पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख: सेवक किसके?

पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख: सेवक किसके?

यह कार्यपालिका को क्या होता जा रहा है? आए दिन ऐसे काम किए जा रहे हैं, जिनसे या तो लोकतंत्र की जड़ें खोखली हो रही हैं या देश की संस्कृति से खिलवाड़ हो रहा है। अफसर चाहे केंद्र के हों या राज्य के- मनमाने कदम उठा रहे हैं। न तो इनमें न्यायपालिका के लिए सम्मान दिखाई देता है और न विधायिका के प्रति। इनको नीचा दिखाने का कोई मौका वे हाथ से नहीं छोड़ते।

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को एनसीईआरटी के विरुद्ध कड़े तेवर दिखाने पड़े। एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में जिस तरह न्यायपालिका के कथित भ्रष्टाचार का उल्लेख किया गया, वह वाकई शर्मनाक है। आज देश के नागरिकों को सबसे ज्यादा किसी पर विश्वास है तो वह न्यायपालिका ही है। इस न्यायपालिका पर ‘पाठ’ के माध्यम से अंगुली उठाने की चेष्टा करके हमारी अहंकारी अफसरशाही ने केवल अपनी दूषित मानसिकता का ही परिचय दिया है। उसने साबित कर दिया है कि लोकतंत्र के अन्य स्तंभों के प्रति उनकी कोई आस्था नहीं है। बल्कि उसका भारतीय संस्कृति से भी कोई लगाव नहीं है। एक तरफ सरकार भारतीय संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के लिए नई शिक्षा नीति के माध्यम से ही जी-तोड़ प्रयास कर रही है, वहीं अफसर अपने पाश्चात्य प्रेम से पीछा ही नहीं छुड़ा पा रहे। वे बच्चों तक के मन में न्यायपालिका की छवि धूमिल करने से नहीं चूक रहे और नई पीढ़ी को त्योहारों से विमुख कर रहे हैं।

सांस्कृतिक विकृति पैदा करने का एक उदाहरण है, होली जैसे देश के प्रमुख त्योहार पर सीबीएसई की परीक्षा आयोजित करने का निर्णय। कौन नहीं जानता कि इस बार होली का त्योहार 2 मार्च से 4 मार्च तक मनाया जाएगा। किसी राज्य में 2 व 3 मार्च को तो किसी राज्य में 2 व 4 मार्च को। फिर भी सीबीएसई की परीक्षाएं 2 मार्च को रख दी गईं। राजस्थान शिक्षा बोर्ड के अफसरों का भी इस तरह का दिमागी दिवालियापन सामने आया। उन्होंने राजस्थान बोर्ड की परीक्षा 4 मार्च को रख दी। क्या ये अफसर चाहते हैं कि भारतीय अपने त्योहारों का आनंद न लें। अपनी संस्कृति से दूर हो जाएं। कभी होली पर पानी का उपयोग बंद करने की बात की जाती है तो कभी दीपावली पर आतिशबाजी पर प्रदूषण के नाम पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं। साल के शेष 364 दिन में हमें प्रदूषण और जल संरक्षण की चिंता नहीं रहती, सिर्फ दीपावली और होली के त्योहार ही आंखों में खटकते हैं।

दो साल पहले केंद्रीय चुनाव आयोग ने ‘देवउठनी एकादशी’ के अबूझ सावे के दिन मतदान की घोषणा कर दी थी। अंग्रेजी संस्कृति के मुरीद अफसरों को इस बात से कोई लेना-देना नहीं था कि राजस्थान में ‘देवउठनी एकादशी’ का क्या महत्व है। ‘पत्रिका’ को अभियान चलाना पड़ा था। तब जाकर मतदान की तिथि बदली गई। अभी छत्तीसगढ़ में होली को ‘सूखा दिवस’ की सूची से निकाल दिया गया। नशाखोरी से त्योहार बर्बाद हो तो कोई बात नहीं, शराब से एक दिन आय कम नहीं होनी चाहिए।

क्या कार्यपालिका का यही कर्तव्य रह गया है कि आम आदमी, उसके जीवन, उसकी संस्कृति, परंपराओं की अनदेखी कर मनमाने तरीके से काम करे। उसे तो विधायिका के भी गलत निर्णयों को रोकना चाहिए। अस्सी साल में यह तो समझ में आ ही जाना चाहिए कि वे ब्रिटिश औपनिवेशिक के नहीं सांस्कृतिक रूप से सम्पन्न ‘भारत’ के सेवक हैं।

bhuwan.jain@epatrika.com

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