Strategic Alliance: मध्य पूर्व (Middle East Crisis) में चल रहे तनाव और युद्ध ने तुर्की, अजरबैजान और पाकिस्तान (Turkey Azerbaijan Pakistan) के बीच बनी मजबूत रणनीतिक साझेदारी को बड़ी चुनौती दे दी है। यह तीनों देश पिछले कुछ सालों से एक-दूसरे के करीब आए हैं, लेकिन अब ईरान-इजरायल संघर्ष (Iran Israel Conflict) की आग ने इनकी एकजुटता (Strategic Alliance) पर सवाल खड़े कर दिए हैं। तुर्की और अजरबैजान ने हाल ही में ईरान पर हमले का आरोप लगाया है, जबकि ईरान ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। इस वजह से इन देशों के बीच तनाव बढ़ गया है। पाकिस्तान, जो दूर बैठा है, लेकिन इन दोनों देशों का मजबूत साथी है, अब इस संकट से परेशान दिख रहा है। पाकिस्तान ने इन हमलों पर गंभीर चिंता जताई है और क्षेत्र में संयम बरतने की अपील की है। ध्यान रहे कि इन तीनों देशों की दोस्ती की शुरुआत सैन्य अभ्यासों से हुई थी। 2021 में ‘थ्री ब्रदर्स’ मिलिट्री एक्सरसाइज बाकू में हुआ था, जिसमें रक्षा सहयोग, प्रशिक्षण और कूटनीतिक समर्थन पर जोर दिया गया। नागोर्नो-काराबाख युद्ध में तुर्की ने अजरबैजान की खुलकर मदद की, और पाकिस्तान ने भी कूटनीतिक स्तर पर साथ दिया। तुर्की को कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ मिला, जबकि अजरबैजान को कॉकस क्षेत्र में मजबूती मिली।
कई मोर्चों पर संतुलन बनाना पड़ रहा है (Regional Tensions)
मिडिल ईस्ट का मौजूदा संकट इनकी ताकत को परख रहा है। तुर्की नाटो (NATO) का सदस्य है और पश्चिमी देशों से गहरे रिश्ते रखता है, इसलिए उसे कई मोर्चों पर संतुलन बनाना पड़ रहा है। अजरबैजान की अर्थव्यवस्था तेल-गैस निर्यात पर टिकी है, और युद्ध से ऊर्जा मार्गों पर खतरा मंडरा रहा है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले से कमजोर है, और उसे खाड़ी देशों से मदद की जरूरत है, इसलिए वह किसी बड़े संघर्ष में खुले तौर पर शामिल नहीं होना चाहता। यह गठबंधन क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण था, लेकिन अब जियो-पॉलिटिकल दबाव ने इसकी कमजोरियां उजागर कर दी हैं।
तीनों को अपनी नीतियों में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं
अगर तनाव और बढ़ा तो इन तीनों को अपनी नीतियों में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं। भारत के नजरिये से यह तिकड़ी पहले चुनौती बनती थी, लेकिन अब संकट ने इनकी स्थिति को कमजोर कर दिया है। मिडिल ईस्ट की यह आग सिर्फ स्थानीय नहीं रही, बल्कि पूरे क्षेत्र की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित कर रही है। तुर्की, अजरबैजान और पाकिस्तान को अब सावधानी से कदम उठाने होंगे ताकि उनकी साझेदारी बनी रहे। भारत के लिए यह स्थिति फायदेमंद साबित हो सकती है, क्योंकि विरोधी तिकड़ी पर दबाव बढ़ा है। वहीं, वैश्विक स्तर पर अमेरिका और नाटो की भूमिका भी प्रभावित हो रही है, क्योंकि तुर्की जैसे सदस्य अलग रास्ता तलाश रहे हैं।


