एससी महिला धर्म परिवर्तन कर ओबीसी आरक्षित सीट से बनी सरपंच !

एससी महिला धर्म परिवर्तन कर ओबीसी आरक्षित सीट से बनी सरपंच !

सतना। सोहावल जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत बारीखुर्द में सरपंची को लेकर बडा विवाद सामने आया है, जिससे जिले में हुए पंचायती चुनाव की निष्पक्षता और वैधता पर सवाल खड़े हो गए हैं। बारी खुर्द पंचायत ओबीसी महिला वर्ग के लिए आरक्षित थी लेकिन यहां से एससी वर्ग की महिला को बिना जाति प्रमाण पत्र के महज एक शपथ पत्र के हवाले से ओबीसी मानते हुए इसका निर्वाचन फार्म तत्कालीन रिटर्निंग अधिकारी ने स्वीकार कर लिया। जिसमें महिला ने अपना धर्म परिवर्तन करने का हवाला देकर एससी से ओबीसी होने की जानकारी दी थी। यह एससी महिला चुनाव जीत गई और बारीखुर्द पंचायत की सरपंच है। हाल ही यहां इस ग्राम पंचायत में हुए एक विवाद के बाद यह मामला सामने आया है, जिससे पूरी चुनाव प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई है।

ओबीसी महिला वर्ग के लिए आरक्षित थी सीट

जानकारी के अनुसार त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर सरपंच पद के लिए जब आरक्षण प्रक्रिया की गई थी, उस वक्त बारीखुर्द पंचायत पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) महिला वर्ग के लिए आरक्षित हुई थी। अर्थात में बारीखुर्द पंचायत में सरपंच पद के लिए ओबीसी वर्ग की महिला उम्मीदवार ही निर्वाचन फार्म भर सकती थी। लेकिन यहां रिटर्निंग अधिकारी की मिली भगत से बड़ा खेल करते हुए एससी वर्ग की महिला नामांकन दाखिल करने में सफल हो गई।

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महज इस शपथ पत्र के सहारे नामांकन पत्र में ओबीसी मान ली गई एससी वर्ग की महिला

जाति प्रमाण पत्र अनिवार्य लेकिन यहां हुई अनदेखी

आरक्षित वर्ग के लिए चुनाव लड़ने वाले अभ्यर्थी के लिए जाति प्रमाण पत्र अनिवार्य होता है। बारीखुर्द से सरपंच पद का चुनाव लड़ने वाली मोलिया पत्नी बालगोविंद चौधरी (43) ने अपना जाति प्रमाण पत्र न लगाकर उसके स्थान पर एक शपथ पत्र लगा दिया। जिसमें मोलिया ने कहा था कि मेरी पूर्व की जाति अनुसूचित जाति थी। लेकिन मैंने धर्म परिवर्तन कर बौद्ध धर्म अपना लिया है। जिससे बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाली अनुसूचित जातियों को म.प्र. शासन द्वारा घोषित पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल किया गया है जो घोषित सूची क्रमांक 81 में दर्ज है। यहां महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिस सूची क्रमांक 81 का जिक्र किया गया है वह मूल बौद्ध की तय श्रेणियों के लिए है न कि नव बौद्ध धर्म स्वीकार करने वालों के लिए। लेकिन तत्कालीन रिटर्निंग ऑफीसर ने न तो इस तथ्य पर गौर किया और अनिवार्य माने जाने वाले जाति प्रमाण पत्र न होने के मामले पर भी अनदेखी की। नतीजा यह हुआ को मोलिया बौद्ध ने कमलेश सोनी से 55 मतों से विजय हासिल कर ली।

अब पद से हटने की लटकी तलवार

विधिक जानकारों के अनुसार म.प्र. पंचायत राज अधिनियम 1993 की धारा 36 उपधारा 1 खंड ट और ठ में प्रावधानित है कि आरक्षण के विरुद्ध गलत प्रमाण पत्र दिया जाता है तो इसके तहत कलेक्टर को आवेदन दिया जा सकता है। कलेक्टर अधिनियम की धारा 36 की उपधारा 2 के तहत गलत जाति पाए जाने पर निर्वाचन शून्य कर सकते हैं। लिहाजा अगर कोई शिकायत होती है तो मोलिया की सरपंची जा सकती है।

विवाद से खुली कलई

दरअसल बारीखुर्द पंचायत से लगे बाबूपुर में महारत्न कंपनी सेल की एक बड़ी जमीन है। इस जमीन पर कब्जे की नीयत से अंबेडकर प्रतिमा स्थापित कर दी गई जबकि यहां यथास्थिति बनाए रखने का आदेश था। इसके बाद विगत दिवस प्रतिमा को खंडित करने की बात कहते हुए विवाद खडा़ कर दिया गया। जिसमें सरपंच की भूमिका भी सवालों में आ गई। जिसके बाद स्थानीय लोगों ने सरपंच की जाति और निर्वाचन पर सवाल खड़े कर दिए। दरअसल मोलिया के पति बालगोविंद चौधरी की गिनती क्षेत्र के दबंगों में होती है और उन पर कई अपराध दर्ज है। सरकारी जमीन पर अंबेडकर प्रतिमा यथा स्थिति के आदेश के बाद भी स्थापित करने में इनका नाम काफी चर्चा में आ रहा है।

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