Germany Petrol Price Rule: दुनिया भर में चल रहे तेल संकट का असर अब आम लोगों की जेब पर साफ दिखने लगा है। खासकर यूरोप में हालात कुछ ज्यादा ही गंभीर नजर आ रहे हैं। जर्मनी, जो पहले से ही महंगाई के दबाव में है, अब ईंधन की बढ़ती कीमतों को काबू में लाने के लिए एक अलग ही रास्ता अपनाने जा रहा है। सरकार ऐसा नियम लाने की तैयारी में है, जो सुनने में थोड़ा अजीब जरूर लगता है, लेकिन मकसद आम उपभोक्ता को राहत देना है।
क्या है नया हाई नून रूल?
जर्मनी की संसद में जिस प्रस्ताव पर चर्चा हो रही है, उसके मुताबिक पेट्रोल पंप दिन में सिर्फ एक बार दोपहर 12 बजे कीमत बढ़ा सकेंगे। यानी अगर कीमत बढ़ानी है, तो वही एक तय समय होगा।
हालांकि, राहत की बात ये है कि कीमतें घटाने पर कोई रोक नहीं होगी। यानी अगर कंपनियां चाहें तो दिन में कभी भी दाम कम कर सकती हैं। सरकार का मानना है कि इससे बार-बार कीमत बढ़ाने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी।
नियम तोड़ने पर भारी जुर्माना
सरकार इस नियम को सिर्फ सलाह तक सीमित नहीं रखना चाहती है। अगर कोई पेट्रोल पंप तय समय के अलावा कीमत बढ़ाता है, तो उस पर कड़ी कार्रवाई होगी।
प्रस्ताव के अनुसार, नियम तोड़ने वालों पर 1 लाख यूरो तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। साफ है कि सरकार इस मामले में सख्ती दिखाने के मूड में है।
क्यों उठाना पड़ा ये कदम
असल में हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय हालात ने तेल बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है। अमेरिका और इजराइल से जुड़ी सैन्य गतिविधियों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है।
जर्मनी उन देशों में शामिल है जहां इसका असर सबसे ज्यादा महसूस किया गया। हालिया आंकड़े बताते हैं कि पेट्रोल और डीजल दोनों की कीमतों में यूरोपीय औसत से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में सरकार पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक था।
उपभोक्ताओं पर बढ़ता बोझ
सरकारी सलाहकार संस्था मोनोपॉलकोमिशन के आंकड़ों से भी यही संकेत मिलता है कि इस पूरे संकट का सबसे बड़ा असर आम लोगों पर पड़ा है। रोजमर्रा के खर्च पहले ही बढ़े हुए हैं, और अब ईंधन महंगा होने से हालात और मुश्किल हो गए हैं।
राजनीतिक स्तर पर भी आवाज उठ रही है कि कंपनियां जरूरत से ज्यादा मुनाफा कमा रही हैं, जबकि सप्लाई में कोई खास दिक्कत नहीं है।
क्या हो सकता है इसका असर
अगर यह नियम लागू होता है, तो पेट्रोल पंपों पर एक नया ट्रेंड देखने को मिल सकता है। दोपहर 12 बजे से पहले लोग ज्यादा संख्या में ईंधन भरवाने पहुंच सकते हैं, ताकि बढ़ी हुई कीमत से बचा जा सके।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बाजार का व्यवहार थोड़ा असामान्य भी हो सकता है।
हर कोई सहमत नहीं
इस प्रस्ताव को लेकर जर्मनी में एक राय नहीं है। कुछ औद्योगिक संगठनों ने इस तरह के नियमों की आलोचना की है और इसे बाजार में दखल बताया है।
अब नजर इस बात पर है कि संसद के ऊपरी सदन से इसे मंजूरी मिलती है या नहीं। उसके बाद ही यह नियम जमीन पर लागू हो पाएगा।
कुल मिलाकर, जर्मनी का यह कदम दिखाता है कि महंगाई और ईंधन संकट से निपटने के लिए सरकारें अब पारंपरिक तरीकों से हटकर नए प्रयोग करने को तैयार हैं। अब देखना होगा कि यह प्रयोग कितना सफल साबित होता है।


