‘बात नहीं बनी तो फिर बसरेंगे बम’, ट्रंप ने ईरान को दे दिया अल्टीमेटम; होर्मुज को लेकर भी चेताया

‘बात नहीं बनी तो फिर बसरेंगे बम’, ट्रंप ने ईरान को दे दिया अल्टीमेटम; होर्मुज को लेकर भी चेताया

US-Iran Talk: अमेरिका और ईरान के बीच सोमवार को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक बार फिर वार्ता हो सकती है। हालांकि इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी है, जिसके बाद तनाव बढ़ने के संकेत मिल रहे है। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ चल रहा युद्धविराम आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। साथ ही कहा कि ईरान हिजबुल्लाह का समर्थन नहीं करेगा। 

नाकेबंदी जारी रहेगी- ट्रंप

पत्रकारों से बात करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि युद्धविराम का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि तय समयसीमा से पहले कोई समझौता हो पाता है या नहीं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही सीजफायर बढ़ाया जाए या नहीं, ईरान के बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी जारी रहेगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि हो सकता है मैं इसे आगे न बढ़ाऊं। लेकिन होर्मुज में नाकेबंदी जारी रहेगी। अगर समझौता नहीं हुआ, तो हमें फिर से बमबारी शुरू करनी पड़ सकती है।

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि 20 मिनट पहले हमारे पास कुछ अच्छी खबर थी, लेकिन ऐसा लगता है कि मिडिल ईस्ट में ईरान के साथ सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा है। हम वीकेंड पर बातचीत कर रहे हैं और जैसा कि आप जानते हैं, हमने ब्लॉकेड कर रखा है। ब्लॉकेड बहुत सफल रहा है… तो हमें बहुत जल्द पता चल जाएगा। लेकिन हम बात कर रहे हैं, मुझे उम्मीद है कि सब ठीक होगा।

उन्होंने कहा कि इनमें से कई चीजों पर बातचीत हो चुकी है और उन पर सहमति बन गई है। मैं बस वही कर रहा हूं जो सही है। मुख्य बात यह है कि ईरान के पास न्यूक्लियर वेपन नहीं होगा। आप ईरान को न्यूक्लियर वेपन नहीं रखने दे सकते और यह बाकी सब चीजों से ऊपर है। 

बता दें कि अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा दो हफ्ते का युद्धविराम 22 अप्रैल को खत्म हो रहा है। ऐसे में अगर समझौता नहीं हुआ, तो हालात फिर से बिगड़ सकते हैं।

पाकिस्तान में हो सकती है दूसरे दौर की वार्ता

इसी बीच, अमेरिका और ईरान के बीच नए दौर की वार्ता सोमवार को पाकिस्तान में होने की संभावना है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल रविवार को ही पाकिस्तान पहुंच सकते हैं।

इससे पहले 11-12 अप्रैल को इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता को ऐतिहासिक माना गया था, क्योंकि यह 1979 की ईरानी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच पहली उच्चस्तरीय आमने-सामने की बातचीत थी। हालांकि, उस बैठक में कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया था।

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