Petrol-Diesel Crisis: जोधपुर में गहराया पेट्रोल-डीजल संकट, 15 पंप सूखने की कगार पर, गांवों में स्थिति गंभीर

Petrol-Diesel Crisis: जोधपुर में गहराया पेट्रोल-डीजल संकट, 15 पंप सूखने की कगार पर, गांवों में स्थिति गंभीर

जोधपुर। पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने के बाद अब तेल कंपनियों ने आपूर्ति पर भी नियंत्रण शुरू कर दिया है। शहर और ग्रामीण इलाकों में हालात ऐसे बन गए हैं कि कई पेट्रोल पंपों पर तेल नाममात्र ही बचा है। शहर के करीब 50 पेट्रोल पंपों में से 15 पंप ड्राई होने की स्थिति में पहुंच गए, जबकि ओसियां और फलोदी रूट पर लगभग 80 प्रतिशत पंपों पर पेट्रोल-डीजल बेहद कम रह गया है।

पेट्रोल-डीजल पर ‘कंट्रोल सप्लाई’

स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि शहर की परिधि पर स्थित कई पंपों पर दुपहिया चालकों को केवल 200 रुपए और कार चालकों को 500 रुपए तक का ही पेट्रोल-डीजल दिया गया। भारी वाहन चालकों को भी सीमित मात्रा में डीजल उपलब्ध कराया गया। ग्रामीण क्षेत्रों से ट्रक और अन्य वाहन शहर में डीजल लेने पहुंचे, लेकिन यहां भी उन्हें 100 लीटर तक की सीमा में ही डीजल दिया गया।

वाहन चालकों को वापस लौटाया

जोधपुर शहर के हाउसिंग बोर्ड दूसरा पुलिया स्थित पंप, प्रतापनगर चौराहा पंप, शास्त्रीनगर और परिधीय क्षेत्रों के कई पंपों पर सोमवार शाम तक टंकियां लगभग खाली हो गईं। यहां वाहन चालकों को वापस लौटाया गया। कई स्थानों पर डिस्पेंसर चालू होने के बावजूद आपूर्ति सीमित रखी गई ताकि अचानक पंप बंद होने की स्थिति नहीं बने। तेल कंपनियां अब ऐसी रणनीति पर काम कर रही हैं, जिसमें पेट्रोल पंप पूरी तरह खाली भी न दिखें और उन्हें पर्याप्त स्टॉक भी नहीं दिया जाए। पहले जहां एक पंप को नियमित रूप से टैंकर उपलब्ध कराए जाते थे, वहीं अब दो से तीन दिन में एक टैंकर भेजा जा रहा है।

सालावास डिपो पर रात में टैंकरों की लगी लाइन

सालावास स्थित तेल डिपो पर भी असामान्य स्थिति दिखाई दी। सोमवार रात को ही टैंकर चालक मंगलवार सुबह तेल भरवाने की उम्मीद में लाइन लगाकर खड़े हो गए। खास बात यह रही कि जहां पहले देर रात तक टैंकरों में भराई होती थी, वहीं सोमवार को दोपहर करीब दो बजे ही डिपो का ऑटोमेशन सिस्टम बंद कर दिया गया। इसके बाद टैंकरों की आवाजाही लगभग रुक गई।

ग्रामीण इलाकों में ज्यादा असर

डांगियावास, धवा, भांडू और ओसियां-फलोदी बेल्ट के 80 प्रतिशत पेट्रोल पंप सोमवार शाम तक लगभग खाली हो गए। ग्रामीण परिवहन और कृषि कार्यों पर इसका सीधा असर पड़ने लगा है। कई वाहन चालक खाली टंकियों के साथ शहर तक पहुंचने को मजबूर हुए।

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