सरकारी अस्पतालों में बेड फुल, फर्श पर मरीज:कैंसर के पेशेंट भी शेड के नीचे गुजार रहे दिन, जनरल वार्ड में भी जगह नहीं

सरकारी अस्पतालों में बेड फुल, फर्श पर मरीज:कैंसर के पेशेंट भी शेड के नीचे गुजार रहे दिन, जनरल वार्ड में भी जगह नहीं

पटना के बड़े सरकारी अस्पतालों में सभी मरीजों बेड नहीं मिल रहे हैं। जनरल वार्ड भरे हैं। गंभीर मरीजों को आईसीयू और वेंटिलेटर के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। अस्पताल परिसर में मरीजों को फर्श पर इलाज कराना पड़ रहा है और शेड में रातें गुजारनी पड़ रही हैं। आईजीआईएमएस के बाहर शेड में मरीज फर्श और प्लास्टिक पर सोते देखे जा सकते हैं। कई गंभीर मरीजों को पाइप लगे हैं, फिर भी उन्हें वार्ड में जगह नहीं मिल पा रही है। आईजीआईएमएस, पीएमसीएच, एनएमसीएच और एम्स जैसे प्रमुख अस्पतालों में हर दिन हजारों मरीज पहुंच रहे हैं। संसाधनों की कमी और बेड के अभाव के कारण आधे से अधिक गंभीर मरीजों को भर्ती नहीं किया जा रहा। ऐसे में उन्हें अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। इमरजेंसी वार्ड के बाहर बने शेड अब मरीजों और उनके परिजनों के लिए अस्थायी आश्रय स्थल बन गए हैं। बिहार के अन्य जिलों में सुपर-स्पेशियलिटी अस्पतालों में संसाधनों का अभाव है। इस कारण गंभीर मरीजों को पटना के प्रमुख अस्पतालों में रेफर किया जाता है, जिससे राजधानी के अस्पतालों पर अत्यधिक दबाव बढ़ गया है। पिछले 10 वर्षों में पटना के बड़े अस्पतालों में मरीजों की संख्या दो से तीन गुना तक बढ़ गई है। अस्पताल में किसी स्थिति में हो रहा मरीजों का इलाज, तस्वीरों में देखें… बेड के लिए भटकते रहे परिजन, इंतजार-खर्च और सिफारिश के बाद भी नहीं मिली राहत, पढ़िए रिपोर्ट… 3 हजार खर्च कर पहुंची, पर लाभ नहीं समस्तीपुर की चिंता देवी अपनी हार्ट पेशेंट मां को लेकर पटना पहुंचीं। एंबुलेंस में ही 3000 रुपए खर्च हो गए, लेकिन आईजीआईएमएस में घंटों इंतजार के बाद भी उन्हें भर्ती नहीं मिल सकी। मजबूरी में दूसरे अस्पताल का सहारा लेना पड़ा।
लीवर मरीज को नहीं मिला बेड
मुजफ्फरपुर के सतेंद्र कुमार अपने भाई को लेकर पटना पहुंचे। उन्होंने बताया कि सिफारिश तक करवाई, लेकिन इसके बावजूद अस्पताल में बेड नहीं मिला। 8 दिन से इंतजार, इमरजेंसी शेड बना घर
मोतिहारी की पिंकी देवी अपने ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित पति के साथ पिछले 7-8 दिनों से अस्पताल परिसर में ही रह रही हैं। हर दिन बेड मिलने की उम्मीद रहती है, लेकिन अब तक निराशा ही हाथ लगी है। कैंसर मरीज फर्श पर
गया के उमेश यादव अपनी पत्नी को लेकर पटना आए। कैंसर से जूझ रही पत्नी को फर्श पर ही इलाज कराना पड़ रहा है। पांच दिनों से भर्ती का इंतजार जारी है।

स्टाफ समस्या नहीं सुनते हैं मधेपुरा के बबलू कुमार ने बताया की अस्पताल में बेड की काफी समस्या हैं, पिछले 3 महीनों से IGIMS में मां का इलाज करवा रहे हैं, लेकिन समस्या काफी अधिक है। उन्होंने बताया की IGIMS में धर्मशाला है जो 7 दिनों बाद तत्काल खाली करवा देता। अस्पताल के स्टाफ समस्या सुनने से इनकार कर देते हैं।
रेफर मरीजों से बढ़ रही मरीजों की संख्या

सरकारी अस्पतालों पर दबाव का एक बड़ा कारण निजी अस्पतालों से रेफर किए जा रहे मरीज भी हैं। कई निजी अस्पताल गंभीर मरीजों को संभालने में असमर्थ होने पर उन्हें सरकारी अस्पताल भेज देते हैं।
पीएमसीएच प्रशासन का कहना है कि मरीजों की गंभीरता को देखते हुए उन्हें ट्रॉली पर ही इलाज शुरू करना पड़ता है। जैसे ही बेड खाली होता है, मरीज को शिफ्ट किया जाता है। लेकिन आईसीयू और वेंटिलेटर की कमी के कारण कई बार गंभीर स्थिति बन जाती है।
64 % बेड की कमी

कैग की 2024 की रिपोर्ट ने बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में जरूरत के मुकाबले 64 प्रतिशत कम बेड उपलब्ध हैं।
जरूरत 91,392 बेड की है, पर उपलब्ध 32,767 बेड ही हैं।
भारी कमी के कारण मरीजों को बड़े शहरों की ओर रेफर किया जा रहा है, जिससे वहां का सिस्टम भी चरमरा गया है। डॉक्टर और स्टाफ भी ज्यादा नहीं

बेड के साथ-साथ डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ की भी भारी कमी है। कई अस्पतालों में स्वीकृत पदों के मुकाबले बड़ी संख्या में पद खाली हैं। इसका सीधा असर इलाज की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।
जिला अस्पतालों में आईसीयू, ब्लड बैंक, ट्रॉमा सेंटर और इमरजेंसी ऑपरेशन थिएटर जैसी सुविधाएं भी कई जगहों पर उपलब्ध नहीं हैं।
गरीब मरीजों के लिए सबसे बड़ी चुनौती

निजी अस्पतालों में इलाज महंगा होने के कारण गरीब और मध्यम वर्ग के मरीज सरकारी अस्पतालों पर ही निर्भर हैं, लेकिन यहां भी जगह नहीं मिलने से उनकी परेशानी कई गुना बढ़ जाती है।
ऐसे में कई मरीज इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं या फिर मजबूरी में कर्ज लेकर निजी अस्पतालों का रुख करते हैं। पटना के बड़े सरकारी अस्पतालों में सभी मरीजों बेड नहीं मिल रहे हैं। जनरल वार्ड भरे हैं। गंभीर मरीजों को आईसीयू और वेंटिलेटर के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। अस्पताल परिसर में मरीजों को फर्श पर इलाज कराना पड़ रहा है और शेड में रातें गुजारनी पड़ रही हैं। आईजीआईएमएस के बाहर शेड में मरीज फर्श और प्लास्टिक पर सोते देखे जा सकते हैं। कई गंभीर मरीजों को पाइप लगे हैं, फिर भी उन्हें वार्ड में जगह नहीं मिल पा रही है। आईजीआईएमएस, पीएमसीएच, एनएमसीएच और एम्स जैसे प्रमुख अस्पतालों में हर दिन हजारों मरीज पहुंच रहे हैं। संसाधनों की कमी और बेड के अभाव के कारण आधे से अधिक गंभीर मरीजों को भर्ती नहीं किया जा रहा। ऐसे में उन्हें अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। इमरजेंसी वार्ड के बाहर बने शेड अब मरीजों और उनके परिजनों के लिए अस्थायी आश्रय स्थल बन गए हैं। बिहार के अन्य जिलों में सुपर-स्पेशियलिटी अस्पतालों में संसाधनों का अभाव है। इस कारण गंभीर मरीजों को पटना के प्रमुख अस्पतालों में रेफर किया जाता है, जिससे राजधानी के अस्पतालों पर अत्यधिक दबाव बढ़ गया है। पिछले 10 वर्षों में पटना के बड़े अस्पतालों में मरीजों की संख्या दो से तीन गुना तक बढ़ गई है। अस्पताल में किसी स्थिति में हो रहा मरीजों का इलाज, तस्वीरों में देखें… बेड के लिए भटकते रहे परिजन, इंतजार-खर्च और सिफारिश के बाद भी नहीं मिली राहत, पढ़िए रिपोर्ट… 3 हजार खर्च कर पहुंची, पर लाभ नहीं समस्तीपुर की चिंता देवी अपनी हार्ट पेशेंट मां को लेकर पटना पहुंचीं। एंबुलेंस में ही 3000 रुपए खर्च हो गए, लेकिन आईजीआईएमएस में घंटों इंतजार के बाद भी उन्हें भर्ती नहीं मिल सकी। मजबूरी में दूसरे अस्पताल का सहारा लेना पड़ा।
लीवर मरीज को नहीं मिला बेड
मुजफ्फरपुर के सतेंद्र कुमार अपने भाई को लेकर पटना पहुंचे। उन्होंने बताया कि सिफारिश तक करवाई, लेकिन इसके बावजूद अस्पताल में बेड नहीं मिला। 8 दिन से इंतजार, इमरजेंसी शेड बना घर
मोतिहारी की पिंकी देवी अपने ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित पति के साथ पिछले 7-8 दिनों से अस्पताल परिसर में ही रह रही हैं। हर दिन बेड मिलने की उम्मीद रहती है, लेकिन अब तक निराशा ही हाथ लगी है। कैंसर मरीज फर्श पर
गया के उमेश यादव अपनी पत्नी को लेकर पटना आए। कैंसर से जूझ रही पत्नी को फर्श पर ही इलाज कराना पड़ रहा है। पांच दिनों से भर्ती का इंतजार जारी है।

स्टाफ समस्या नहीं सुनते हैं मधेपुरा के बबलू कुमार ने बताया की अस्पताल में बेड की काफी समस्या हैं, पिछले 3 महीनों से IGIMS में मां का इलाज करवा रहे हैं, लेकिन समस्या काफी अधिक है। उन्होंने बताया की IGIMS में धर्मशाला है जो 7 दिनों बाद तत्काल खाली करवा देता। अस्पताल के स्टाफ समस्या सुनने से इनकार कर देते हैं।
रेफर मरीजों से बढ़ रही मरीजों की संख्या

सरकारी अस्पतालों पर दबाव का एक बड़ा कारण निजी अस्पतालों से रेफर किए जा रहे मरीज भी हैं। कई निजी अस्पताल गंभीर मरीजों को संभालने में असमर्थ होने पर उन्हें सरकारी अस्पताल भेज देते हैं।
पीएमसीएच प्रशासन का कहना है कि मरीजों की गंभीरता को देखते हुए उन्हें ट्रॉली पर ही इलाज शुरू करना पड़ता है। जैसे ही बेड खाली होता है, मरीज को शिफ्ट किया जाता है। लेकिन आईसीयू और वेंटिलेटर की कमी के कारण कई बार गंभीर स्थिति बन जाती है।
64 % बेड की कमी

कैग की 2024 की रिपोर्ट ने बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में जरूरत के मुकाबले 64 प्रतिशत कम बेड उपलब्ध हैं।
जरूरत 91,392 बेड की है, पर उपलब्ध 32,767 बेड ही हैं।
भारी कमी के कारण मरीजों को बड़े शहरों की ओर रेफर किया जा रहा है, जिससे वहां का सिस्टम भी चरमरा गया है। डॉक्टर और स्टाफ भी ज्यादा नहीं

बेड के साथ-साथ डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ की भी भारी कमी है। कई अस्पतालों में स्वीकृत पदों के मुकाबले बड़ी संख्या में पद खाली हैं। इसका सीधा असर इलाज की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।
जिला अस्पतालों में आईसीयू, ब्लड बैंक, ट्रॉमा सेंटर और इमरजेंसी ऑपरेशन थिएटर जैसी सुविधाएं भी कई जगहों पर उपलब्ध नहीं हैं।
गरीब मरीजों के लिए सबसे बड़ी चुनौती

निजी अस्पतालों में इलाज महंगा होने के कारण गरीब और मध्यम वर्ग के मरीज सरकारी अस्पतालों पर ही निर्भर हैं, लेकिन यहां भी जगह नहीं मिलने से उनकी परेशानी कई गुना बढ़ जाती है।
ऐसे में कई मरीज इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं या फिर मजबूरी में कर्ज लेकर निजी अस्पतालों का रुख करते हैं।  

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