पोकरण (जैसलमेर): खाकी वर्दी का चेहरा अक्सर सख्त दिखाई देता है। लेकिन इसी वर्दी के भीतर ममता का एक बेहद कोमल संसार भी धड़कता है। पोकरण और भणियाणा क्षेत्र में तैनात महिला कांस्टेबल इन दिनों मातृत्व और पुलिस सेवा के अद्भुत संतुलन की ऐसी तस्वीर पेश कर रही हैं, जो संवेदनाओं और जिम्मेदारियों का दुर्लभ संगम बन चुकी है।
मातृ दिवस के अवसर पर सामने आई इन तस्वीरों में कहीं मां थाने में ड्यूटी निभा रही है, तो कहीं वही मां बच्चे को गोद में लेकर उसे दुलारती नजर आती है। कानून व्यवस्था की जिम्मेदारियों, लंबी ड्यूटी और सतर्कता के बीच बच्चों की परवरिश संभालना महिला पुलिसकर्मियों के लिए रोज की चुनौती है, लेकिन वे इस जिम्मेदारी को मजबूती और आत्मविश्वास से निभा रही हैं।
भणियाणा थाने में कार्यरत महिला कांस्टेबल मीना चौधरी अपने सात वर्षीय पुत्र रियांशु की देखभाल के साथ पुलिस सेवा में सक्रिय हैं। विद्यालय की छुट्टी के बाद कई बार रियांशु थाने पहुंच जाता है।

थाने के वातावरण में मां की ममता और वर्दी का अनुशासन एक साथ दिखाई देता है। मीना चौधरी कहती हैं कि पुलिस सेवा में समय का कोई निश्चित दायरा नहीं होता। कभी अचानक ड्यूटी बढ़ जाती है तो कभी रातभर सक्रिय रहना पड़ता है। लेकिन बच्चे की मुस्कान हर थकान को हल्का कर देती है।
पोकरण की कालिका पेट्रोलिंग यूनिट में कार्यरत महिला कांस्टेबल संतोष अपनी तीन वर्षीय पुत्री निव्या की परवरिश के साथ नियमित ड्यूटी निभा रही हैं। पेट्रोलिंग और सुरक्षा व्यवस्था के बीच बच्ची की देखभाल करना उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बन गया है। वे मानती हैं कि मां बनने के बाद जिम्मेदारियां बढ़ती हैं, लेकिन वही जिम्मेदारियां जीवन को और मजबूत भी बनाती हैं।

इसी यूनिट में तैनात महिला कांस्टेबल दमयंती अपने सात वर्षीय पुत्र लक्षित की देखभाल के साथ ड्यूटी कर रही हैं। उनका कहना है कि जब एक ओर वर्दी का फर्ज हो और दूसरी ओर बच्चे का भविष्य, तब हर दिन नई परीक्षा जैसा लगता है। इसके बावजूद महिला पुलिसकर्मी हर परिस्थिति में खुद को मजबूत बनाए रखती हैं।

धैर्य, संवेदनशीलता और सतर्कता की जरूरत
महिला कांस्टेबलों का कहना है कि मातृत्व और पुलिस सेवा दोनों में धैर्य, संवेदनशीलता और सतर्कता की जरूरत होती है। एक ओर आमजन की सुरक्षा की जिम्मेदारी रहती है, तो दूसरी ओर बच्चों की भावनात्मक दुनिया भी जुड़ी होती है।
मरुस्थलीय क्षेत्र में लगातार पेट्रोलिंग, कानून व्यवस्था और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच महिला पुलिसकर्मियों का यह संघर्ष केवल ड्यूटी नहीं, बल्कि समर्पण और साहस की जीवित कहानी बन चुका है। जानकारों के अनुसार, मातृ दिवस पर उनकी यह भूमिका समाज में कामकाजी महिलाओं की शक्ति और संवेदनशीलता का मजबूत संदेश देती नजर आ रही है।
मां बनकर बिताया दिन, प्रत्युषा ने समझे त्याग
मातृ शक्ति केवल एक संबोधन नहीं, बल्कि त्याग, अनुशासन, संवेदनाओं और अनवरत श्रम का जीवंत स्वरूप है। इसी भावना को आत्मसात करते हुए प्रत्युषा जंगा ने एक दिन अपनी मां मीनाक्षी जंगा की तरह पूरा दिन बिताकर उनके कार्यों और जिम्मेदारियों को नजदीक से समझने का प्रयास किया। इस अनुभव ने उन्हें मां के संघर्ष, धैर्य और बहुआयामी व्यक्तित्व की गहराई से परिचित कराया।
प्रत्युषा ने बताया कि उनका दिन सुबह पांच बजे पिता के लिए चाय बनाने से शुरू हुआ। इसके बाद घर के प्रत्येक कार्य की निरंतरता ने उन्हें यह अहसास कराया कि मां का जीवन कभी ठहरता नहीं। हर पल एक नई जिम्मेदारी सामने खड़ी रहती है और हर जिम्मेदारी को पूरी सजगता व प्रेम से निभाना आसान नहीं होता।

दिन भर उन्होंने कभी शिक्षिका बनकर बच्चों की पढ़ाई संभाली तो कभी घर के खर्चों का सटीक हिसाब लगाकर गृह प्रबंधन की जिम्मेदारी निभाई। रसोई, साफ-सफाई, परिवार की जरूरतों का ध्यान और समय के अनुसार हर कार्य को व्यवस्थित करना उनके लिए एक अनूठा अनुभव बन गया।
प्रत्युषा ने कहा कि अब उन्हें समझ आया कि मां को शक्ति, सरस्वती और लक्ष्मी का स्वरूप क्यों माना जाता है। परिवार की हर जरूरत को संभालते हुए मां एक साथ कई भूमिकाएं निभाती है। शायद इसी कारण भारतीय संस्कृति में मां को अष्टभुजाधारिणी के रूप में भी दर्शाया गया है। अपने अनुभव को भावुक शब्दों में व्यक्त करते हुए प्रत्युषा ने कहा, यह अनुभव केवल एक दिन का नहीं, बल्कि मां के अथाह समर्पण को समझने की भावनात्मक यात्रा के रूप में जीवन भर अविस्मरणीय रहेगा।
- बनकर एक दिन जाना
- क्यों तुझे पूजा सबने
- हर दिन जीती तुम रूप हजार धारण कर घर में
- एक दिन में ही जान गई मैं
- अनुभव कुछ तो पा गई मैं।।


