Cancer Feed Antioxidant: कैंसर का नाम आते ही लोग घबरा जाते हैं ये कैसे क्यों और हमें ही क्यों… दुनिया भर में कैंसर के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अकेले आप या हम नहीं बल्कि, दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए यह रिसर्च का विषय बना हुआ है, ताकि इसका कोई ऐसा इलाज मिल सके जो आसान हो, दर्दनाक न हो। इन वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा और चुनौती भरा सवाल था कि इंसान के शरीर में ऐसा क्या होता है, जो कैंसर के ट्यूमर को जिंदा रखता है? और खुशी की बात ये है कि वैज्ञानिकों को ने इस सवाल का चौंकाने जवाब भी ढूंढ़ लिया है।
अमेरिका के university of Rochester Medical Center के Willmot Cancer Institute की नई रिसर्च में सामने आया है कि अब तक जिस एंटीऑक्सीडेंट को शरीर का रक्षक माना जाता था, वही कैंसर को ताकत दे रहा है। इस नई स्टडी के मुताबिक कैंसर ट्यूमर ग्लूटाथियोन (Glutathione) नामक एंटीऑक्सीडेंट पर निर्भर हो जाते हैं। यानी इनके लिए यह एंटीऑक्सीडेंट ईंधन की तरह काम करता है।
यहां पढ़ें अमेरिका की नई रिसर्च
यह रिसर्च प्रतिष्ठित जनरल Nature में पब्लिश हुआ है। इसमें वैज्ञानिकों ने पहली बार इंसानी ट्यूमर के अंदर माइक्रो एनवायरमेंटल का गहराई से अध्ययन और विश्लेषण किया। रिसर्च में पाया गया कि-
- कैंसर सेल्स ग्लूटाथियोन को तोड़कर उसे ऊर्जा में बदल देते हैं। यही ऊर्जा ट्यूमर को उसकी तेजी से ग्रोथ करने में मदद करती है। यानी इंसानी शरीर में पाए जाने वाले कैंसर सेल्स एंटीऑक्सीडेंट्स से अपना खाना खुद ही तैयार कर रहे हैं।
- स्टडी के प्रमुख वैज्ञानिक Isaac Harris के अनुसार, ‘यह अपनी तरह की एक नई समझ है कि कैंसर किस तरह शरीर के ही सिस्टम को अपने फायदे में बदल लेता है।’
जानें कैसे हुआ चौंकाने वाला खुलासा
इस रिसर्च की खासियत ये है कि यह थ्योरी बेस्ड नहीं है। इस रिसर्च का तरीका ही इसके फैक्ट्स को मजबूत बना देता है। यहां जानें पूरा प्रोसेस-
-इंसानी ट्यूमर के सैंपल्स का विश्लेषण
वैज्ञानिकों ने इस रिसर्च के लिए ब्रेस्ट कैंसर के मरीजों से लिए गए असली ट्यूमर सैंपल्स का अध्ययन किया। इन सैंपल्स में पाया गया कि इनमें ग्लुटाथियोन की मात्रा असामान्य रूप से ज्यादा थी। ये विश्लेषण दर्शाता है कि कैंसर इसे जमा कर रहा था।
– लैब मॉडल टेस्ट
इसके बाद वैज्ञानिकों ने चूहों और लैब मॉडल्स पर भी प्रयोग किए। चूहों पर की गई इस स्टडी में सामने आया कि कैंसर सेल्स ग्लूटाथियोन को तोड़ देते हैं। इसके टूटने पर सिस्टीन (cysteine) नाम का तत्व निकल लेते हैं। यही तत्व कैंसर को बढ़ाने में मदद करता है।

रिसर्च में सबसे बड़ा सबूत बना ब्लॉकिंग एक्सपेरिमेंट
वैज्ञानिकों ने ग्लूटाथियोन के इस्तेमाल को रोकने की कोशिश भी की, तो इसके परिणाम देख वैज्ञानिक हैरान हो गए-
ट्यूमर की ग्रोथ की गति धीमी हो गई। कैंसर सेल्स कमजोर पड़ गए। ये इस रिसर्च के विश्लेषणों का ठोस सबूत यही आधार बना कि, कैंसर पूरी तरह से ग्लूटाथियोन एंटीऑक्सीडेंट पर निर्भर हैं।

इस खोज को क्यों माना जा रहा गेम चेंजर?
इस खोज को वैज्ञानिक कैंसर के इलाज में गेम चेंजर मान रहे हैं। उनका कहना है कि इलाज का नया टारगेट अब दवाएं नहीं सीधे कैंसर को नहीं बल्कि कैंसर की खुराक को टारगेट करने की होंगी। एंटीऑक्सीडेंट्स हमेशा से ही फायदेमंद रहे हैं, लेकिन इस स्टडी के बाद यह साफ है कि कुछ मामलों में यही कैंसर को बढ़ावा दे सकते हैं। स्टार्व द कैंसर रणनीति यह रिसर्च एक नई सोच देती है कि कैंसर को मारने के बजाय, उसे भूखा रखकर कमजोर किया जाए। यह भविष्य की थैरेपी का आधार बन सकती है।

भारत के लिए इस रिसर्च के मायने
- भारत में कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। लैंसेट की ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज रिपोर्ट के मुताबिक जहां दुनियाभर में कैंसर की घटनाएं और मृत्यु दर में कमी आ रही है, वहीं भारत में इन मामलों में वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2023 में भारत में अनुमानित 15 लाख नये कैंसर के मामले और 12 लाख से ज्यादा मौतें दर्ज की गई थीं।
- वैश्विक मामलों में जहां कैंसर की घटनाओं की दर 1990 में प्रति 1 लाख जनसंख्या पर 220.6 थी, वहां वह 2023 में घटकर 205.1 हो गई। वर्ष 2025 तक यह आंकड़ा 192.9 तक पहुंचने का अनुमान है। हालांकि जनसंख्या वृद्धि और उम्र बढ़ने के साथ कैंसर के कुल मामलों और मृत्यु की संख्या का ये आंकड़ा 2050 तक तेजी से बढ़ने की संभावना है।
- जबकि भारत में कैंसर की घटनाओं की दर वर्ष 1990 में प्रति 1 लाख जनसंख्या पर 84.8 से बढ़कर वर्ष 2023 में 107.2 हो गई जबकि इसी अवधि में मृत्यु दर 71.7 से बढ़कर 86.9 प्रति 1 लाख तक पहुंच गई है। यही नहीं अध्ययन में चेतावनी भी दी गई कि भारत जैसे निम्न और मध्यम आय वाले देशों में कैंसर के नए मामलों में से आधे से ज्यादा और दो तिहाई मृत्यु का अनुमान भी जताया गया है।
- वैश्विक स्तर पर करीब 42 फीसदी कैंसर मरीज तंबाकू, शराब सेवन, अस्वस्थ आहार और संक्रमण जैसे परिवर्तनीय जोखिम कारकों से जुड़े हैं। भारत में इन कारकों से संबंधित मृत्यु की हिस्सेदारी करीब 70 फीसदी तक हो सकती है।
- वैज्ञानिकों के अध्ययन में भविष्यवाणी भी है कि 2050 तक विश्वभर में करीब 3.05 करोड़ नए कैंसर मरीज सामने आ सकते हैं, जबकि इन मरीजों की मृत्युदर 75% की वृद्धि के साथ 1.86 करोड़ तक पहुंच सकती है। वहीं भारत में कैंसर से मौत के प्रमुख कारण स्तन कैंसर, फेफड़े, ग्रासनली या अन्न नली(Food Pipe कैंसर, गर्भाशय ग्रीवा कैंसर, पेट और बड़ी आंत के कैंसर से होती हैं।
क्या है ग्लूटाथियोन
ग्लूटाथियोन शरीर में प्राकृतिक रूप से बनने वाला सबसे शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है, जो ग्लाइसिन, सिस्टीन और ग्लूटामिक एसिड से मिल कर बनता है। यह कोशिकाओं को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाता है। डिटॉक्सिफिकेशन में मदद करता है और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है। यही कारण है कि इसे मास्टर एंटीऑक्सीडेंट भी कहा जाता है।
ग्लूटोथियोन के फायदे और क्या हैं इसके काम
- यह कोशिकाओं में मौजूद एकमात्र एंटीऑक्सीडेंट है, जो उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है।
- यह मेलेनिन का उत्पादन कम करके त्वचा को गोरा और बेदाग बनाने में मदगगार हो सकता है। िसलिए इसे सिस्टमिक
- स्किन लाइटनिंग मॉलिक्यूल भी कहा जाता है।-यह प्रतिरक्षा कोशिकाओं को स्वस्थ रखकर संक्रमण से लड़ने में मदद करता है।
- यह माइटोकॉन्ड्रियल फंक्शन में सहायता करता है, जिससे एथलीटों में थकान कम होती है।

एक्सपर्ट्स ने दी प्रतिक्रिया
”मैंने देखा है कि इसके लेखक कई सालों से कैंसर, एंटीऑक्सीडेंट्स और विशेष रूप से ग्लूटाथियोन पर काम कर रहे हैं। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इस तरह के अध्ययनों की पुष्टि आगे और शोध द्वारा की जानी चाहिए।”
”ये नतीजे हमें डाइटरी सप्लीमेंटेशन के बारे में क्या बताते हैं, यह अध्ययन इस बात की याद दिलाता है कि सप्लीमेंट्स लेते समय पेशेवर सलाह लेना कितना जरूरी है। सप्लीमेंट्स का इस्तेमाल खास स्थितियों में खास जरूरतों के हिसाब से ही किया जाना चाहिए और बिना किसी की देखरेख के इनका मनमाने ढंग से इस्तेमाल करना, कुछ मामलों में, नुकसानदायक भी हो सकता है, जैसा कि इस अध्ययन के नतीजों की पुष्टि होने पर कैंसर के मरीजो के मामले में हो सकता है। इसके अलावा, यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि, विशेष रूप से, ग्लूटाथियोन के संबंध में EFSA (यूरोपीय संघ) या FDA (संयुक्त राज्य अमेरिका) द्वारा स्वास्थ्य से जुड़े किसी भी दावे को मंजूरी नहीं दी गई है।”
-इकियार अस्तियासरन, पोषण और खाद्य विज्ञान के प्रोफेसर और पोषण अनुसंधान केंद्र के निदेशक, साइंस मीडिया सेंटर स्पेन के नवर्रा विश्वविद्यालय
कैंसर बायोलॉजी का एक अहम पहलू
”ट्यूमर मेटाबॉलिज्म को टारगेट करने वाली रणनीतियां ऐसे तरीके हैं, जो अलग-अलग थेरेपी के प्रभाव को बेहतर बना सकते हैं। हम जानते हैं कि कैलोरी में कमी और उपवास के दूसरे तरीके इन कोशिकाओं के मेटाबॉलिज्म में बदलाव लाते हैं, जिससे उन्हें ग्लूकोज पर अपनी निर्भरता कम करनी पड़ती है और माइटोकॉन्ड्रियल ऑक्सीडेटिव तरीकों का इस्तेमाल बढ़ाना पड़ता है। उनका कहना है कि हालांकि, यह काम एक बार फिर ट्यूमर कोशिकाओं की जबरदस्त मेटाबॉलिक लचीलेपन को दिखाता है। जो कैंसर बायोलॉजी का एक अहम पहलू है। वहीं जो उन्हें खराब पोषण की स्थितियों के हिसाब से ढलने और कई मामलों में थेरेपी के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में मदद करता है।”
”वैज्ञानिकों ने ग्लूटाथियोन बायोलॉजी के बारे में हमारी समझ को और बढ़ाया है और एक्स्ट्रासेलुलर ग्लूटाथियोन (GSH), जो ट्यूमर के आस-पास के माहौल में बहुत ज्यादा मात्रा में पाया जाता है, को ट्यूमर कोशिकाओं के बढ़ने के लिए जरूरी अमीनो एसिड के एक वैकल्पिक स्रोत के तौर पर पहचाना है। उनके नतीजों से पता चलता है कि एक्स्ट्रासेलुलर GSH की उपलब्धता अलग-अलग इलाज के प्रति संवेदनशीलता को बदल सकती है या उन दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता भी पैदा कर सकती है, जो इन अमीनो एसिड के अवशोषण को रोकती हैं और इसके जो भी नतीजे होते हैं।”
”उनके शोध का एक और अहम पहलू यह भी है कि इस सिस्टम के काम करने के लिए, इसके पूरी तरह से टूटने में शामिल अलग-अलग एंजाइमों की सही गतिविधि और तालमेल वाले काम की जरूरत होती है, यह इन तरीकों की जटिलता और ट्यूमर कोशिकाओं की ढलने और वैकल्पिक मेटाबॉलिक रास्ते शुरू करने की क्षमता को दिखाता है।”
-अल्बर्टो डियाज-रुइज, सेलुलर और मॉलिक्यूलर जेरोंटोलॉजी लैब के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर, IMDEA न्यूट्रिशन
साइंस मीडिया सेंटर स्पेन


