केवीके परसौनी के मृदा विशेषज्ञ डॉ. आशीष राय ने किसानों को सलाह दी है कि गर्मी के मौसम में गहरी जुताई और हरी खाद का उपयोग कर खेतों की उर्वरा शक्ति को बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि बिहार के उत्तर मैदानी क्षेत्रों में यह प्रक्रिया बेहद लाभकारी साबित होती है और इससे अगली फसल की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। डॉ राय ने बताया कि लगातार खेती और सिंचाई के कारण मिट्टी के नीचे सख्त परत बन जाती है, जिससे फसलों की जड़ों का विकास प्रभावित होता है। गहरी जुताई इस परत को तोड़कर मिट्टी को भुरभुरा और हवादार बनाती है, जिससे जड़ों को फैलने में आसानी होती है। साथ ही, इससे वर्षा जल का बेहतर संचयन होता है और जलभराव की समस्या भी कम होती है। उन्होंने कहा कि गर्मी के मौसम में 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान मिट्टी में छिपे कीटों और रोग जनकों को नष्ट करने में सहायक होता है। गहरी जुताई से कीटों के अंडे और लार्वा सतह पर आ जाते हैं, जो तेज धूप के कारण खत्म हो जाते हैं या पक्षियों का भोजन बन जाते हैं। इससे आने वाली फसल में रोगों का खतरा काफी कम हो जाता है। खरपतवार नियंत्रण के लिहाज से भी गहरी जुताई प्रभावी है। मोथा और दूब जैसी जिद्दी घास की जड़ें ऊपर आकर सूख जाती हैं और नष्ट हो जाती हैं। साथ ही, मिट्टी में दबे खरपतवार के बीज भी अंकुरण क्षमता खो देते हैं। मृदा विशेषज्ञ ने हरी खाद के उपयोग पर जोर देते हुए बताया कि यह मिट्टी को प्राकृतिक रूप से पोषक तत्व प्रदान करती है।ढैंचा सनै लोबिया और मूंग जैसी फसलें हरी खाद के लिए उपयुक्त हैं। इन्हें अप्रैल से मई के बीच बोकर 45 से 60 दिनों में फूल आने से पहले मिट्टी में जोत देना चाहिए। हरी खाद के प्रयोग से मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है, ह्यूमस का स्तर सुधरता है और जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और लागत में भी कमी आती है। डॉ राय ने किसानों से अपील की कि वे मई-जून में मोल्ड बोर्ड हल या डिस्क हल से गहरी जुताई करें और ढाल वाली जमीन पर विपरीत दिशा में जुताई कर मिट्टी के कटाव से बचाव करें। उन्होंने कहा कि सही तकनीक अपनाकर किसान अपनी भूमि की उत्पादकता को लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं। केवीके परसौनी के मृदा विशेषज्ञ डॉ. आशीष राय ने किसानों को सलाह दी है कि गर्मी के मौसम में गहरी जुताई और हरी खाद का उपयोग कर खेतों की उर्वरा शक्ति को बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि बिहार के उत्तर मैदानी क्षेत्रों में यह प्रक्रिया बेहद लाभकारी साबित होती है और इससे अगली फसल की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। डॉ राय ने बताया कि लगातार खेती और सिंचाई के कारण मिट्टी के नीचे सख्त परत बन जाती है, जिससे फसलों की जड़ों का विकास प्रभावित होता है। गहरी जुताई इस परत को तोड़कर मिट्टी को भुरभुरा और हवादार बनाती है, जिससे जड़ों को फैलने में आसानी होती है। साथ ही, इससे वर्षा जल का बेहतर संचयन होता है और जलभराव की समस्या भी कम होती है। उन्होंने कहा कि गर्मी के मौसम में 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान मिट्टी में छिपे कीटों और रोग जनकों को नष्ट करने में सहायक होता है। गहरी जुताई से कीटों के अंडे और लार्वा सतह पर आ जाते हैं, जो तेज धूप के कारण खत्म हो जाते हैं या पक्षियों का भोजन बन जाते हैं। इससे आने वाली फसल में रोगों का खतरा काफी कम हो जाता है। खरपतवार नियंत्रण के लिहाज से भी गहरी जुताई प्रभावी है। मोथा और दूब जैसी जिद्दी घास की जड़ें ऊपर आकर सूख जाती हैं और नष्ट हो जाती हैं। साथ ही, मिट्टी में दबे खरपतवार के बीज भी अंकुरण क्षमता खो देते हैं। मृदा विशेषज्ञ ने हरी खाद के उपयोग पर जोर देते हुए बताया कि यह मिट्टी को प्राकृतिक रूप से पोषक तत्व प्रदान करती है।ढैंचा सनै लोबिया और मूंग जैसी फसलें हरी खाद के लिए उपयुक्त हैं। इन्हें अप्रैल से मई के बीच बोकर 45 से 60 दिनों में फूल आने से पहले मिट्टी में जोत देना चाहिए। हरी खाद के प्रयोग से मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है, ह्यूमस का स्तर सुधरता है और जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और लागत में भी कमी आती है। डॉ राय ने किसानों से अपील की कि वे मई-जून में मोल्ड बोर्ड हल या डिस्क हल से गहरी जुताई करें और ढाल वाली जमीन पर विपरीत दिशा में जुताई कर मिट्टी के कटाव से बचाव करें। उन्होंने कहा कि सही तकनीक अपनाकर किसान अपनी भूमि की उत्पादकता को लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं।


