अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने ब्राजील के सामने एक प्रस्ताव रखा है जिसमें वहां के जमीनी खनिज संसाधनों में अमेरिकी निवेशकों को पहली प्राथमिकता देने की बात कही है। इस प्रस्ताव ने ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की सरकार के भीतर बड़ी बेचैनी पैदा कर दी है।
प्रस्ताव में लिखा क्या है?
दस्तावेज में एक ऐसा प्रावधान है जो सबसे ज्यादा चिंता का कारण बना है। इसमें कहा गया है कि अमेरिकी निवेशक ब्राजील में बिकने वाली या ब्राजील में पंजीकृत किसी कंपनी की खनिज संपत्ति में निवेश का पहला अवसर पाने की उम्मीद रखते हैं।
आसान भाषा में कहें तो जब भी ब्राजील कोई खदान बेचेगा या किसी कंपनी में हिस्सेदारी देगा तो अमेरिकी कंपनियों को सबसे पहले मौका मिलेगा। बाकी दुनिया को बाद में इसमें हिस्सा मिलना चाहिए। यह ब्राजील की आर्थिक संप्रभुता पर सीधा असर डालने वाला प्रावधान है।
ऑस्ट्रेलिया से अलग क्यों है यह प्रस्ताव?
अमेरिका ने पहले ऑस्ट्रेलिया के साथ भी ऐसा ही समझौता किया था। लेकिन उस समझौते में दो अहम बातें थीं जो ब्राजील वाले प्रस्ताव में नहीं हैं। पहली बात, ऑस्ट्रेलिया के मामले में कम से कम 1 अरब डॉलर के निवेश की न्यूनतम सीमा तय थी।
ब्राजील के प्रस्ताव में कोई न्यूनतम रकम नहीं बताई गई। यानी छोटी से छोटी डील में भी अमेरिका को पहला हक मिल सकता है।
दूसरी बात, ऑस्ट्रेलिया के समझौते में मंत्री स्तर की नियमित बैठकों का प्रावधान था जो यह सुनिश्चित करती कि सब कुछ पारदर्शी तरीके से हो। ब्राजील के प्रस्ताव में यह व्यवस्था ही नहीं है। यानी ब्राजील को कम मिल रहा है और देना ज्यादा पड़ रहा है।
आखिर इन खनिजों में ऐसा क्या है?
लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और दुर्लभ खनिज यानी रेयर अर्थ एलिमेंट्स। ये वो चीजें हैं जिनके बिना आज की दुनिया नहीं चल सकती।
इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरी, सौर ऊर्जा के पैनल, पवन चक्कियां, स्मार्टफोन, सेमीकंडक्टर और यहां तक कि आधुनिक हथियार प्रणालियां, सब इन्हीं खनिजों पर निर्भर हैं।
ब्राजील इन खनिजों के सबसे बड़े भंडारों में से एक है। और अमेरिका जानता है कि अगले 50 साल की तकनीकी दुनिया में जिसके पास ये खनिज होंगे, वही असली ताकत होगा।


