राजस्थान के रणथंभौर टाइगर रिजर्व में करीब 15 साल बाद रेडियो कॉलर टेक्निक की वापसी हुई है। NTCA की अनुमति से पहले स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता पर असर की आशंका के चलते इसे हटाया गया था। अब टाइगर RBT-2407 को कॉलर लगाकर उसकी मॉनिटरिंग शुरू की गई है। वन विभाग के अनुसार यह बाघ बार-बार पेरीफेरी क्षेत्र से निकलकर आबादी के करीब पहुंच रहा है और ट्रैकिंग में दिक्कत आ रही थी। साल 2011 में बाघिन T-17 का कॉलर हटाने के दो बार गायब हो गई थी, जिसका कभी पता ही नहीं चला। ऐसे में एक ओर जहां रेडियो कॉलर जोखिम भरा मना गया था, वहीं दूसरी ओर टाइगर की सुरक्षा और मूवमेंट ट्रैकिंग के लिए इसे जरूरी भी बताया जा रहा है। मामले में भास्कर ने वन्यजीव विशेषज्ञों से बातचीत की… सवाल: साल 2010 में रणथंभौर टाइगर रिजर्व में रेडियो कॉलर क्यों हटाए गए थे?
जवाब: उस समय रेडियो कॉलर ज्यादा वजनी थे, जिससे टाइगरों को परेशानी हो रही थी। इसके अलावा बैटरी भी लंबे समय तक नहीं चलती थी। जिन टाइगरों पर कॉलर लगाए गए थे, वे कोर एरिया में रह रहे थे। इसी कारण तत्कालीन वन विभाग ने कॉलर हटाने का निर्णय लिया था। सवाल: अब रेडियो कॉलर में क्या बदलाव हुआ है?
जवाब: अब रेडियो कॉलर बहुत हल्के वजन के हो गए हैं और बैटरी लंबे समय तक चलती है। सामान्यतः इन्हें पेरीफेरल इलाकों में आने वाले टाइगरों पर लगाया जाता है। सवाल: क्या पायलट प्रोजेक्ट के दौरान कॉलर लगाए गए थे?
जवाब: हां, रणथंभौर टाइगर रिजर्व में उस समय पायलट प्रोजेक्ट के तहत कुछ टाइगरों को सलेक्ट कर रेडियो कॉलर लगाए गए थे। सवाल: आप रेडियो कॉलर के बारे में क्या राय रखते हैं?
जवाब: रेडियो कॉलर से किसी मुश्किल टाइगर की मॉनिटरिंग आसानी से की जा सकती है। उस समय यह कयास लगाए गए थे कि कॉलर की वजह से टाइगर ब्रीडिंग नहीं कर रहा है।
हालांकि इसके पीछे कोई वैज्ञानिक शोध नहीं था, क्योंकि अन्य टाइगर रिजर्व में रेडियो कॉलर के साथ टाइगर ने ब्रीडिंग की थी।
तत्कालीन वन मंत्री ने स्थानीय लोगों की मांग और कयासों के आधार पर कॉलर हटवाने का निर्णय लिया था। अब पांच पॉइंट में समझे पूरा घटनाक्रम … 1. 2010 में हटाए गए रेडियो कॉलर, अब फिर शुरू हुई तकनीक
वर्ष 2010 के आसपास तत्कालीन वन मंत्री बीना काक के निर्देश पर रणथंभौर के सभी टाइगरों के रेडियो कॉलर हटा दिए गए थे। उस समय वन विभाग का मानना था कि कॉलर से निकलने वाली तरंगें टाइगर के स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं। बदलते हालात में अब विभाग ने फिर से इस तकनीक को अपनाया है। 2. पहले कॉलर से जुड़े हेल्थ और तकनीकी मुद्दे सामने आए
साल 2011 में बाघिन टी-17 का रेडियो कॉलर नवंबर में हटाया गया था। विशेषज्ञों के अनुसार, करीब 1.5 किलो वजन का कॉलर संभोग के दौरान बाधा बन रहा था और 18 महीनों से सिग्नल भी नहीं दे रहा था।
कॉलर हटने के बाद वह गर्भवती हुई और उसने तीन शावकों (T-73, T-74 और T-75) को जन्म दिया, हालांकि 2013 की शुरुआत में वह रहस्यमय तरीके से गायब हो गई। वहीं 2020 में बाघ टी-104 को कॉलर ढीला करने के लिए ट्रेंकुलाइज करना पड़ा था, क्योंकि उसके गले में निशान पड़ रहे थे। 3. सुरक्षा और मॉनिटरिंग के लिए आरबीटी-2407 को लगाया कॉलर
रणथंभौर के डीएफओ मानस सिंह के अनुसार, आरबीटी-2407 एक युवा बाघ है, जो टेरिटरी की तलाश में लगातार पेरीफेरी क्षेत्रों में मूवमेंट कर रहा था। इससे उसकी निगरानी चुनौतीपूर्ण हो गई थी। रेडियो कॉलर लगाने के बाद अब उसकी लोकेशन और गतिविधियों पर आसानी से नजर रखी जा सकेगी, जिससे सुरक्षा बढ़ेगी और मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका कम होगी। 4. टेरिटरी की तलाश में बाहर आ रहा था युवा बाघ
आरबीटी-2407, बाघिन टी-93 का करीब साढ़े तीन साल का सब-एडल्ट बाघ है। यह अपनी टेरिटरी बनाने के लिए बार-बार जंगल से बाहर पेरीफेरी क्षेत्रों में जा रहा था, जिससे मॉनिटरिंग में दिक्कत आ रही थी और उसकी सुरक्षा पर खतरा बढ़ रहा था। 5. ट्रेंकुलाइज कर लगाया कॉलर, फिर भी मूवमेंट जारी
वन विभाग ने 9 मार्च को आरबीटी-2407 को ट्रेंकुलाइज कर रेडियो कॉलर लगाया। इसके बावजूद वह कई बार जंगल से बाहर आ चुका है। फिलहाल उसका मूवमेंट झूमर बावड़ी और मिर्जा घाटी वन क्षेत्र में बना हुआ है, जिस पर विभाग लगातार नजर रखे हुए है। — रणथंभौर से जुड़ीं ये खबर भी पढ़िए … रणथंभौर में बाघों के लिए तैयार होगा सफारी पार्क:सालों पहले बंद हो चुके आईओसी प्लांट की जमीन मांगी; बूढ़े-बीमार टाइगर होंगे शिफ्ट सवाई माधोपुर में बाघों की संख्या 76 से ज्यादा पहुंच गई है। क्षमता से ज्यादा टाइगर अब इनके लिए चुनौती बन चुका है। ऐसे में अब इन बाघों के लिए नए ठिकानें की तलाश की जा रही है। पूरी खबर पढ़िए


