हरियाणा के पूर्व DGP से धोखाधड़ी के आरोपी बरी:पुलिस ने 13 गवाह जुटाए, रिकॉर्ड में कुछ नहीं मिला; IPS की गवाही से पहले मौत

हरियाणा के पूर्व DGP से धोखाधड़ी के आरोपी बरी:पुलिस ने 13 गवाह जुटाए, रिकॉर्ड में कुछ नहीं मिला; IPS की गवाही से पहले मौत

सोनीपत में पूर्व DGP लायक राम डबास (IPS) के साथ हुए फ्रॉड के केस में कोर्ट ने दोनों आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश की नीयत को बिना किसी संदेह के साबित करने में पूरी तरह से विफल रहा है। सात साल बाद ये फैसला तब आया है, जबकि लायक राम डबास व उनकी पत्नी गीता डबास दोनों की मौत हो चुकी है। IPS अधिकारी की गवाही भी इस केस में नहीं हो सकी थी। केस में पानीपत के नगला बाग निवासी सुल्तान सिंह और दिल्ली के बवाना निवासी नारायण सिंह को आरोपी बनाया गया था। खास बात ये रही कि मामले के रिकॉर्ड में तथाकथित धोखाधड़ी का कोई सबूत नहीं मिला। जाने क्या था पूरा मामला… सोनीपत सेक्टर-19 निवासी शिकायतकर्ता हरियाणा के पूर्व DGP (Retd. IPS) लायक राम डाबास ने 16 अक्टूबर 2018 को गन्नौर थाना में दर्ज कराई FIR में बताया कि उसने और उनकी पत्नी गीता डाबास ने 14 सितंबर 2018 को रजिस्टर्ड सेल डीड (नंबर 2190) के जरिए गांव बड़ी (तहसील गन्नौर) में जमीन खरीदी थी। अक्टूबर 2018 में उन्हें पता चला कि दिल्ली हाईकोर्ट में उक्त संपत्ति को लेकर केस लंबित था और हाईकोर्ट ने 02 फरवरी.2018 को जमीन के हस्तांतरण पर रोक लगा रखी थी। आरोप लगाया कि विक्रेताओं (सुल्तान सिंह, नारायण सिंह व अन्य) ने केस और स्टे ऑर्डर की बात जानबूझकर छिपाई और धोखाधड़ी से जमीन बेच दी। पुलिस ने इस मामले में जांच के बाद चालान पेश किया था। पुलिस ने पेश किए 13 गवाह गन्नौर के न्यायिक मजिस्ट्रेट सागर शर्मा की कोर्ट में चल रहे केस में मुकदमे की सुनवाई के दौरान सहायक सरकारी वकील ने कुल 13 गवाह पेश किए और तर्क दिया कि आरोपियों ने स्टे ऑर्डर छिपाकर धोखाधड़ी की है। दूसरी तरफ आरोपी सुल्तान सिंह और नारायण सिंह के वकीलों ने दलील दी कि उनको झूठा फंसाया गया है। केस की सुनवाई के दौरान रजिस्ट्री क्लर्क और हलका पटवारी दोनों ने क्रॉस-एग्जामिनेशन में स्वीकार किया कि सरकारी राजस्व रिकॉर्ड या सेल डीड पर कोर्ट का कोई स्टे/रोक दर्ज नहीं थी। न्यायिक मजिस्ट्रेट सागर शर्मा ने 21 पन्नों के फैसले में आरोपियों को ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) देते हुए बरी कर दिया। कोर्ट ने अपने निर्णय में कई अहम बातें… धोखाधड़ी की नीयत : कोर्ट ने कहा कि धारा 420 IPC के तहत अपराध साबित करने के लिए सौदे की शुरुआत से ही धोखाधड़ी की नीयत साबित होना जरूरी है। इस मामले में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि आरोपियों ने कोई झूठा आश्वासन दिया था। शिकायतकर्ता की गवाही नहीं हुई : शिकायतकर्ता लायक राम डाबास का निधन (जुलाई 2022) हो जाने के कारण उनकी मुख्य गवाही कोर्ट में नहीं हो सकी। केवल एफआईआर या शिकायत के आधार पर बिना प्रत्यक्ष साक्ष्य के आपराधिक नीयत नहीं मानी जा सकती। राजस्व रिकॉर्ड : जिस सेल डीड के तहत आरोपियों को जमीन मिली थी, उसे कोर्ट के फैसले (दिनांक 29.11.2017) से बहाल किया गया था और पटवारी रिकॉर्ड में नामांतरण दर्ज था। साजिश का सबूत नहीं: दोनों आरोपियों के बीच धोखाधड़ी की साजिश रचने का कोई स्वतंत्र सबूत सामने नहीं आया। कोर्ट इन सभी तथ्यों का संज्ञान लेते हुए सुल्तान सिंह और नारायण सिंह को आरोपों से बरी कर दिया।

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