इंदौर में डॉक्टरों ने एक जटिल और दुर्लभ चिकित्सा सर्जरी कर महिला के पेट से फुटबॉल के आकार की बड़ी गांठ निकालकर नया जीवन दिया। कुछ दिनों बाद पेट में तेज दर्द और अत्यधिक रक्तस्राव की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंची थी। जांच में पता चला कि उसके पेट में करीब आठ माह की गर्भावस्था जितनी बड़ी फाइब्रॉइड गांठ डेवलप हो चुकी है। दिमाग की गंभीर बीमारी के बाद बढ़ी चुनौती मामला ज्योति मौर्य (45) निवासी इंदौर का है। उनका यह केस इसलिए और अधिक जटिल हो गया क्योंकि महिला ज्योति मौर्य (45) करीब चार महीने पहले गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्या से भी गुजर चुकी थी। दरअसल जनवरी में महिला बीएलओ ड्यूटी के दौरान बेहोश होकर गिर गई थी। मां बोलीं- ड्यूटी से बचने का बहाना समझ रहे थे लोग मां शकुंतला के मुताबिक, जब यह घटना हुई थी तो उसके बाद उसकी हालत को लेकर यह सवाल उठने लगे थे कि वह ड्यूटी नहीं करने के लिए बहाने बना रही है। फिर उसे केयर सीएचएच हॉस्पिटल दिखाया गया। यहां जांच में उसके ब्रेन में कई स्थानों पर ‘वीनस हेमोरैजिक इन्फार्क्ट’ पाए गए थे। इस दौरान न्यूरोलॉजॉजिस्ट डॉ. मनोरंजन बरनवाल की निगरानी में मरीज का इलाज किया गया। विशेषज्ञ टीम ने बनाया प्लान महिला की स्थिति स्थिर होने के बाद विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने 17 मई को सर्जरी प्लान की। ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों ने 3 किलो वजनी विशाल फाइब्रॉइड और बच्चेदानी को निकाल दिया। सर्जरी के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव को नियंत्रित रखना और मरीज की सुरक्षा सुनिश्चित करना मेडिकल टीम के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी, जिसे सफलतापूर्वक संभाला गया। ब्लड थिनर के कारण बढ़ा था जोखिम डॉ. नीना अग्रवाल (सीनियर कंसल्टेंट गायनेकोलॉजी लैप्रोस्कोपिक सर्जन) ने बताया कि महिला हाल ही में वीनस हेमोरैजिक इन्फार्क्ट से उबरी थी और ब्लड थिनर दवाएं ले रही थी। ऐसे में सर्जरी का सही समय तय करना बेहद महत्वपूर्ण था। मल्टीडिसिप्लिनरी टीम के प्लान और समन्वय के बाद सुरक्षित तरीके से ऑपरेशन किया गया। वह 12 दिनों तक हॉस्पिटल में एडमिट रही। अभी मरीज की हालत स्थिर है और उसे निगरानी में रखा गया है। गांठ और बच्चेदानी को बायोप्सी के लिए भेजा गया है। न्यूरोलॉजी और एनेस्थीसिया टीम का रहा समन्वय न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. मनोरंजन बरनवाल ने बताया कि मरीज पहले से गंभीर न्यूरोलॉजिकल स्थिति से गुजर चुकी थी, इसलिए इलाज के दौरान हर कदम बेहद सावधानी से उठाना जरूरी था। ब्लड थिनर (खून पतला करने की दवाई) के कारण सर्जरी का जोखिम काफी अधिक था। न्यूरोलॉजी, गायनेकोलॉजी और एनेस्थीसिया टीम के समन्वय से मरीज की स्थिति पर लगातार नजर रखी गई और सही समय पर सुरक्षित सर्जरी संभव हो सकी। इंदौर में ही मिल रहा हाई-एंड इलाज सीओओ मनीष गुप्ता ने कहा कि समय पर जांच, सही उपचार योजना और विशेषज्ञ टीम के समन्वय से जटिल परिस्थितियों में भी मरीजों को सुरक्षित इलाज दिया जा सकता है।


