सिंगल-यूज प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करने में मदद की है।

फिलहाल Go Do Good का मुख्य ऑफिस पुणे में है, जहां करीब 25 लोगों की टीम काम कर रही है। इसके अलावा कंपनी के बेंगलुरु, मुंबई और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में भी हाइब्रिड मॉडल हैं।

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