उच्च शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव ने बताई मंत्री सुदिव्य सोनू की वह कार्यशैली, जो उन्हें अलग बनाती थी लंबी बैठकों के पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन से संतुष्ट नहीं होते थे, पूछते थे… जमीन पर क्या असर होगा और कठिनाई क्या है…? एक मंत्री के जाने से केवल एक राजनीतिक कुर्सी खाली नहीं होती; कई बार पूरे विभाग की कार्यशैली, प्राथमिकताओं और सोच में भी गहरा शून्य पैदा हो जाता है। उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के असामयिक निधन के बाद सचिवालय में काम करने वाले शीर्ष अधिकारियों के लिए भी यह एक गहरी व्यक्तिगत क्षति है। विभाग के प्रधान सचिव राहुल कुमार पुरवार ने दैनिक भास्कर से बातचीत में सोनू की कार्यशैली, विद्यार्थी-केंद्रित दृष्टिकोण और उनकी प्रशासनिक ‘स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर’ (SOP) को साझा किया। पुरवार के अनुसार, सोनू विभागीय विषयों को केवल फाइलों, औपचारिक बैठकों और तयशुदा प्रशासनिक प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं रखते थे। वे हर नीतिगत निर्णय में यह परखते थे कि इसका सीधा असर छात्र, शिक्षक और शिक्षण संस्थान पर क्या पड़ेगा। सोनू और पुरवार ने गिरिडीह में जेसी बोस विश्वविद्यालय और इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना को लेकर मिलकर कार्य किया था। वर्ष 2023 में जब पुरवार ने जरीडीह में प्रस्तावित विश्वविद्यालय की भूमि का भौतिक निरीक्षण किया था, तब सोनू ने गिरिडीह को राज्य में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा का प्रमुख केंद्र बनाने की आवश्यकता को पुरजोर तरीके से रेखांकित किया था। औपचारिकता नहीं, अधिकारियों की बात पूरी गंभीरता से सुनते थे सीधी बात राहुल पुरवार, प्रधान सचिव सुदिव्य कुमार सोनू के साथ काम करने के अनुभव को आप किस रूप में याद करते हैं? राहुल पुरवार: उनके साथ कार्य करने का अनुभव मेरे लिए केवल प्रशासनिक दायित्व भर नहीं था, बल्कि यह एक बेहद आत्मीय और सीखने योग्य अनुभव रहा। एक मंत्री के रूप में मैंने उन्हें ऐसे जनप्रतिनिधि के तौर पर देखा जो विभागीय विषयों को फाइलों और बंद कमरों की बैठकों तक सीमित नहीं रखते थे। वे विद्यार्थियों, शिक्षकों और युवाओं से जुड़े वास्तविक मुद्दों की तह तक जाते थे। उनके असामयिक निधन से विभाग ने एक संवेदनशील और सक्रिय नेतृत्व खो दिया है। व्यक्तिगत तौर पर वे एक सहज, सरल और जनोन्मुख व्यक्ति के रूप में सदैव याद रहेंगे। उनके साथ चर्चा करते समय कभी किसी प्रकार का संकोच या असहजता नहीं होती थी। उनके व्यक्तित्व की सबसे अलग बात क्या थी, जो उन्हें अन्य से अलग बनाती थी? राहुल पुरवार: उनकी सहजता और संवेदनशीलता। मंत्री पद के दायित्व के बावजूद उनमें अनावश्यक औपचारिकता रत्ती भर भी नहीं थी। वे अधिकारियों और कर्मचारियों की बात को पूरी गंभीरता से सुनते थे और विषय को गहराई से समझने के बाद ही अपनी राय बनाते थे। वे किसी व्यवस्था को सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं करते थे कि वह लंबे समय से परिपाटी के तौर पर चली आ रही है। वे स्पष्ट पूछते थे- ‘इससे विद्यार्थियों को क्या लाभ होगा तथा इसे और बेहतर कैसे किया जा सकता है?’ यही सोच उनकी कार्यशैली की असली पहचान थी। शिक्षा से जुड़े किन मुद्दों को लेकर वे सर्वाधिक गंभीर रहते थे? राहुल पुरवार: उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, छात्र सुविधाएं, शिक्षकों की जरूरतें और संस्थानों का आधारभूत विकास उनकी सर्वोच्च प्राथमिकताएं थीं। वे चाहते थे कि झारखंड के युवाओं को उच्च एवं तकनीकी शिक्षा के उत्कृष्ट अवसर अपने ही राज्य में मिलें। उनका स्पष्ट मानना था कि उच्च शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसका सीधा जुड़ाव रोजगार, कौशल, तकनीकी दक्षता और भविष्य के अवसरों से होना अनिवार्य है। विभागीय बैठकों में उनकी कार्यशैली कैसी रहती थी? राहुल पुरवार: वे समय के बेहद पाबंद और पूरी तरह परिणामोन्मुख (रिजल्ट-ओरिएंटेड) थे। अधिकारियों की प्रस्तुतियां ध्यान से देखते थे, लेकिन केवल प्रेजेंटेशन से संतुष्ट नहीं होते थे। वे यह जानना चाहते थे कि लिए गए निर्णय का जमीन पर क्या असर होगा और उसे लागू करने में व्यावहारिक कठिनाइयां क्या आ रही हैं। असहमति होने पर भी कभी संवाद का रास्ता बंद नहीं करते थे। अपनी बात दृढ़ता से रखते थे और सामने वाले को अपनी बात रखने का पूरा अवसर देते थे। अत्यंत जटिल और कठिन विषयों पर भी बैठक का माहौल सहज बनाए रखना उनकी अनूठी खूबी थी। उनके साथ काम करने का कोई ऐसा संस्मरण, जो व्यक्तिगत रूप से हमेशा याद रहेगा? राहुल पुरवार: किसी एक घटना से उनके व्यक्तित्व को बांधना कठिन है। उनकी सबसे बड़ी पूंजी उनका सहज व्यवहार था। सामान्यतः मंत्री और पदाधिकारी के बीच एक औपचारिक प्रशासनिक दूरी होती है, लेकिन उनके साथ चर्चा में यह दूरी कभी महसूस नहीं हुई। वे सामने वाले की बात को न केवल ध्यान से सुनते थे, बल्कि यह विश्वास भी दिलाते थे कि आपका सुझाव महत्वपूर्ण है। पद जितना बड़ा था, उनके व्यवहार में सरलता और मानवीयता भी उतनी ही गहरी थी। उच्च एवं तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में उनका विजन क्या था? राहुल पुरवार: उनकी प्राथमिकताओं में छात्रहित और संस्थानहित सर्वोपरि थे। वे चाहते थे कि समाज के सभी वर्गों के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के समान अवसर मिलें। वे शिक्षा को केवल पारंपरिक कक्षाओं की चारदीवारी तक सीमित नहीं मानते थे। डिजिटल लर्निंग, ई-गवर्नेंस, पुस्तकालयों का डिजिटलाइजेशन, आधुनिक प्रयोगशालाएं, कौशल विकास और अत्याधुनिक तकनीक से विद्यार्थियों को जोड़ना उनके विजन का अभिन्न हिस्सा था। वे मानते थे कि राज्य की उच्च शिक्षा को ऐसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, जहां आधुनिक तकनीक के साथ-साथ भारतीय ज्ञान परंपरा को भी यथोचित सम्मान मिले। प्रधान सचिव की नजर में सोनू की 4 प्रशासनिक कसौटियां 1. छात्रहित ही अंतिम पैमाना: योजना कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उनकी पहली कसौटी थी- अंतिम पंक्ति के विद्यार्थी को क्या लाभ होगा? 2. धरातल की पड़ताल: केवल अधिकारियों के प्रेजेंटेशन से संतुष्ट नहीं होते थे; पूछते थे कि इसे जमीन पर उतारने में बाधाएं क्या हैं? 3. प्रशासनिक दूरी का खात्मा: मंत्री-अधिकारी के बीच प्रोटोकॉल की कृत्रिम दीवार कभी नहीं बनाई; कठिन विषयों पर भी संवाद करते थे। 4. परंपरा से अलग परिणाम: कोई व्यवस्था इसलिए जारी नहीं रह सकती कि वह दशकों से ऐसे ही चल रही, प्रक्रिया से ज्यादा उनका जोर परिणाम पर था।

