कानपुर के छात्र ने बनाया स्टूडेंट-बिल्ट रॉकेट:यूट्यूब से सीखा, 3.3 किमी ऊंचाई और मैक 1.3 की रफ्तार का दावा; सैन फ्रांसिस्को का ऑफर ठुकराया था

कानपुर के छात्र ने बनाया स्टूडेंट-बिल्ट रॉकेट:यूट्यूब से सीखा, 3.3 किमी ऊंचाई और मैक 1.3 की रफ्तार का दावा; सैन फ्रांसिस्को का ऑफर ठुकराया था

जहां आज की युवा पीढ़ी का बड़ा हिस्सा रील्स और सोशल मीडिया में उलझा नजर आता है, वहीं कानपुर के 12वीं के छात्र अविरल वाजपेयी ने अपनी अलग पहचान बनाई है। अविरल ने अपने साथियों के साथ मिलकर ऐसा रॉकेट तैयार किया है, जिसे भारत का अब तक का सबसे तेज और सबसे ऊंचाई तक पहुंचने वाला ‘स्टूडेंट-बिल्ट’ रॉकेट बताया जा रहा है। खास बात यह है कि इस उपलब्धि के पीछे किसी बड़े संस्थान की सीधी छतरी नहीं, बल्कि एक छात्र का जुनून, लगातार प्रयोग और यूट्यूब से सीखी गई तकनीकी समझ है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के मुताबिक, इस उपलब्धि को भारतीय युवाओं की बड़ी कामयाबी के तौर पर पेश किया गया है। 2018 में शुरू हुआ सपना, SpaceX से मिली प्रेरणा
अविरल बताते हैं कि उनकी रॉकेटरी यात्रा की शुरुआत वर्ष 2018 में हुई। यूट्यूब पर SpaceX और रॉकेटरी से जुड़े वीडियो देखते-देखते उनके भीतर इस क्षेत्र को समझने की जिज्ञासा बढ़ती गई। उन्होंने महसूस किया कि अमेरिका में एमेच्योर रॉकेटरी को लेकर काफी काम हो रहा है, लेकिन भारत में छात्रों के लिए इस तरह का प्लेटफॉर्म बहुत सीमित है। संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने अपने सपने को नहीं छोड़ा। बाद में उन्होंने IIT कानपुर के एरो-मॉडलिंग से जुड़े माहौल से संपर्क बनाया और तकनीकी दिशा में आगे बढ़ना शुरू किया। 11 से 11.5 लाख रुपये खर्च, सिस्टम की देरी से बढ़ी लागत
अविरल के अनुसार इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में करीब 11 से 11.5 लाख रुपये की लागत आई। उनका कहना है कि यदि सरकारी अनुमतियां समय पर मिल जातीं, तो यही काम 5 से 6 लाख रुपये में पूरा हो सकता था। कई स्तरों पर प्रक्रियागत देरी और अनुमतियों के कारण लागत बढ़ती चली गई। इसके बावजूद टीम ने सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए और स्थानीय प्रशासन को सूचित करके अपना प्रोजेक्ट पूरा किया। ‘प्रोमेथियस’ नाम के रॉकेट ने बनाया रिकॉर्ड
अविरल का दावा है कि उनकी टीम ने ‘प्रोमेथियस’ नाम से एक साउंडिंग रॉकेट तैयार किया, जिसने मैक 1.3 की रफ्तार पार की और करीब 3.3 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा। इसे भारत का पहला ऐसा छात्र-निर्मित और सफलतापूर्वक रिकवर किया गया साउंडिंग रॉकेट बताया जा रहा है। सार्वजनिक पोस्टों में भी इसे भारत का हाई-वेलोसिटी छात्र-निर्मित रॉकेट बताया गया है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि का विस्तृत रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से सीमित नजर आता है। रॉकेट की डिजाइन भारतीय, तकनीक में भी स्वदेशी जोर
बताया गया कि रॉकेट का फ्लाइट कंप्यूटर इटली की एक कंपनी के सहयोग से विकसित किया गया, लेकिन इसके अलावा डिजाइनिंग, सिम्युलेशन और मैन्युफैक्चरिंग का अधिकांश काम भारतीय स्तर पर किया गया। टीम का कहना है कि रॉकेट की परफॉर्मेंस और डेटा की जांच भी कराई गई। अविरल की यह उपलब्धि सिर्फ रफ्तार तक सीमित नहीं रही, बल्कि रॉकेट को सफलतापूर्वक रिकवर किया जाना भी इसकी बड़ी विशेषता मानी जा रही है। सैन फ्रांसिस्को का ऑफर ठुकराया, कहा- काम हिंदुस्तान के लिए करूंगा
अविरल के पिता सुशील वाजपेयी के मुताबिक, बेटे को बचपन से ही रॉकेट्स में खास रुचि थी। परिवार का कहना है कि अविरल को विदेश से भी अवसर मिले, लेकिन उन्होंने भारत में रहकर काम करने को प्राथमिकता दी। अविरल का फोकस अपने शहर कानपुर और देश में रॉकेटरी इकोसिस्टम खड़ा करने पर है। उनका सपना भारत में भी ऐसी तकनीकी क्रांति लाने का है, जैसी निजी स्पेस सेक्टर में दुनिया के कुछ बड़े नामों ने अपने देशों में की। IRA बनाकर युवाओं के लिए खोला नया रास्ता
अविरल ने सिर्फ खुद तक अपनी उपलब्धि सीमित नहीं रखी। अपने साथियों कुंज सुरतिया और ओजस मेहता के साथ मिलकर उन्होंने ‘इंडियन रॉकेटरी एसोसिएशन’ यानी IRA की स्थापना की। सार्वजनिक प्रोफाइल्स में भी इस एसोसिएशन और टीम के सदस्यों का उल्लेख मिलता है। इस प्लेटफॉर्म के जरिए रॉकेटरी सीखने के इच्छुक युवाओं को संसाधन, दस्तावेज और मेंटरशिप उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है। अब वर्ल्ड-क्लास प्रतियोगिता कराने की तैयारी
अविरल की अगली योजना भारत में वर्ल्ड-क्लास रॉकेटरी प्रतियोगिता आयोजित करने की है, ताकि देश की प्रतिभाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मंच मिल सके। कानपुर जैसे शहर से निकली यह कहानी बताती है कि सीमित संसाधनों के बीच भी जुनून, सीखने की ललक और तकनीक के प्रति समर्पण से बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।

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