ग्वालियर. शोध की सार्थकता केवल डिग्री हासिल करने या अकादमिक उपलब्धि तक सीमित नहीं है। शोध ऐसा होना चाहिए, जिसके निष्कर्ष समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान में मददगार बनें और आमजन के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएं। इसके लिए शोधार्थियों को विषय चयन से लेकर निष्कर्ष प्रस्तुत करने तक तथ्यों, साक्ष्यों और निष्पक्षता को प्राथमिकता देनी होगी। साथ ही भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों, चिंतन और अनुभवों को आधुनिक शोध पद्धतियों से जोड़ने की जरूरत है। यह बात राष्ट्रीय प्रमुख शोध फाउंडेशन के डॉ. आलोक कुमार सिंह ने जीवाजी विश्वविद्यालय के गालव सभागार में आयोजित ‘शोधदृष्टि’ कार्यशाला में कही। स्टूडेंट्स ऑफ हॉलिस्टिक डेवलपमेंट ऑफ ह्यूमैनिटी फाउंडेशन और भारतीय ज्ञान परंपरा नोडल केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में शोध मार्गदर्शकों की भूमिका’ विषय पर कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें शिक्षाविदों ने शोध की गुणवत्ता, शोध प्रविधि, मार्गदर्शकों की जिम्मेदारी और शोध के सामाजिक प्रभाव जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार रखे।
भारतीय ज्ञान परंपरा में ग्वालियर का योगदान
डॉ. आलोक कुमार सिंह ने भारतीय ज्ञान परंपरा में ग्वालियर के ऐतिहासिक योगदान का उल्लेख करते हुए राजा सूरज सेन और ग्वालिपा ऋषि से जुड़ी लोककिंवदंती का जिक्र किया। उन्होंने ग्वालियर के चतुर्भुज मंदिर के अभिलेख में शून्य के प्राचीन उल्लेखों में से एक का संदर्भ देते हुए गणित, खगोल विद्या और नैतिक शिक्षा की समृद्ध परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत की पारंपरिक ज्ञान-संपदा में आज भी शोध की अनेक संभावनाएं मौजूद हैं। शोधार्थियों को ऐसे विषयों का चयन करना चाहिए, जिनसे समाज को उपयोगी दिशा मिल सके और परंपरागत ज्ञान को समकालीन संदर्भों में समझा जा सके।
ज्ञान की सार्थकता आचरण में दिखे
डॉ. अर्जुन आनंद ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में चरित्र, नैतिकता और आदर्शों का विशेष महत्व है। ज्ञान का वास्तविक प्रभाव व्यक्ति के आचरण में दिखाई देना चाहिए। केवल जानकारी प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस ज्ञान को व्यवहार और जीवन में उतारना भी जरूरी है।जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. दिवाकर सिंह राजपूत ने शोध में निष्पक्षता और प्रमाणिकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शोधार्थियों को पूर्वाग्रहों से दूर रहकर तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालने चाहिए। शोध की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और निष्पक्ष है।
शोध प्रविधि और मार्गदर्शकों की भूमिका पर चर्चा
प्रो. अरविंद कुमार शर्मा ने भारतीय दृष्टि से शोध प्रविधि को उन्नत बनाने पर प्रस्तुति दी। रोहित दुबे ने वस्तुनिष्ठ शोध और प्रासंगिक विषय चयन के महत्व को रेखांकित किया। वहीं, भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान (आइआइटीटीएम) के निदेशक प्रो. प्रशांत कुमार गौतम ने शोध मार्गदर्शकों की भूमिका पर विचार रखे। आयोजन सचिव प्रो. शांतिदेव सिसोदिया ने बताया कि कार्यशाला का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन शोध से जोड़ना और गुणवत्तापूर्ण शोध को प्रोत्साहित करना है। कार्यक्रम में कुलसचिव डॉ. राजीव कुमार मिश्रा सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक और शोधार्थी उपस्थित रहे।

