दक्षिण भारत में हिंदी की नई पहचान: प्रो. पवार ने नवाचारों से बदली शोध और शिक्षा की तस्वीर

दक्षिण भारत में हिंदी की नई पहचान: प्रो. पवार ने नवाचारों से बदली शोध और शिक्षा की तस्वीर

सवाल: दक्षिण भारत में हिंदी को आगे बढ़ाना कितना चुनौतीपूर्ण रहा?
पवार:
दक्षिण भारत में हिंदी के प्रति रुचि तो थी, लेकिन उसे व्यवस्थित शैक्षणिक मंच देने की आवश्यकता थी। हमारा प्रयास रहा कि हिंदी केवल भाषा बनकर न रहे, बल्कि शोध, संवाद और समाज से जुडऩे का माध्यम बने। हमने विद्यार्थियों को रोजगार, शोध और समकालीन विषयों से जोडऩे की दिशा में कार्य किया।

सवाल: हिंदी विभाग में आपने कौन-कौन से नवाचार किए?
पवार:
पिछले बारह वर्षों में विभाग में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों की एक नई परंपरा शुरू की गई। समकालीन भारतीय साहित्य, किसान, श्रमिक, आदिवासी, महिला, किन्नर, पर्यावरण और सामाजिक विमर्श जैसे विषयों को केंद्र में रखकर कार्यक्रम आयोजित किए गए। इससे हिंदी विभाग का दायरा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैचारिक संवाद का मंच बन गया।

सवाल: ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए क्या विशेष प्रयास किए गए?
पवार:
मेरी प्राथमिकता हमेशा ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों को आगे लाना रही। हमने उन्हें स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएच.डी. शिक्षा के लिए प्रेरित किया। आज विभाग में हर वर्ष 50 से 60 विद्यार्थी स्नातकोत्तर और लगभग 20 विद्यार्थी पीएच.डी. कर रहे हैं। यह हिंदी शिक्षा के विस्तार की बड़ी उपलब्धि है।

सवाल: आपका अपना संघर्ष आपको क्या सिखाता है?
पवार:
मेरा जन्म एक गरीब बंजारा परिवार में हुआ। कठिन परिस्थितियों में शिक्षा प्राप्त की। संघर्ष ने मुझे सिखाया कि परिस्थितियां बाधा नहीं, बल्कि आगे बढऩे की प्रेरणा बन सकती हैं। इसलिए आज भी मैं विद्यार्थियों को यही संदेश देता हूं कि शिक्षा ही सबसे बड़ी शक्ति है।

सवाल: आने वाले समय में हिंदी विभाग की क्या योजनाएं हैं?
पवार:
हमारा प्रयास विभाग को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत बनाना है। इसी कड़ी में आगामी दिनों में विश्वशांति में समकालीन भारतीय साहित्य एवं प्रवासी साहित्य का योगदान विषय पर षष्ठम अंतरराष्ट्रीय विचार संगोष्ठी आयोजित की जा रही है।

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