सुपौल में 3 साल से जीविका भवन निर्माण अधूरा:जमीन पर 5-6 लाख का काम; 15 लाख की निकासी, PO बोले-13 लाख से ज्यादा का हुआ वर्क

सुपौल में 3 साल से जीविका भवन निर्माण अधूरा:जमीन पर 5-6 लाख का काम; 15 लाख की निकासी, PO बोले-13 लाख से ज्यादा का हुआ वर्क

सुपौल के मरौना प्रखंड की ललमनिया पंचायत के बंजारा टोला, वार्ड संख्या 11 में मनरेगा योजना से बन रहा जीविका भवन करीब तीन साल बाद भी अधूरा है। करीब 16.04 लाख रुपये की लागत वाली इस योजना के निर्माण और खर्च को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सरकारी रिकॉर्ड में अब तक 9.30 लाख रुपये से अधिक का व्यय दर्ज है, जबकि स्थानीय स्तर पर महज 5 से 6 लाख रुपये के काम दिखाई देने का दावा किया जा रहा है। वहीं, मनरेगा के कार्यक्रम पदाधिकारी (पीओ) का कहना है कि स्थल पर 13 लाख रुपये से अधिक के काम हो चुके हैं। ऐसे में वास्तविक निर्माण और खर्च की स्थिति स्पष्ट करने के लिए तकनीकी जांच की जरूरत है। 2022-23 में मिली थी स्वीकृति, 3 साल बाद भी अधूरा भवन मनरेगा के ई-वर्क रिकॉर्ड के अनुसार, योजना का नाम ‘जीपी-ललमनिया बंजारा टोला वार्ड नंबर 11 में जीविका ग्राम संगठन कार्यालय निर्माण कार्य’ है। इसे वित्तीय वर्ष 2022-23 में प्रशासनिक स्वीकृति मिली थी। रिकॉर्ड में काम शुरू होने की तारीख 16 जून 2023 दर्ज है। योजना की कुल स्वीकृत लागत 16,04,800 रुपये है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब तक 9,30,579.65 रुपये का व्यय दर्ज किया गया है। योजना में 405 मानव दिवस रोजगार सृजन का भी उल्लेख है। इसके बावजूद भवन का निर्माण पूरा नहीं होना योजना के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े कर रहा है। रिकॉर्ड में कार्य की स्थिति अब भी ‘ऑनगोइंग’ यानी जारी बताई गई है। एमबी और भुगतान को लेकर भी उठ रहे सवाल इस मामले में सूत्रों ने दावा किया है कि निर्माण कार्य की वास्तविक मात्रा से अधिक का मेजरमेंट बुक (एमबी) दर्ज किया गया है। सूत्रों के अनुसार, 15 लाख रुपये से अधिक की एमबी बुक किए जाने, ऑनलाइन वाउचर अपलोड होने और पूरी राशि की निकासी का भी दावा किया जा रहा है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में एमबी में दर्ज माप, ऑनलाइन भुगतान वाउचर, राशि निकासी के विवरण और स्थल पर हुए वास्तविक निर्माण का मिलान जरूरी है। जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि निर्माण पर कितनी राशि खर्च हुई और भुगतान वास्तविक काम के अनुरूप है या नहीं। PO बोले- एमबी के आधार पर 9.30 लाख का हिसाब योजना के खर्च और निर्माण की स्थिति पर कार्यक्रम पदाधिकारी, मरौना ने बताया कि यह वित्तीय वर्ष 2022-23 की योजना है और इसकी कुल लागत करीब 16 लाख रुपये है। उनके अनुसार, एमबी के आधार पर अब तक 9,30,580 रुपये का हिसाब है, जबकि करीब 6.21 लाख रुपये शेष हैं। स्थल पर हुए निर्माण के बारे में पूछे जाने पर पीओ ने कहा कि दोबारा मापी कराने पर 13 लाख रुपये से अधिक के काम का एमबी बन सकता है। उन्होंने तकनीकी जांच कराने की बात भी कही। हालांकि, सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज व्यय, अधिकारी के बयान और स्थल पर दिखाई देने वाले निर्माण के बीच अंतर को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। खबर प्रकाशित होने के बाद दोबारा लगाए गए मजदूर संबंधित खबर प्रकाशित होने के बाद शनिवार को निर्माण स्थल पर दोबारा मजदूर लगाए गए। भवन का काम अभी भी जारी है। पीओ के अनुसार, भवन के कुछ हिस्सों में परिवारों के रहने और अतिक्रमण की समस्या है। इस संबंध में संबंधित अधिकारियों से बातचीत की गई है। अतिक्रमण हटने के बाद शेष निर्माण कार्य पूरा कराया जाएगा। तकनीकी जांच से स्पष्ट होगी वास्तविक स्थिति इस मामले में अब सबसे अहम सवाल यह है कि करीब तीन साल में वास्तव में कितना निर्माण हुआ और योजना के तहत कितनी राशि का भुगतान किया गया। सरकारी रिकॉर्ड, एमबी, ऑनलाइन वाउचर, भुगतान और निकासी के विवरण का स्थल पर हुए काम से तकनीकी मिलान होने पर ही वास्तविक स्थिति सामने आएगी। यदि जांच में माप या भुगतान में गड़बड़ी पाई जाती है, तो जिम्मेदारी तय करने की जरूरत होगी। फिलहाल, जीविका भवन अधूरा है और खर्च को लेकर उठ रहे सवालों का अंतिम जवाब जांच के बाद ही मिल सकेगा। सुपौल के मरौना प्रखंड की ललमनिया पंचायत के बंजारा टोला, वार्ड संख्या 11 में मनरेगा योजना से बन रहा जीविका भवन करीब तीन साल बाद भी अधूरा है। करीब 16.04 लाख रुपये की लागत वाली इस योजना के निर्माण और खर्च को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सरकारी रिकॉर्ड में अब तक 9.30 लाख रुपये से अधिक का व्यय दर्ज है, जबकि स्थानीय स्तर पर महज 5 से 6 लाख रुपये के काम दिखाई देने का दावा किया जा रहा है। वहीं, मनरेगा के कार्यक्रम पदाधिकारी (पीओ) का कहना है कि स्थल पर 13 लाख रुपये से अधिक के काम हो चुके हैं। ऐसे में वास्तविक निर्माण और खर्च की स्थिति स्पष्ट करने के लिए तकनीकी जांच की जरूरत है। 2022-23 में मिली थी स्वीकृति, 3 साल बाद भी अधूरा भवन मनरेगा के ई-वर्क रिकॉर्ड के अनुसार, योजना का नाम ‘जीपी-ललमनिया बंजारा टोला वार्ड नंबर 11 में जीविका ग्राम संगठन कार्यालय निर्माण कार्य’ है। इसे वित्तीय वर्ष 2022-23 में प्रशासनिक स्वीकृति मिली थी। रिकॉर्ड में काम शुरू होने की तारीख 16 जून 2023 दर्ज है। योजना की कुल स्वीकृत लागत 16,04,800 रुपये है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब तक 9,30,579.65 रुपये का व्यय दर्ज किया गया है। योजना में 405 मानव दिवस रोजगार सृजन का भी उल्लेख है। इसके बावजूद भवन का निर्माण पूरा नहीं होना योजना के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े कर रहा है। रिकॉर्ड में कार्य की स्थिति अब भी ‘ऑनगोइंग’ यानी जारी बताई गई है। एमबी और भुगतान को लेकर भी उठ रहे सवाल इस मामले में सूत्रों ने दावा किया है कि निर्माण कार्य की वास्तविक मात्रा से अधिक का मेजरमेंट बुक (एमबी) दर्ज किया गया है। सूत्रों के अनुसार, 15 लाख रुपये से अधिक की एमबी बुक किए जाने, ऑनलाइन वाउचर अपलोड होने और पूरी राशि की निकासी का भी दावा किया जा रहा है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में एमबी में दर्ज माप, ऑनलाइन भुगतान वाउचर, राशि निकासी के विवरण और स्थल पर हुए वास्तविक निर्माण का मिलान जरूरी है। जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि निर्माण पर कितनी राशि खर्च हुई और भुगतान वास्तविक काम के अनुरूप है या नहीं। PO बोले- एमबी के आधार पर 9.30 लाख का हिसाब योजना के खर्च और निर्माण की स्थिति पर कार्यक्रम पदाधिकारी, मरौना ने बताया कि यह वित्तीय वर्ष 2022-23 की योजना है और इसकी कुल लागत करीब 16 लाख रुपये है। उनके अनुसार, एमबी के आधार पर अब तक 9,30,580 रुपये का हिसाब है, जबकि करीब 6.21 लाख रुपये शेष हैं। स्थल पर हुए निर्माण के बारे में पूछे जाने पर पीओ ने कहा कि दोबारा मापी कराने पर 13 लाख रुपये से अधिक के काम का एमबी बन सकता है। उन्होंने तकनीकी जांच कराने की बात भी कही। हालांकि, सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज व्यय, अधिकारी के बयान और स्थल पर दिखाई देने वाले निर्माण के बीच अंतर को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। खबर प्रकाशित होने के बाद दोबारा लगाए गए मजदूर संबंधित खबर प्रकाशित होने के बाद शनिवार को निर्माण स्थल पर दोबारा मजदूर लगाए गए। भवन का काम अभी भी जारी है। पीओ के अनुसार, भवन के कुछ हिस्सों में परिवारों के रहने और अतिक्रमण की समस्या है। इस संबंध में संबंधित अधिकारियों से बातचीत की गई है। अतिक्रमण हटने के बाद शेष निर्माण कार्य पूरा कराया जाएगा। तकनीकी जांच से स्पष्ट होगी वास्तविक स्थिति इस मामले में अब सबसे अहम सवाल यह है कि करीब तीन साल में वास्तव में कितना निर्माण हुआ और योजना के तहत कितनी राशि का भुगतान किया गया। सरकारी रिकॉर्ड, एमबी, ऑनलाइन वाउचर, भुगतान और निकासी के विवरण का स्थल पर हुए काम से तकनीकी मिलान होने पर ही वास्तविक स्थिति सामने आएगी। यदि जांच में माप या भुगतान में गड़बड़ी पाई जाती है, तो जिम्मेदारी तय करने की जरूरत होगी। फिलहाल, जीविका भवन अधूरा है और खर्च को लेकर उठ रहे सवालों का अंतिम जवाब जांच के बाद ही मिल सकेगा।  

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