जमुई में जब बैंक ने दरवाजा बंद कर दिया तो हौसला नहीं टूटा। रिश्तेदारों से हाथ-पैर जोड़कर पूंजी जुटाई और 25 साल की नौकरी के अनुभव को अपनी ताकत बना लिया। यही कहानी है जमुई के गुगुलडीह निवासी प्रियंका कुमारी और उनके पति चंदन रावत की, जिन्होंने शहर के नीमारंग में धागा फैक्ट्री खड़ी कर दी है। आज यह छोटी सी फैक्ट्री 15 परिवारों के चूल्हे जलने का सहारा बनी हुई है। कभी रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की खाक छानने वाले चंदन रावत ने करीब 25 साल तक देश की कई बड़ी कंपनियों में नौकरी की। इस लंबे प्रवास के दौरान उन्होंने धागा निर्माण की एक-एक बारीकी को समझा। मशीन कैसे चलती है, रंगाई कैसे होती है, बाजार की मांग क्या है, सब कुछ उन्होंने नौकरी के दौरान सीखा। बैंक से मदद नहीं मिली लेकिन मन में हमेशा एक कसक थी कि अपने ही जिले के लोगों को काम के लिए बाहर क्यों जाना पड़े? इसी सोच के साथ वह घर लौटे और खुद की फैक्ट्री लगाने का सपना देखा। योजना तैयार थी, जगह भी देख ली गई, लेकिन सबसे बड़ी बाधा पूंजी बनी। चंदन बैंक के चक्कर लगाते रहे, लोन के लिए फाइल दौड़ाते रहे, लेकिन बैंक से मदद नहीं मिली। हाथों से लेबल लगाकर पैकिंग कई लोग यहीं हार मान लेते हैं, पर चंदन और प्रियंका ने हार नहीं मानी। उन्होंने रिश्तेदारों से कर्ज लिया और अपने अनुभव के भरोसे नीमारंग में छोटी सी शेड से कारोबार की नींव रख दी। आज इस फैक्ट्री में ऑटोमैटिक मशीनों से पूरा काम होता है। धागे की रंगाई, सुखाने, पॉलिश करने और रोल बनाने तक का काम मशीनों से होता है, जिसके बाद हाथों से लेबल लगाकर पैकिंग की जाती है। गुणवत्ता ऐसी कि महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल तक से ऑर्डर आ रहे हैं। बिहार के लगभग सभी जिलों में इनका धागा जा रहा है। खास बात यह है कि जिस कंपनी में चंदन पहले नौकरी करते थे, आज वही कंपनी उनसे धागा खरीद रही है। जमुई में जब बैंक ने दरवाजा बंद कर दिया तो हौसला नहीं टूटा। रिश्तेदारों से हाथ-पैर जोड़कर पूंजी जुटाई और 25 साल की नौकरी के अनुभव को अपनी ताकत बना लिया। यही कहानी है जमुई के गुगुलडीह निवासी प्रियंका कुमारी और उनके पति चंदन रावत की, जिन्होंने शहर के नीमारंग में धागा फैक्ट्री खड़ी कर दी है। आज यह छोटी सी फैक्ट्री 15 परिवारों के चूल्हे जलने का सहारा बनी हुई है। कभी रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की खाक छानने वाले चंदन रावत ने करीब 25 साल तक देश की कई बड़ी कंपनियों में नौकरी की। इस लंबे प्रवास के दौरान उन्होंने धागा निर्माण की एक-एक बारीकी को समझा। मशीन कैसे चलती है, रंगाई कैसे होती है, बाजार की मांग क्या है, सब कुछ उन्होंने नौकरी के दौरान सीखा। बैंक से मदद नहीं मिली लेकिन मन में हमेशा एक कसक थी कि अपने ही जिले के लोगों को काम के लिए बाहर क्यों जाना पड़े? इसी सोच के साथ वह घर लौटे और खुद की फैक्ट्री लगाने का सपना देखा। योजना तैयार थी, जगह भी देख ली गई, लेकिन सबसे बड़ी बाधा पूंजी बनी। चंदन बैंक के चक्कर लगाते रहे, लोन के लिए फाइल दौड़ाते रहे, लेकिन बैंक से मदद नहीं मिली। हाथों से लेबल लगाकर पैकिंग कई लोग यहीं हार मान लेते हैं, पर चंदन और प्रियंका ने हार नहीं मानी। उन्होंने रिश्तेदारों से कर्ज लिया और अपने अनुभव के भरोसे नीमारंग में छोटी सी शेड से कारोबार की नींव रख दी। आज इस फैक्ट्री में ऑटोमैटिक मशीनों से पूरा काम होता है। धागे की रंगाई, सुखाने, पॉलिश करने और रोल बनाने तक का काम मशीनों से होता है, जिसके बाद हाथों से लेबल लगाकर पैकिंग की जाती है। गुणवत्ता ऐसी कि महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल तक से ऑर्डर आ रहे हैं। बिहार के लगभग सभी जिलों में इनका धागा जा रहा है। खास बात यह है कि जिस कंपनी में चंदन पहले नौकरी करते थे, आज वही कंपनी उनसे धागा खरीद रही है।

