नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) द्वारा ₹22 हजार करोड़ के कर्ज को महज ₹6.5 करोड़ में निपटाने के प्लान को मंजूरी मिलने पर जी ग्रुप के फाउंडर और हरियाणा के पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. सुभाष चंद्रा विवादों में घिर गए हैं। सोशल मीडिया पर चल रहे विवाद और #PaisaVapasKaro ट्रेंड पर अब सुभाष चंद्रा ने सफाई दी है। चंद्रा सोमवार सुबह सोशल मीडिया पर लाइव आए और 3 पन्नों का डॉक्यूमेंट शेयर करते हुए दावा किया है कि इस पूरे मामले में गलत धारणाएं और गलतफहमी फैलाई जा रही हैं। हालांकि उन्होंने कमेंट सेक्शन को लॉक कर रखा था और सिर्फ एक तरफा फीड ही दिया गया। असल में यह विवाद तब और गहरा गया था जब भगोड़े कारोबारी विजय माल्या ने X (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर NCLT के फैसले को “भारतीय इंसाफ का असली मजाक” करार दिया था और आरोप लगाया था कि 22 हजार करोड़ रुपये के कर्ज को महज कुछ करोड़ में निपटाया जा रहा है। डॉक्यूमेंट्स के जरिए सुभाष चंद्रा ने क्या दावे किए… दस्तावेजों में ये दिया प्रमुख बैंकों और लेंडर्स का ब्योरा अब जानिए सुभाष चंद्रा के कर्ज निपटारे का मामला क्या है… सवाल 1. NCLT ने सुभाष चंद्रा के पर्सनल इंसॉल्वेंसी मामले में क्या फैसला सुनाया है? जवाब: इंसॉल्वेंसी ट्रिब्यूनल NCLT ने सुभाष चंद्रा के रीपेमेंट प्लान को इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड की धारा 114 के तहत मंजूरी दे दी है। इसके तहत सुभाष चंद्रा को ₹22,006.57 करोड़ के कुल कर्ज के बदले महज ₹6.5 करोड़ का भुगतान करना होगा। इसके बाद उनका बाकी का पूरा ₹22,000 करोड़ से अधिक का बकाया कानूनी तौर पर हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। सवाल 2. यह फैसला किसने सुनाया और ट्रिब्यूनल में राय क्या थी? जवाब: इससे पहले NCLT की दो सदस्यीय बेंच में इस मामले को लेकर विभाजित राय आई थी। इसके बाद NCLT चेयरमैन ने तीसरे सदस्य के रूप में जुडिशियल मेम्बर नीलेश शर्मा को नियुक्त किया। नीलेश शर्मा ने बहुमत के आधार पर 144 पन्नों के आदेश में रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी। सवाल 3. क्या सुभाष चंद्रा ने खुद ₹22,006 करोड़ का पर्सनल लोन लिया था? जवाब: नहीं, यह रकम सुभाष चंद्रा द्वारा दी गई ‘पर्सनल गारंटी’ से जुड़ी है। जब किसी कंपनी या मूल कर्जदार को बैंक लोन देते हैं, तो कई बार प्रमोटर अपनी व्यक्तिगत गारंटी देता है कि अगर कंपनी भुगतान नहीं कर पाई, तो वह इसे चुकाएगा। एस्सेल ग्रुप की कंपनियों के लिए गए लोन के लिए सुभाष चंद्रा ने पर्सनल गारंटी दी थी। कंपनियों के डिफॉल्ट करने पर यह क्लेम सुभाष चंद्रा पर आ गया। इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने यह सारा पैसा व्यक्तिगत तौर पर उधार लिया था। सवाल 4. यह पूरा मामला कब और कैसे शुरू हुआ था? जवाब: यह पूरा मामला साल 2016 में शुरू हुआ था, जब इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस (IHF) ने कुछ कंपनियों को ₹726 करोड़ का लोन दिया। 2018 में डॉ. सुभाष चंद्रा इस लोन के पर्सनल गारंटर बने, यानी कंपनी के पैसे न चुकाने पर उन्हें यह रकम भरनी थी। जब कंपनियों ने डिफॉल्ट किया, तो इंडियाबुल्स ने 2022 में सुभाष चंद्रा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी। 2024 में NCLT ने इस केस को आगे बढ़ाया। अब सवाल उठता है कि मामला ₹178 करोड़ के नोटिस से शुरू होकर ₹22,000 करोड़ तक कैसे पहुंचा? दरअसल, नियम यह है कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया शुरू होती है, तो उसके सारे कर्जदाता अपना-अपना बकाया मांगने आ जाते हैं। सुभाष चंद्रा ने एस्सेल ग्रुप की दूसरी कंपनियों के कर्जों के लिए भी HDFC, एक्सिस, कैनरा और RBL जैसे कई अन्य बैंकों को पर्सनल गारंटी दे रखी थी। इन सभी बैंकों के पुराने कर्जों, सालों के भारी-भरकम ब्याज और पेनल्टी को आपस में मिलाकर कुल क्लेम ₹22,006.57 करोड़ हो गया। इसी ₹22,000 करोड़ के बकाए के बदले अब NCLT ने ₹6.5 करोड़ के रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी है। सवाल 5. किस प्रमुख बैंक या संस्थान ने इस फैसले का विरोध किया था? जवाब: LIC हाउसिंग फाइनेंस की अगुआई में कुछ कर्जदाताओं ने इस रीपेमेंट प्लान पर आपत्ति जताई थी। LIC हाउसिंग ने इसे “अव्यवहारिक और गैर-कानूनी” बताते हुए कहा था कि उन्हें ₹1,322.39 करोड़ के बकाए के बदले केवल ₹38.09 लाख दिए जा रहे हैं। सवाल 6. NCLT ने असहमति जताने वाले लेनदारों की आपत्तियों को क्यों खारिज किया? जवाब: NCLT ने पाया कि विरोध करने वाले लेनदारों के पास 20% से भी कम वोटिंग शेयर थे। रीपेमेंट प्लान को 80.81% वोटिंग शेयर वाले लेनदारों की जरूरी मंजूरी मिल चुकी थी। कानून के मुताबिक, बहुमत की मंजूरी के कारण ट्रिब्यूनल ने आपत्तियों को खारिज कर दिया। सवाल 7. क्या इसका मतलब यह है कि बैंकों का ₹22,000 करोड़ का कर्ज पूरी तरह डूब गया? जवाब: नहीं, 99.97% का हेयरकट केवल सुभाष चंद्रा की ‘व्यक्तिगत गारंटी’ के क्लेम पर लागू होता है। जिन मूल कंपनियों ने लोन लिया था, वे अब भी कर्जदार बनी हुई हैं। बैंक उन कंपनियों, उनकी संपत्तियों और अन्य गिरवी रखे गए कोलेटरल से अपनी वसूली जारी रख सकते हैं। NCLT ने भी अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि क्रेडिटर्स के पास मूल कर्जदारों से वसूली का अधिकार बना रहेगा। सवाल 8. इस फैसले का भारतीय बैंकिंग और कॉर्पोरेट सेक्टर पर क्या असर पड़ेगा? जवाब: यह फैसला आने वाले ऐसे सभी मामलों के लिए एक बड़ी मिसाल बनेगा। इससे साफ संदेश मिलता है कि अगर 75% से ज्यादा कर्ज देने वाले बैंक या लोग किसी रीपेमेंट प्लान पर राजी हो जाते हैं, तो अदालत उनके इस कारोबारी फैसले को ही सर्वोच्च मानेगी। फिर भले ही बैंकों को उनका 99% से ज्यादा पैसा छोड़ना पड़े और रिकवरी के नाम पर सिर्फ नाममात्र की रकम ही क्यों न मिले।
सुभाष चंद्रा बोले- ₹22,000 करोड़ के कर्ज पर भ्रम फैलाया:मेरी निजी उधारी शून्य, लाइव आकर 3 पन्नों का डॉक्यूमेंट दिखाया; माल्या ने सवाल उठाए थे

