साइबेरियन नहीं, स्थानीय हैं ‘घोंघिल’:नालंदा में 3000 के पार पहुंची एशियन ओपनबिल की आबादी; पेड़ों पर आशियाना बनाकर रह रहे

साइबेरियन नहीं, स्थानीय हैं ‘घोंघिल’:नालंदा में 3000 के पार पहुंची एशियन ओपनबिल की आबादी; पेड़ों पर आशियाना बनाकर रह रहे

नालंदा जिले के बिहारशरीफ और इससे सटे अर्ध-शहरी इलाकों में ‘घोंघिल’ (एशियन ओपनबिल) पक्षियों की आबादी में वृद्धि दर्ज की गई है। वन विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में जिले में इन पक्षियों की कुल संख्या लगभग 3 हजार तक पहुंच गई है। यह आंकड़ा पिछले दो से तीन वर्षों की तुलना में करीब दोगुना है। शहर के कोर्ट परिसर, नालंदा कॉलेज और बिहार थाना परिसर में मौजूद बड़े-बड़े पेड़ों पर पक्षियों ने अपना स्थायी बसेरा बना लिया है। जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण का सीधा प्रभाव सहायक वन संरक्षक सिम्मी प्रियनैना ने बताया कि घोंघिल पक्षियों की बढ़ती आबादी पर जलवायु परिवर्तन और तेजी से बढ़ते शहरीकरण का सीधा प्रभाव देखा जा रहा है। उन्होंने आम जनमानस में व्याप्त इस भ्रांति को तकनीकी तौर पर खारिज किया कि ये साइबेरिया से आने वाले विदेशी या प्रवासी पक्षी हैं। एसीएफ ने पुष्टि की है कि घोंघिल पूरी तरह से स्थानीय पक्षी हैं। उन्होंने स्थानीय लोगों और किसानों को सख्त हिदायत दी है कि खेतों में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल कम से कम करें ताकि इन पक्षियों की खाद्य श्रृंखला और जीवन चक्र प्रभावित न हो। साथ ही, किसी भी परिस्थिति में इनके घोंसलों को नष्ट न करने की अपील की गई है। किसानों के लिए पूर्ण रूप से लाभदायक पक्षी मगध नेचर कंजर्वेशन ट्रस्ट के विशेषज्ञ राहुल कुमार ने इस पक्षी की उपयोगिता पर तथ्यात्मक जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि ‘एशियन ओपनबिल’ स्टॉर्क प्रजाति का एक मांसाहारी पक्षी है, जो दक्षिण-पूर्व एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप का स्थायी निवासी है। इसकी लंबी टांगें और चोंच के बीच का खाली स्थान इसकी प्रमुख पहचान है, जिसके कारण इसे यह नाम मिला है। मानसून के दौरान जब खेतों में धान की रोपाई होती है, तब ये पक्षी खेतों में पनपने वाले घोंघे और फसल को नुकसान पहुंचाने वाले हानिकारक कीड़े-मकोड़ों को खा जाते हैं। इससे किसानों की फसल सुरक्षित रहती है और कृषि क्षेत्र में प्राकृतिक संतुलन बना रहता है। प्रजनन केंद्र और ‘हेरोनरी’ का निर्माण मानसून के दौरान इन पक्षियों का प्रजनन काल सक्रिय होता है। ये पक्षी सामूहिक रूप से पीपल और बरगद जैसे बड़े पेड़ों पर अपना घोंसला बनाते हैं। पक्षी विज्ञान की भाषा में इस सामूहिक निवास को ‘हेरोनरी’ कहा जाता है। बिहारशरीफ के प्रमुख प्रशासनिक और शैक्षणिक परिसरों के वृक्षों पर ये ‘हेरोनरी’ मौजूद हैं। यहां घोंघिल के साथ-साथ पनकौवा और बगुला प्रजाति के पक्षी भी एक साथ प्रजनन करते हैं। एक मादा पक्षी 3 से 4 अंडे देती है। संरक्षण क्षेत्र घोषित करने की उठी मांग इतनी बड़ी संख्या में पक्षियों के निवास के कारण संबंधित परिसरों में भारी मात्रा में मल गिरता है, जिससे गंदगी और बदबू फैलती है। इसके बावजूद स्थानीय नागरिक और प्रशासनिक कर्मचारी संयम बरतते हुए पक्षियों को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं। विशेषज्ञ राहुल कुमार ने बताया कि IUCN की लाल सूची में इसे ‘लीस्ट कंसर्न’ श्रेणी में रखा गया है। पर्यावरणविदों ने वन विभाग और प्रशासन से आधिकारिक तौर पर मांग की है कि इन प्रजनन स्थलों को ‘शहरी हेरोनरी संरक्षण क्षेत्र’ के रूप में मान्यता दी जाए। इसके अलावा, परिसरों में पेड़ों की कटाई पर पूर्ण रोक लगाने और लोगों को जागरूक करने के लिए सूचना बोर्ड स्थापित करने की भी मांग की गई है। नालंदा जिले के बिहारशरीफ और इससे सटे अर्ध-शहरी इलाकों में ‘घोंघिल’ (एशियन ओपनबिल) पक्षियों की आबादी में वृद्धि दर्ज की गई है। वन विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में जिले में इन पक्षियों की कुल संख्या लगभग 3 हजार तक पहुंच गई है। यह आंकड़ा पिछले दो से तीन वर्षों की तुलना में करीब दोगुना है। शहर के कोर्ट परिसर, नालंदा कॉलेज और बिहार थाना परिसर में मौजूद बड़े-बड़े पेड़ों पर पक्षियों ने अपना स्थायी बसेरा बना लिया है। जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण का सीधा प्रभाव सहायक वन संरक्षक सिम्मी प्रियनैना ने बताया कि घोंघिल पक्षियों की बढ़ती आबादी पर जलवायु परिवर्तन और तेजी से बढ़ते शहरीकरण का सीधा प्रभाव देखा जा रहा है। उन्होंने आम जनमानस में व्याप्त इस भ्रांति को तकनीकी तौर पर खारिज किया कि ये साइबेरिया से आने वाले विदेशी या प्रवासी पक्षी हैं। एसीएफ ने पुष्टि की है कि घोंघिल पूरी तरह से स्थानीय पक्षी हैं। उन्होंने स्थानीय लोगों और किसानों को सख्त हिदायत दी है कि खेतों में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल कम से कम करें ताकि इन पक्षियों की खाद्य श्रृंखला और जीवन चक्र प्रभावित न हो। साथ ही, किसी भी परिस्थिति में इनके घोंसलों को नष्ट न करने की अपील की गई है। किसानों के लिए पूर्ण रूप से लाभदायक पक्षी मगध नेचर कंजर्वेशन ट्रस्ट के विशेषज्ञ राहुल कुमार ने इस पक्षी की उपयोगिता पर तथ्यात्मक जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि ‘एशियन ओपनबिल’ स्टॉर्क प्रजाति का एक मांसाहारी पक्षी है, जो दक्षिण-पूर्व एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप का स्थायी निवासी है। इसकी लंबी टांगें और चोंच के बीच का खाली स्थान इसकी प्रमुख पहचान है, जिसके कारण इसे यह नाम मिला है। मानसून के दौरान जब खेतों में धान की रोपाई होती है, तब ये पक्षी खेतों में पनपने वाले घोंघे और फसल को नुकसान पहुंचाने वाले हानिकारक कीड़े-मकोड़ों को खा जाते हैं। इससे किसानों की फसल सुरक्षित रहती है और कृषि क्षेत्र में प्राकृतिक संतुलन बना रहता है। प्रजनन केंद्र और ‘हेरोनरी’ का निर्माण मानसून के दौरान इन पक्षियों का प्रजनन काल सक्रिय होता है। ये पक्षी सामूहिक रूप से पीपल और बरगद जैसे बड़े पेड़ों पर अपना घोंसला बनाते हैं। पक्षी विज्ञान की भाषा में इस सामूहिक निवास को ‘हेरोनरी’ कहा जाता है। बिहारशरीफ के प्रमुख प्रशासनिक और शैक्षणिक परिसरों के वृक्षों पर ये ‘हेरोनरी’ मौजूद हैं। यहां घोंघिल के साथ-साथ पनकौवा और बगुला प्रजाति के पक्षी भी एक साथ प्रजनन करते हैं। एक मादा पक्षी 3 से 4 अंडे देती है। संरक्षण क्षेत्र घोषित करने की उठी मांग इतनी बड़ी संख्या में पक्षियों के निवास के कारण संबंधित परिसरों में भारी मात्रा में मल गिरता है, जिससे गंदगी और बदबू फैलती है। इसके बावजूद स्थानीय नागरिक और प्रशासनिक कर्मचारी संयम बरतते हुए पक्षियों को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं। विशेषज्ञ राहुल कुमार ने बताया कि IUCN की लाल सूची में इसे ‘लीस्ट कंसर्न’ श्रेणी में रखा गया है। पर्यावरणविदों ने वन विभाग और प्रशासन से आधिकारिक तौर पर मांग की है कि इन प्रजनन स्थलों को ‘शहरी हेरोनरी संरक्षण क्षेत्र’ के रूप में मान्यता दी जाए। इसके अलावा, परिसरों में पेड़ों की कटाई पर पूर्ण रोक लगाने और लोगों को जागरूक करने के लिए सूचना बोर्ड स्थापित करने की भी मांग की गई है।  

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