गाजियाबाद नगर निगम को हाईकोर्ट ने सही ठहराया:न्यूनतम मासिक किराया दर निर्धारित ठीक, याचिका खारिज

गाजियाबाद नगर निगम को हाईकोर्ट ने सही ठहराया:न्यूनतम मासिक किराया दर निर्धारित ठीक, याचिका खारिज

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नगर निगम गाजियाबाद के न्यूनतम मासिक किराया दर ( एमएमआरआर) निर्धारण और संपत्ति कर में वृद्धि के निर्णय में कोई त्रुटि नहीं पाते हुए राजेंद्र त्यागी तथा दो अन्य की तरफ से दायर जनहित याचिका खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर कहा कि एमएमआरआर के नगर निगम के निर्णय में कोई त्रुटि नहीं है। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली तथा न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने कहा, नगर निगम ने कानूनी प्राविधानों के अनुसार कार्य किया है, इसलिए प्रकरण में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने कहा है कि स्थानीय निकायों को अपने आर्थिक निर्णय लेने में स्वतंत्रता होनी चाहिए, बशर्ते कि वे वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करें। याचीगण जो सभासद है, ने तीन मई 2025 के आदेश पहली अप्रैल 2024 की सूचना और सात मार्च 2025 के उस संकल्प संख्या 139 को रद्द करने की प्रार्थना की थी जिसके द्वारा संपत्ति कर में संशोधन को मंजूरी दी गई है। यह भी कहा गया था कि यूपी नगर निगम अधिनियम, 1959 की धारा 174(2)(ए) के तहत संपत्ति कर पर छूट का लाभ देने का निर्देश दिया जाए तथा नगर निगम को 15 फरवरी 2024 के कार्यकारी समिति के निर्णय को लागू करने से रोका जाए। कोर्ट ने दोनों पक्षों को विस्तार से सुनने के बाद कहा कि अकोला नगर निगम के मामले में देखा गया है कि कर दरें लगभग 16 वर्षों तक स्थिर रहीं। जब संबंधित निगम ने दरों के संशोधन के लिए वैधानिक प्रक्रिया अपनाई, तब उच्च न्यायालय ने निर्णय में हस्तक्षेप किया, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उसके निर्णय को पलटते हुए कहा कि जब निगम की नगरपालिका करों को संशोधित करने की मौलिक अधिकारिता को चुनौती नहीं दी गई। तब उच्च न्यायालय की जांच का दायरा केवल यह देखने तक सीमित था कि क्या वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया है। शिव सेवक सिंह मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का उल्लेख भी खंडपीठ ने किया। कहा कि न्यायालय ने पाया कि नगर आयुक्त द्वारा अधिसूचित मासिक किराए की दरें वैध थीं और आकलन सूचियां अधिनियम की धारा 212 के तहत अंतिम और निर्णायक मानी गईं।
ऐसा ही वर्तमान मामले में भी है। कोर्ट ने कहा, सुप्रीम कोर्ट का अनजुम एम.एच. घासवाला तथा दीपक बाबारिया मामले में दिया गया निर्णय भी याचीगण के पक्ष में नहीं है क्योंकि यह पूरी तरह से आयकर अधिनियम के संदर्भ में पारित हुआ था, जहां विषय वस्तु सीबीडीटी सर्कुलर के तहत राहत देने के लिए सेटलमेंट कमीशन के अधिकारों से संबंधित थी। कोर्ट ने कहा, हमने नगर आयुक्त द्वारा ‘एमएमआरआर’ निर्धारण के आधार पर प्रापर्टी टैक्स में संशोधन/वृद्धि के अधिकारों के प्रयोग में कोई दोष या अवैधता नहीं पाई है।

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