पूर्णिया की जीवनरेखा मानी जाने वाली सौरा नदी को प्रदूषण और गंदगी से मुक्त कराने के अभियान के तहत सामाजिक कार्यकर्ताओं के शिष्टमंडल ने जिला पदाधिकारी को ज्ञापन सौंपा है। ज्ञापन के जरिए कार्यकर्ताओं ने नदी के किनारे वर्षों से जमा ठोस कचरे और घातक मेडिकल वेस्ट के वैज्ञानिक निस्तारण की पुरजोर मांग की है। अभियान का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता शौर्य राय ने नदी के जलग्रहण क्षेत्र में कचरे के अंबार, बायो-मेडिकल वेस्ट की मौजूदगी और सफाई के नाम पर की जा रही खानापूर्ति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए प्रशासन से तत्काल ठोस कदम उठाने का आग्रह किया। कार्यकर्ताओं ने जिला प्रशासन से मांग की कि नदी में फेंके जा रहे बायो-मेडिकल कचरे के मूल स्रोतों (निजी नर्सिंग होम, पैथोलॉजी लैब व क्लिनिक) की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। इसके निस्तारण के लिए जिम्मेदार अधिकृत एजेंसियों की कार्यशैली की समीक्षा कर दोषी पाए जाने पर उनके खिलाफ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए। इसके साथ ही भविष्य में नदी किनारे कचरा डंपिंग रोकने के लिए सीसीटीवी निगरानी और संबंधित वार्ड व सफाई निरीक्षकों की सीधी जवाबदेही तय करने की मांग रखी गई। मामले में नगर आयुक्त अनिरुद्ध पांडेय ने बताया कि उन्होंने पूर्व में ही सौरा नदी किनारे से कचरा पूरी तरह हटाने का स्पष्ट निर्देश जारी किया था। संबंधित अमले द्वारा उन्हें कचरा उठा लिए जाने की सूचना भी दी गई थी। अब वे स्वयं मौके पर जाकर स्थलीय निरीक्षण करेंगे और जहां भी कचरा या गंदगी पाई जाएगी, उसे तत्काल साफ कराया जाएगा। 2 अक्टूबर से जारी है अभियान, जलकुंभी से कचरा छिपाने का गंभीर आरोप,पारिस्थितिकी तंत्र पर संकट गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर से शुरू हुए इस जन-अभियान के माध्यम से सामाजिक कार्यकर्ताओं की टीम लगातार सौरा नदी में बढ़ते प्रदूषण की भयावह तस्वीर सामने ला रही है। अभियान से जुड़े सदस्यों का कहना है कि प्रशासन द्वारा अब तक नाममात्र का कचरा हटाया गया है, जबकि समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस व प्रभावी पहल धरातल पर नजर नहीं आ रही है। कार्यकर्ताओं ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कई संवेदनशील घाटों और किनारों पर कचरे को पूरी तरह बाहर निकालने के बजाय उसे पानी में मौजूद जलकुंभी से ढकने का प्रयास किया जा रहा है। इस तरह की लीपापोती से नदी की वास्तविक सफाई नहीं हो सकती, बल्कि इससे पानी के सड़ने और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के नष्ट होने का खतरा और अधिक बढ़ जाएगा। बायो-मेडिकल कचरा बन रहा धीमा जहर, सिर्फ रस्म अदायगी से नहीं बचेगी सौरा नदी सौरा नदी में सामान्य घरेलू कचरे के साथ-साथ प्रयुक्त सिरिंज, एक्सपायरी दवाएं, रक्तयुक्त पट्टियां और अन्य बायो-मेडिकल वेस्ट का बहना शहर के जनस्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक है। मेडिकल कचरा सीधे भूजल और नदी के जल को विषाक्त बना रहा है, जिससे चर्म रोग, संक्रमण और जलजनित महामारियों का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। जब तक नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग नदी तटों को नो-डंपिंग जोन घोषित कर कचरा फेंकने वालों पर भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई नहीं करेंगे, तब तक प्रतीकात्मक सफाई अभियानों से सौरा का अस्तित्व नहीं बचाया जा सकता। पूर्णिया की जीवनरेखा मानी जाने वाली सौरा नदी को प्रदूषण और गंदगी से मुक्त कराने के अभियान के तहत सामाजिक कार्यकर्ताओं के शिष्टमंडल ने जिला पदाधिकारी को ज्ञापन सौंपा है। ज्ञापन के जरिए कार्यकर्ताओं ने नदी के किनारे वर्षों से जमा ठोस कचरे और घातक मेडिकल वेस्ट के वैज्ञानिक निस्तारण की पुरजोर मांग की है। अभियान का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता शौर्य राय ने नदी के जलग्रहण क्षेत्र में कचरे के अंबार, बायो-मेडिकल वेस्ट की मौजूदगी और सफाई के नाम पर की जा रही खानापूर्ति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए प्रशासन से तत्काल ठोस कदम उठाने का आग्रह किया। कार्यकर्ताओं ने जिला प्रशासन से मांग की कि नदी में फेंके जा रहे बायो-मेडिकल कचरे के मूल स्रोतों (निजी नर्सिंग होम, पैथोलॉजी लैब व क्लिनिक) की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। इसके निस्तारण के लिए जिम्मेदार अधिकृत एजेंसियों की कार्यशैली की समीक्षा कर दोषी पाए जाने पर उनके खिलाफ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए। इसके साथ ही भविष्य में नदी किनारे कचरा डंपिंग रोकने के लिए सीसीटीवी निगरानी और संबंधित वार्ड व सफाई निरीक्षकों की सीधी जवाबदेही तय करने की मांग रखी गई। मामले में नगर आयुक्त अनिरुद्ध पांडेय ने बताया कि उन्होंने पूर्व में ही सौरा नदी किनारे से कचरा पूरी तरह हटाने का स्पष्ट निर्देश जारी किया था। संबंधित अमले द्वारा उन्हें कचरा उठा लिए जाने की सूचना भी दी गई थी। अब वे स्वयं मौके पर जाकर स्थलीय निरीक्षण करेंगे और जहां भी कचरा या गंदगी पाई जाएगी, उसे तत्काल साफ कराया जाएगा। 2 अक्टूबर से जारी है अभियान, जलकुंभी से कचरा छिपाने का गंभीर आरोप,पारिस्थितिकी तंत्र पर संकट गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर से शुरू हुए इस जन-अभियान के माध्यम से सामाजिक कार्यकर्ताओं की टीम लगातार सौरा नदी में बढ़ते प्रदूषण की भयावह तस्वीर सामने ला रही है। अभियान से जुड़े सदस्यों का कहना है कि प्रशासन द्वारा अब तक नाममात्र का कचरा हटाया गया है, जबकि समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस व प्रभावी पहल धरातल पर नजर नहीं आ रही है। कार्यकर्ताओं ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कई संवेदनशील घाटों और किनारों पर कचरे को पूरी तरह बाहर निकालने के बजाय उसे पानी में मौजूद जलकुंभी से ढकने का प्रयास किया जा रहा है। इस तरह की लीपापोती से नदी की वास्तविक सफाई नहीं हो सकती, बल्कि इससे पानी के सड़ने और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के नष्ट होने का खतरा और अधिक बढ़ जाएगा। बायो-मेडिकल कचरा बन रहा धीमा जहर, सिर्फ रस्म अदायगी से नहीं बचेगी सौरा नदी सौरा नदी में सामान्य घरेलू कचरे के साथ-साथ प्रयुक्त सिरिंज, एक्सपायरी दवाएं, रक्तयुक्त पट्टियां और अन्य बायो-मेडिकल वेस्ट का बहना शहर के जनस्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक है। मेडिकल कचरा सीधे भूजल और नदी के जल को विषाक्त बना रहा है, जिससे चर्म रोग, संक्रमण और जलजनित महामारियों का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। जब तक नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग नदी तटों को नो-डंपिंग जोन घोषित कर कचरा फेंकने वालों पर भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई नहीं करेंगे, तब तक प्रतीकात्मक सफाई अभियानों से सौरा का अस्तित्व नहीं बचाया जा सकता।

