11 जनवरी 2026; पटना के शंभू गर्ल्स होस्टल में NEET की छात्रा की मौत हुई। उसके साथ रेप हुआ। FSL की रिपोर्ट में अंडर गारमेंट पर स्पर्म मिला। उसे किसने मारा? पता नहीं। किसने रेप किया? पता नहीं। लड़की के अंडर गारमेंट पर स्पर्म किसका, 74 दिन बाद भी पुलिस, SIT, CBI के पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं। पटना पुलिस की जांच पर सवाल उठे तो पूरी केस की फाइल CBI को दे दी गई, लेकिन CBI पटना टीम के अधिकारी भी कुछ खास पता नहीं कर पाए। जब कोर्ट ने फटकार लगाई तो अब जांच CBI की दिल्ली टीम (एंटी करप्शन ब्रांच-2) को सौंपी गई है। बड़ा सवाल यही खड़ा हुआ कि CBI की टीम भी SIT और पटना पुलिस की जांच के इर्द गिर्द ही घूमती रही। उसपर भी परिवार वालों ने दबाव बनाने का आरोप लगाया। मामले की जांच CBI की पटना टीम से लेकर दिल्ली टीम को क्यों दी गई? CBI ने अब तक क्या–क्या किया? पहले पुलिस, SIT और अब CBI की जांच में क्या हुआ? पढ़िए एक्सक्लूसिव रिपोर्ट…। दिल्ली CBI टीम को क्यों मिली जांच की जिम्मेदारी? 3 वजह शम्भू गर्ल्स हॉस्टल की बिल्डिंग का मालिक मनीष रंजन इस केस में गिरफ्तार है। उसे पटना पुलिस ने शुरुआती जांच के बाद ही पकड़ा था। वर्तमान में बेउर जेल में है। इसकी जमानत याचिका पर पटना के पोक्सो कोर्ट में सुनवाई हुई थी। पीड़ित परिवार के वकील एसके पांडेय मनीष को जमानत देने का विरोध कर रहे थे। जांच में कमियां गिना रहे थे। लगातार सुनवाई के बाद कोर्ट ने 16 मार्च को मनीष की जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने इस दौरान CBI की जांच में खामियां पाई और कई सवाल उठाए थे। दिल्ली CBI टीम को जांच देने की 7 वजह… 1. पोक्सो धारा तक नहीं जोड़ी, जांच की शुरुआती कमी जब CBI ने चित्रगुप्त नगर थाने की FIR टेकओवर की, तभी सबसे बड़ी चूक यही रही कि पोक्सो की धारा नहीं जोड़ी गई। जबकि मामला नाबालिग से जुड़ा था और शुरुआत से ही रेप की आशंका जाहिर की जा रही थी। कोर्ट ने इस पर सख्त नाराजगी जताई। बाद में राज्य सरकार को अलग से नोटिफिकेशन जारी करना पड़ा। यहीं से पता चलता है कि पटना CBI टीम भी SIT की तरह मामले की गंभीरता समझने में चूक गई। 2. मुख्य आरोपी मनीष रंजन से पूछताछ तक नहीं मामले में गिरफ्तार बिल्डिंग मालिक मनीष रंजन को परिजन लगातार मुख्य आरोपी बता रहे थे। वह जेल में था, आसानी से उपलब्ध था। इसके बावजूद CBI ने उससे पूछताछ तक जरूरी नहीं समझी। कोर्ट में जब पूछा गया तो जवाब मिला, “हमें उसकी जरूरत नहीं है”। इस जवाब पर खुद कोर्ट ने नारजगी जताई। यहां तक कहा कि जिसके यहां घटना हुई, उससे आपको पूछताछ तक की जरूरत महसूस नहीं हो रही है। CBI का यह जवाब खुद जांच की दिशा पर सवाल खड़े करने वाला हो गया। 3. लोकेशन और कॉल डिटेल्स की जांच नहीं घटना के दिन मनीष कहां था? यह केस का सबसे अहम सवाल था। लेकिन CBI ने न तो टावर लोकेशन जांची, न कॉल डिटेल्स खंगाली। कोर्ट में खुद एजेंसी ने कहा कि 8 मोबाइल जब्त किए गए, लेकिन डिजिटल ट्रैकिंग नहीं हुई। आज के दौर में जब हर जांच का आधार डिजिटल साक्ष्य है, तब यह लापरवाही दिखाती है कि जांच कितनी कमजोर हो रही थी। 4. SIT की थ्योरी के इर्द-गिर्द ही घूमती रही जांच पटना CBI की जांच पूरी तरह SIT की थ्योरी के आसपास घूमती दिखाई देने लगी। उसने स्वतंत्र जांच एजेंसी की तरह नए एंगल नहीं तलाशे, बल्कि उसी दिशा में आगे बढ़ती रही, जिसमें पहले से पटना पुलिस और SIT खामियां छोड़ चुकी थी। इससे यह धारणा बनी कि CBI ने जांच को रीसेट करने की बजाय वही पुरानी लाइन पकड़ ली, जिससे केस और उलझ गया। परिवार वालों ने खुद CBI पर भी दबाव बनाने का आरोप लगाया। छात्रा के पिता ने कहा-CBI भी पटना पुलिस की तरह हमसे ही कह रही है कि तुम्हारी बेटी ने सुसाइड किया है। 5. कोर्ट के सवालों का ठोस जवाब नहीं दे पाई CBI पोक्सो कोर्ट में सुनवाई के दौरान जब CBI से सीधे सवाल पूछे गए, आरोपियों की भूमिका क्या है? क्या किसी की लोकेशन मैच की है? अभी तक की जांच रिपोर्ट का स्टेटस क्या है? तो पटना CBI के पास स्पष्ट जवाब नहीं थे। कोर्ट को बार-बार अधूरी जानकारी मिल रही। यही वजह रही कि कोर्ट ने खुद जांच पर सवाल उठाए। 6. जांच की स्पीड में कमी, कपड़ों पर स्पर्म किसका? CBI से उम्मीद होती है कि वह मामले को तेजी से आगे बढ़ाएगी, लेकिन यहां भी वही पैटर्न दिखा जो SIT में था, 12 फरवरी को जांच टेकओवर करने के बाद भी कोई अतिरिक्त जानकारी सामने नहीं आई। यहां तक कि CBI यह भी नहीं पता लगा पाई की लड़की के कपड़ों पर स्पर्म किसका था। न कोई अलग गिरफ्तारी, न किसी से अलग पूछताछ। यहां तक की CBI ने एम्स की रिपोर्ट भी नहीं मंगाई, जिस पर एसआईटी की पूरी जांच टिकी हुई थी। 7. बढ़ते दबाव के कारण जांच शिफ्ट कर दी गई मामला पहले से ही संवेदनशील था, मीडिया में लगातार CBI की कमजोर जांच, परिवार वालों के गंभीर आरोप, कोर्ट की नाराजगी को देखते हुए जांच को दिल्ली CBI को शिफ्ट कर दिया गया। अब नए आईओ मामले की जांच करेंगे। कोर्ट का सवाल: पोक्सो में मुकदमा क्यों नहीं किया? हमने मामले की जांच दिल्ली CBI टीम को सौंपे जाने को लेकर पटना CBI से जुड़े एक अधिकारी से बात की। पूछा कि क्या केस की जांच उनकी टीम से ले ली गई है? केस टेक ओवर करते समय पोक्सो की धारा क्यों नहीं जोड़ी गई? इस पर उन्होंने कहा कि जब बिहार सरकार ने केस की जांच CBI को सौंपी तो उस FIR में पोक्सो की धारा नहीं जुड़ी हुई थी। एजेंसी खुद से वह धारा नहीं जोड़ सकती थी। सरकार या पुलिस को पोक्सो की धारा जोड़कर देना चाहिए था। जहां तक जांच की बात है तो इसके लिए सही से मौका मिला ही नहीं। इसके उन्होंने ये तीन तर्क दिए पटना पुलिस, SIT और CBI के 4 जांच अधिकरी, रिजल्ट कुछ नहीं नीट छात्रा का केस जब सामने आया तो पटना पुलिस ने 9 जनवरी को चित्रगुप्त नगर थाना में FIR दर्ज की। उस वक्त वहां की तत्कालीन थानेदार और सब इंस्पेक्टर रौशनी कुमारी को केस का इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर बनाया गया था। लड़की की मौत के बाद जब मामला बिगड़ा तो पटना पुलिस ने केस की जांच के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बनाई। पटना की सचिवालय SDPO-2 डॉ. अन्नू कुमारी को जांच की जिम्मेवारी सौंपी गई। लड़की का परिवार SIT की जांच से संतुष्ट नहीं हुआ तो बिहार सरकार ने केस की जांच CBI को सौंप दी। CBI के पटना ब्रांच के ASP पवन कुमार श्रीवास्तव को इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर बनाया गया। इन पर परिवार और उनके वकील ने जांच में लापरवाही का आरोप लगाया। इसके बाद CBI ने पटना में ही पोस्टेड डीएसपी विभा कुमारी को केस की जांच की जिम्मेदारी दी। अब केस की जांच दिल्ली टीम को ट्रांसफर किए जाने के बाद 5वें इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर की एंट्री होगी। CBI ने मामा समेत दो रिश्तेदारों से की थी पूछताछ जब CBI पटना टीम की डीएसपी विभा कुमारी को जांच की जिम्मेदारी मिली तो एक टीम लड़की के घर गई थी। परिवार ने CBI की जांच और काम करने के तरीके पर सवाल उठाया था। कहा था कि जांच एजेंसी बार-बार परिवार से ही क्यों पूछताछ कर रही है? इसके बाद 22 मार्च को पूछताछ के लिए टीम ने लड़की के मामा को अपने ऑफिस बुला लिया था। 24 मार्च को एक और रिश्तेदार को बुलाकर पूछताछ की थी। इस पर पीड़ित परिवार के वकील एसके पांडेय ने कहा, ‘अब तक की जांच में CBI की टीम ने भी परिवार पर ही दबाव बनाया है। परिवार के लोगों से ही पूछताछ की है।’ उन्होंने कहा, ‘SIT की केस डायरी से जो बातें सामने आई हैं, उसके आधार पर प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल के डॉक्टरों और मनीष रंजन से पूछताछ होनी चाहिए थी। अब 30 मार्च को इस मामले में पोक्सो कोर्ट में सुनवाई होनी है। CBI से केस का स्टेट्स रिपोर्ट मांगी गई है। इनके रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की रणनीति तैयार की जाएगी।’ शुरुआत से ही गलत दिशा में हुई जांच इस केस को लेकर सीनियर जर्नलिस्ट अमिताभ ओझा कहते हैं कि, ‘नीट छात्रा मामले की जांच शुरुआत से ही गलत दिशा में हुई। सबूतों के साथ खूब छेड़छाड़ हुई है। इसकी फॉरेंसिक जांच में देरी हुई। जांच करने वालों की तरफ से सिर्फ कहानियां बनाई गई और इसके अनुसार सबूत प्लांट किए गए।’ उन्होंने कहा, ‘पटना पुलिस के बाद CBI को जांच दी गई तो लगा कि अब जांच आगे बढ़ेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सेंट्रल एजेंसी ने भी अभी तक परिवार के एंगल पर ही जांच की है। कोर्ट में जिस तरह से जांच पर सवाल उठे, उससे ताज्जुब होता है कि देश की सबसे बड़ी एजेंसी भी ऐसी गलतियां कर सकती है।’ 11 जनवरी 2026; पटना के शंभू गर्ल्स होस्टल में NEET की छात्रा की मौत हुई। उसके साथ रेप हुआ। FSL की रिपोर्ट में अंडर गारमेंट पर स्पर्म मिला। उसे किसने मारा? पता नहीं। किसने रेप किया? पता नहीं। लड़की के अंडर गारमेंट पर स्पर्म किसका, 74 दिन बाद भी पुलिस, SIT, CBI के पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं। पटना पुलिस की जांच पर सवाल उठे तो पूरी केस की फाइल CBI को दे दी गई, लेकिन CBI पटना टीम के अधिकारी भी कुछ खास पता नहीं कर पाए। जब कोर्ट ने फटकार लगाई तो अब जांच CBI की दिल्ली टीम (एंटी करप्शन ब्रांच-2) को सौंपी गई है। बड़ा सवाल यही खड़ा हुआ कि CBI की टीम भी SIT और पटना पुलिस की जांच के इर्द गिर्द ही घूमती रही। उसपर भी परिवार वालों ने दबाव बनाने का आरोप लगाया। मामले की जांच CBI की पटना टीम से लेकर दिल्ली टीम को क्यों दी गई? CBI ने अब तक क्या–क्या किया? पहले पुलिस, SIT और अब CBI की जांच में क्या हुआ? पढ़िए एक्सक्लूसिव रिपोर्ट…। दिल्ली CBI टीम को क्यों मिली जांच की जिम्मेदारी? 3 वजह शम्भू गर्ल्स हॉस्टल की बिल्डिंग का मालिक मनीष रंजन इस केस में गिरफ्तार है। उसे पटना पुलिस ने शुरुआती जांच के बाद ही पकड़ा था। वर्तमान में बेउर जेल में है। इसकी जमानत याचिका पर पटना के पोक्सो कोर्ट में सुनवाई हुई थी। पीड़ित परिवार के वकील एसके पांडेय मनीष को जमानत देने का विरोध कर रहे थे। जांच में कमियां गिना रहे थे। लगातार सुनवाई के बाद कोर्ट ने 16 मार्च को मनीष की जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने इस दौरान CBI की जांच में खामियां पाई और कई सवाल उठाए थे। दिल्ली CBI टीम को जांच देने की 7 वजह… 1. पोक्सो धारा तक नहीं जोड़ी, जांच की शुरुआती कमी जब CBI ने चित्रगुप्त नगर थाने की FIR टेकओवर की, तभी सबसे बड़ी चूक यही रही कि पोक्सो की धारा नहीं जोड़ी गई। जबकि मामला नाबालिग से जुड़ा था और शुरुआत से ही रेप की आशंका जाहिर की जा रही थी। कोर्ट ने इस पर सख्त नाराजगी जताई। बाद में राज्य सरकार को अलग से नोटिफिकेशन जारी करना पड़ा। यहीं से पता चलता है कि पटना CBI टीम भी SIT की तरह मामले की गंभीरता समझने में चूक गई। 2. मुख्य आरोपी मनीष रंजन से पूछताछ तक नहीं मामले में गिरफ्तार बिल्डिंग मालिक मनीष रंजन को परिजन लगातार मुख्य आरोपी बता रहे थे। वह जेल में था, आसानी से उपलब्ध था। इसके बावजूद CBI ने उससे पूछताछ तक जरूरी नहीं समझी। कोर्ट में जब पूछा गया तो जवाब मिला, “हमें उसकी जरूरत नहीं है”। इस जवाब पर खुद कोर्ट ने नारजगी जताई। यहां तक कहा कि जिसके यहां घटना हुई, उससे आपको पूछताछ तक की जरूरत महसूस नहीं हो रही है। CBI का यह जवाब खुद जांच की दिशा पर सवाल खड़े करने वाला हो गया। 3. लोकेशन और कॉल डिटेल्स की जांच नहीं घटना के दिन मनीष कहां था? यह केस का सबसे अहम सवाल था। लेकिन CBI ने न तो टावर लोकेशन जांची, न कॉल डिटेल्स खंगाली। कोर्ट में खुद एजेंसी ने कहा कि 8 मोबाइल जब्त किए गए, लेकिन डिजिटल ट्रैकिंग नहीं हुई। आज के दौर में जब हर जांच का आधार डिजिटल साक्ष्य है, तब यह लापरवाही दिखाती है कि जांच कितनी कमजोर हो रही थी। 4. SIT की थ्योरी के इर्द-गिर्द ही घूमती रही जांच पटना CBI की जांच पूरी तरह SIT की थ्योरी के आसपास घूमती दिखाई देने लगी। उसने स्वतंत्र जांच एजेंसी की तरह नए एंगल नहीं तलाशे, बल्कि उसी दिशा में आगे बढ़ती रही, जिसमें पहले से पटना पुलिस और SIT खामियां छोड़ चुकी थी। इससे यह धारणा बनी कि CBI ने जांच को रीसेट करने की बजाय वही पुरानी लाइन पकड़ ली, जिससे केस और उलझ गया। परिवार वालों ने खुद CBI पर भी दबाव बनाने का आरोप लगाया। छात्रा के पिता ने कहा-CBI भी पटना पुलिस की तरह हमसे ही कह रही है कि तुम्हारी बेटी ने सुसाइड किया है। 5. कोर्ट के सवालों का ठोस जवाब नहीं दे पाई CBI पोक्सो कोर्ट में सुनवाई के दौरान जब CBI से सीधे सवाल पूछे गए, आरोपियों की भूमिका क्या है? क्या किसी की लोकेशन मैच की है? अभी तक की जांच रिपोर्ट का स्टेटस क्या है? तो पटना CBI के पास स्पष्ट जवाब नहीं थे। कोर्ट को बार-बार अधूरी जानकारी मिल रही। यही वजह रही कि कोर्ट ने खुद जांच पर सवाल उठाए। 6. जांच की स्पीड में कमी, कपड़ों पर स्पर्म किसका? CBI से उम्मीद होती है कि वह मामले को तेजी से आगे बढ़ाएगी, लेकिन यहां भी वही पैटर्न दिखा जो SIT में था, 12 फरवरी को जांच टेकओवर करने के बाद भी कोई अतिरिक्त जानकारी सामने नहीं आई। यहां तक कि CBI यह भी नहीं पता लगा पाई की लड़की के कपड़ों पर स्पर्म किसका था। न कोई अलग गिरफ्तारी, न किसी से अलग पूछताछ। यहां तक की CBI ने एम्स की रिपोर्ट भी नहीं मंगाई, जिस पर एसआईटी की पूरी जांच टिकी हुई थी। 7. बढ़ते दबाव के कारण जांच शिफ्ट कर दी गई मामला पहले से ही संवेदनशील था, मीडिया में लगातार CBI की कमजोर जांच, परिवार वालों के गंभीर आरोप, कोर्ट की नाराजगी को देखते हुए जांच को दिल्ली CBI को शिफ्ट कर दिया गया। अब नए आईओ मामले की जांच करेंगे। कोर्ट का सवाल: पोक्सो में मुकदमा क्यों नहीं किया? हमने मामले की जांच दिल्ली CBI टीम को सौंपे जाने को लेकर पटना CBI से जुड़े एक अधिकारी से बात की। पूछा कि क्या केस की जांच उनकी टीम से ले ली गई है? केस टेक ओवर करते समय पोक्सो की धारा क्यों नहीं जोड़ी गई? इस पर उन्होंने कहा कि जब बिहार सरकार ने केस की जांच CBI को सौंपी तो उस FIR में पोक्सो की धारा नहीं जुड़ी हुई थी। एजेंसी खुद से वह धारा नहीं जोड़ सकती थी। सरकार या पुलिस को पोक्सो की धारा जोड़कर देना चाहिए था। जहां तक जांच की बात है तो इसके लिए सही से मौका मिला ही नहीं। इसके उन्होंने ये तीन तर्क दिए पटना पुलिस, SIT और CBI के 4 जांच अधिकरी, रिजल्ट कुछ नहीं नीट छात्रा का केस जब सामने आया तो पटना पुलिस ने 9 जनवरी को चित्रगुप्त नगर थाना में FIR दर्ज की। उस वक्त वहां की तत्कालीन थानेदार और सब इंस्पेक्टर रौशनी कुमारी को केस का इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर बनाया गया था। लड़की की मौत के बाद जब मामला बिगड़ा तो पटना पुलिस ने केस की जांच के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बनाई। पटना की सचिवालय SDPO-2 डॉ. अन्नू कुमारी को जांच की जिम्मेवारी सौंपी गई। लड़की का परिवार SIT की जांच से संतुष्ट नहीं हुआ तो बिहार सरकार ने केस की जांच CBI को सौंप दी। CBI के पटना ब्रांच के ASP पवन कुमार श्रीवास्तव को इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर बनाया गया। इन पर परिवार और उनके वकील ने जांच में लापरवाही का आरोप लगाया। इसके बाद CBI ने पटना में ही पोस्टेड डीएसपी विभा कुमारी को केस की जांच की जिम्मेदारी दी। अब केस की जांच दिल्ली टीम को ट्रांसफर किए जाने के बाद 5वें इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर की एंट्री होगी। CBI ने मामा समेत दो रिश्तेदारों से की थी पूछताछ जब CBI पटना टीम की डीएसपी विभा कुमारी को जांच की जिम्मेदारी मिली तो एक टीम लड़की के घर गई थी। परिवार ने CBI की जांच और काम करने के तरीके पर सवाल उठाया था। कहा था कि जांच एजेंसी बार-बार परिवार से ही क्यों पूछताछ कर रही है? इसके बाद 22 मार्च को पूछताछ के लिए टीम ने लड़की के मामा को अपने ऑफिस बुला लिया था। 24 मार्च को एक और रिश्तेदार को बुलाकर पूछताछ की थी। इस पर पीड़ित परिवार के वकील एसके पांडेय ने कहा, ‘अब तक की जांच में CBI की टीम ने भी परिवार पर ही दबाव बनाया है। परिवार के लोगों से ही पूछताछ की है।’ उन्होंने कहा, ‘SIT की केस डायरी से जो बातें सामने आई हैं, उसके आधार पर प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल के डॉक्टरों और मनीष रंजन से पूछताछ होनी चाहिए थी। अब 30 मार्च को इस मामले में पोक्सो कोर्ट में सुनवाई होनी है। CBI से केस का स्टेट्स रिपोर्ट मांगी गई है। इनके रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की रणनीति तैयार की जाएगी।’ शुरुआत से ही गलत दिशा में हुई जांच इस केस को लेकर सीनियर जर्नलिस्ट अमिताभ ओझा कहते हैं कि, ‘नीट छात्रा मामले की जांच शुरुआत से ही गलत दिशा में हुई। सबूतों के साथ खूब छेड़छाड़ हुई है। इसकी फॉरेंसिक जांच में देरी हुई। जांच करने वालों की तरफ से सिर्फ कहानियां बनाई गई और इसके अनुसार सबूत प्लांट किए गए।’ उन्होंने कहा, ‘पटना पुलिस के बाद CBI को जांच दी गई तो लगा कि अब जांच आगे बढ़ेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सेंट्रल एजेंसी ने भी अभी तक परिवार के एंगल पर ही जांच की है। कोर्ट में जिस तरह से जांच पर सवाल उठे, उससे ताज्जुब होता है कि देश की सबसे बड़ी एजेंसी भी ऐसी गलतियां कर सकती है।’


