परशुराम ने कहा था- अन्याय को सहन करते चले जाना पाप है

परशुराम ने कहा था- अन्याय को सहन करते चले जाना पाप है

गेस्ट राइटर डाॅ.मुरलीधर चांदनीवाला

रतलाम। नैतिक व्यवस्था की मांग को लेकर सदियों से समाज में जो वैचारिक युद्ध चलता आया है,उसके जनक परशुराम हैं। मानव-सभ्यता के इतिहास में परशुराम पहले क्रान्तिकारी हैं, जिन्होंने सत्य की रक्षा के लिये युद्ध को अनिवार्य बताया था। परशुराम ने कहा था कि अन्याय को सहन करते चले जाना पाप है। संघर्ष किये बिना इस पाप से मुक्त नहीं हुआ जा सकता। यह धरती उन राजसी शक्तियों के नीचे दबी पड़ी है, जिन्होंने मनुष्यता को कुचला है और सत्य को अपना मुँह खोलने नहीं दिया।

परशुराम स्पष्ट रूप से वर्णव्यवस्था को अनुचित मानते थे। उनके पिता जमदग्नि ने वर्णेतर स्त्री से विवाह किया। शस्त्र विद्या सिखाते समय परशुराम ने ब्राह्मणों के साथ समान रूप से क्षत्रियों और शूद्रों को भी सुपात्र समझा। इसके असंख्य उदाहरण मिलते हैं। परशुराम जीवन”भर मनुष्यता के लिये नीतिशास्त्र बनाने में लगे रहे। अत्रि की पत्नी अनसूया, अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा और अपने प्रिय शिष्य अकृतवर्ण के साथ मिलकर परशुराम नारी-जागरण अभियान चलाने वाले सबसे पहले क्रान्तिकारी थे।

परशुराम वैदिकयुग और ब्राह्मणयुग के संधिपुरुष हैं। वे एकमात्र ऋषि हैं, जो अवतारों में गिने गये। इसमें कुछ भी संदेह नहीं कि परशुराम विष्णु के आवेशावतार हैं। परशुराम शास्त्र में जीते हैं, किंतु अन्याय का सामना करने के लिये शस्त्र को पूजा की वस्तु नहीं मानते। बुद्धिजीवी होकर हाथ पर हाथ धरे बैठने वालों को अक्षम्य ठहराते हैं, और अन्यायी के विरुद्ध आवाज उठाने को उचित मानते हैं।

परशुराम वैदिक मंत्रों के रचयिता हैं। उन्होंने बहुत सारे मंत्र अपने पिता जमदग्नि के साथ साझा किये हैं। ऋग्वेद के दशम मंडल में इस जमदग्निपुत्र की जितनी ऋचाएँ मिलती हैं, उनमें पहली बार उस ब्रह्मतेज का आलोक दिखाई देता है।

इतिहास में सबसे पहले राम तो यही हुए। परशु धारण करने के कारण ही ये परशुराम कहलाए। परशु ही क्यों ? क्योंकि उसी दौर में लोहे की खोज हुई और लोहे के आयुध सामने आये थे। अन्यथा एक दौर तो वह रहा है, जब मानव-अस्थियों से वज्र बनाये जाने के उदाहरण मिलते हैं।

परशुराम ने युगधर्म का निर्वाह करने के लियेक्रोध की आवश्यकता को नैतिक करार दिया। बाली और रावण के विनाश में यही नीतिशास्त्र श्रीराम के काम आया। परशुराम की ब्रह्मनिष्ठ वीरता का संदेश कृष्ण ने गीता में अर्जुन को दिया। परशुराम ने बताया कि योद्धा में ही भगवान् होने की योग्यता है। अन्याय को सहन करने वाला और दब कर पड़ा रह जाने वाला मनुष्य मरा हुआ है। भले ही उसने उच्चकुल में जन्म ले लिया हो, वह सम्मान का अधिकारी नहीं है।

दशावतारों में परशुराम छठे अवतार हैं। मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह और वामन के बाद परशुराम ही सम्पूर्ण मनुष्यता के अवतार है। यह अवतारवाद वास्तव में तो जैविक विकासक्रम की ओर संकेत करता है। अवतारों में भी अकेले परशुराम ही है, जो ऋषि हो कर अप्रतिम योद्धा भी हैं। विष्णु के अवतारों में गिने जाने के कारण ही शायद परशुराम को भगवान् मान लिया गया, किन्तु वे किसी एक वर्ण या जाति के भगवान् नहीं हो सकते। भगवान् सबके होते हैं । राम क्षत्रिय होकर, और कृष्ण यादव होकर भी सबके हैं, उसी तरह परशुराम ब्राह्मण होकर भी हम सभी के हैं।

परशुराम आगाह करते हैं, कि सहिष्णु रहो चाहे जिस सीमा तक, किन्तु लोहा कभी भी ठंडा मत होने देना। जीवन अंततः एक भीषण युद्ध है, और इसे जीते बिना मुक्ति सम्भव है ही नहीं। इसलिये वे बार-बार कहते हैं – “योद्धा बनो ।” वे स्वयं को क्रान्तिकारी घोषित करते हैं, पराक्रमी घोषित करते हैं, किन्तु कभी भगवान् घोषित नहीं करते। उनके अनुसार योद्धा के भीतर ही भगवान् का निवास है। कोई कहते हैं कि परशुराम चिरजीवी हैं। यह सत्य है, क्योंकि परशुराम का काम अभी पूरा नहीं हुआ। यह भी हमारे सामने है कि पृथ्वी पर हिंसा चल रही है और धर्म साधना भी। इसलिये परशुराम का तीव्रता के साथ याद आने का भी यही कारण है।

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