राजस्थान के राजकीय पक्षी और दुनिया के सबसे दुर्लभ पक्षियों में शुमार ‘गोडावण’ के लिए थार के रेगिस्तान से एक ऐसी खबर आई है, जो न केवल वन्यजीव प्रेमियों को सुकून देगी, बल्कि संरक्षण की दिशा में भारत के प्रयासों पर वैश्विक मुहर भी लगाएगी। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा वर्ष 2025 में की गई राष्ट्रीय स्तर की वैज्ञानिक गणना के बहुप्रतीक्षित परिणाम जारी कर दिए गए हैं। इन आंकड़ों के अनुसार, जैसलमेर जिले और आसपास के क्षेत्रों में गोडावणों की कुल संख्या अब 198 तक पहुँच गई है। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक समय ऐसा था जब विशेषज्ञ मान रहे थे कि अगले कुछ वर्षों में यह पक्षी धरती से पूरी तरह विलुप्त हो जाएगा। लेकिन जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क (DNP) और ब्रीडिंग सेंटर्स से आए इन परिणामों ने संरक्षण की एक नई पटकथा लिख दी है। शून्य से 68 तक का सफर: ब्रीडिंग सेंटर्स ने किया कमाल इस पूरी गणना का सबसे चौंकाने वाला और सुखद पहलू ब्रीडिंग सेंटर्स का प्रदर्शन रहा है। साल 2017 में जब पिछली बड़ी गणना हुई थी, तब जैसलमेर के ब्रीडिंग सेंटर्स में गोडावणों की संख्या शून्य थी। लेकिन 2025 की गणना में रामदेवरा और सम स्थित ब्रीडिंग सेंटर्स में कुल 68 गोडावण दर्ज किए गए हैं। यह सफलता ‘कैप्टिव ब्रीडिंग’ (कृत्रिम प्रजनन) कार्यक्रम की है, जिसे भारतीय वन्यजीव संस्थान और राजस्थान वन विभाग ने मिलकर चलाया। जंगलों से गोडावण के अंडों को सुरक्षित उठाकर उन्हें इन केंद्रों में हैच किया गया और चूजों की विशेष निगरानी में परवरिश की गई। आज ये 68 पक्षी इस प्रजाति के लिए ‘इंश्योरेंस पॉपुलेशन’ का काम कर रहे हैं। खुले आसमान के नीचे 130 ‘आजाद’ गोडावण गणना के आंकड़ों के अनुसार, जैसलमेर के खुले जंगलों, डेजर्ट नेशनल पार्क और सेना के पोकरण फील्ड फायरिंग रेंज में कुल 130 गोडावण विचरण कर रहे हैं। 2017 में यह संख्या 128 थी। भले ही खुले जंगल में संख्या में बहुत बड़ी बढ़ोतरी न दिख रही हो, लेकिन बिजली की लाइनों और शिकार जैसे खतरों के बावजूद संख्या का स्थिर रहना और मामूली बढ़ना भी विशेषज्ञों द्वारा एक बड़ी जीत माना जा रहा है। वैज्ञानिक पद्धति: वॉटर होल को छोड़ ‘ब्लॉक सैंपलिंग’ अपनाई इस बार वन विभाग ने गणना के पुराने और पारंपरिक ‘वॉटर होल’ (पानी के गड्ढों पर बैठकर गिनती) तरीके को दरकिनार कर दिया। WII का मानना है कि वॉटर होल पद्धति वैज्ञानिक रूप से सटीक नहीं होती क्योंकि कई बार एक ही पक्षी अलग-अलग जलस्रोतों पर गिना जा सकता है या कई पक्षी पानी पीने ही नहीं आते। इस बार ‘ऑक्यूपेंसी एंड डिस्टेंस सैंपलिंग’ पद्धति का उपयोग किया गया। इसके तहत: क्षेत्र: करीब 22,000 वर्ग किलोमीटर का विशाल इलाका। टीमें: 50 से अधिक विशेष टीमें बनाई गईं। विशेषज्ञ: 200 से अधिक स्वयंसेवक, वैज्ञानिक और वनकर्मी। अवधि: 7 से 17 अप्रैल 2025 तक लगातार 10 दिनों तक फील्ड में डेटा जुटाया गया। रेंज: गणना के लिए मयजालर, सुदासरी, रामगढ़, मोहनगढ़, रासला, रामदेवरा और पोकरण जैसी 7 प्रमुख रेंजों को ब्लॉक में बांटा गया। तुलनात्मक अध्ययन “टीम वर्क और तकनीक की जीत” बी.एम. गुप्ता, उप वन संरक्षक (DCF), डेजर्ट नेशनल पार्क”यह हमारे लिए बेहद उत्साहजनक समय है। 8 साल बाद हुई इस विस्तृत वैज्ञानिक गणना ने साबित कर दिया है कि जैसलमेर का ईकोसिस्टम गोडावण के लिए आज भी सबसे सुरक्षित है। हमने इस बार 22 हजार वर्ग किलोमीटर में चप्पे-चप्पे की निगरानी की है। ब्रीडिंग सेंटर्स में 68 पक्षियों का होना हमारी सबसे बड़ी कामयाबी है।” डॉ. सुतीर्थो दत्ता, विशेषज्ञ व को-ऑर्डिनेटर, GIB ब्रीडिंग सेंटर”दुनिया के 70 प्रतिशत गोडावण आज सिर्फ जैसलमेर में बचे हैं। हमारी प्राथमिकता इन पक्षियों को बिजली के तारों से बचाना और इनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखना है। 198 का आंकड़ा यह उम्मीद जगाता है कि अगर हम संरक्षण की मौजूदा गति को बनाए रखें, तो इस पक्षी को विलुप्त होने की श्रेणी से बाहर निकाला जा सकता है।” चुनौतियां अभी भी बरकरार: बिजली के तार और आवारा कुत्ते हाई-वोल्टेज बिजली लाइनें: गोडावण भारी पक्षी है और उसकी ‘पेरिफेरल विजन’ (आसपास देखने की क्षमता) कम होती है, जिससे वह उड़ते समय बिजली के तारों से टकरा जाता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद कई क्षेत्रों में तारों को अंडरग्राउंड करना अभी बाकी है। आवारा कुत्ते: डेजर्ट नेशनल पार्क के आसपास आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या गोडावण के अंडों और चूजों के लिए सबसे बड़ा खतरा बनी हुई है। बदलता लैंडस्केप: रेगिस्तान में बढ़ती खेती और कीटनाशकों के प्रयोग से गोडावण के प्राकृतिक भोजन (टिड्डे और छोटे कीड़े) पर असर पड़ रहा है। ‘सॉफ्ट रिलीज’ की तैयारी अब वन विभाग का अगला लक्ष्य ब्रीडिंग सेंटर्स में पैदा हुए गोडावणों को धीरे-धीरे खुले जंगल में छोड़ने का है। इसे ‘सॉफ्ट रिलीज’ कहा जाता है। इसके लिए विशेष बाड़े बनाए जा रहे हैं जहाँ इन पक्षियों को जंगली वातावरण के अनुकूल ढाला जाएगा। यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो अगले 5 वर्षों में खुले जंगल में गोडावणों की संख्या 250 के पार पहुँच सकती है।


