लखनऊ स्थित बिरजू महाराज कथक संस्थान में गुरुवार को ‘व्याख्यान-सह प्रदर्शन’ कार्यक्रम का आयोजन हुआ। कार्यक्रम का विषय था- ‘दृश्य कला के सौन्दर्य तत्व: नृत्य के संदर्भ में।’ संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में कला, नृत्य और सौंदर्य के विभिन्न आयामों पर विस्तार से चर्चा हुई। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. सुनील कुमार विश्वकर्मा रहे। उन्होंने अपने व्याख्यान में भारतीय कला और नृत्य के सौंदर्य सिद्धांतों को सरल भाषा में समझाया। उन्होंने कहा कि संचारी भाव, विभाव और अनुभाव से रस की उत्पत्ति होती है और रस का अंतिम उद्देश्य आनंद प्रदान करना है। कला का मूल कार्य भी मनुष्य को आनंद देना ही है। नर्तक अपनी अभिव्यक्ति से अकथ्य को कथ्य बना देता है डॉ. विश्वकर्मा ने कहा कि नर्तक अपनी अभिव्यक्ति के माध्यम से अकथ्य को भी कथ्य बना देता है। कलाकार तभी कला की पूर्णता को प्राप्त कर सकता है, जब उसके भीतर का अहं समाप्त हो जाए। उनके विचारों ने उपस्थित विद्यार्थियों और कला प्रेमियों को गहराई से प्रभावित किया।
भारतीय नृत्य परंपरा और गहराई से परिचित कराया कार्यक्रम का संचालन संस्थान की प्रशिक्षिका डॉ. उपासना दीक्षित ने किया। संस्थान के विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षकों और कर्मचारियों ने उत्साह के साथ कार्यक्रम में भाग लिया। व्याख्यान और प्रदर्शन ने कला प्रेमियों को भारतीय नृत्य परंपरा के सौंदर्य और गहराई से परिचित कराया। आयोजन को ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायी बताया गया। कार्यक्रम में भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. माण्डवी सिंह, संस्थान की अध्यक्ष डॉ. कुमकुम धर और उपाध्यक्ष डॉ. मिथिलेश तिवारी की गरिमामयी उपस्थिति रही।


