शिक्षा के मैदान में आरएसएस से टकराएगी कांग्रेस, एक महीने में राज्यों का रोडमैप

शिक्षा के मैदान में आरएसएस से टकराएगी कांग्रेस, एक महीने में राज्यों का रोडमैप

नई दिल्ली। सियासी लड़ाई अब संसद और सड़क से निकलकर कक्षा और कैंपस तक पहुंचाने की तैयारी है। कांग्रेस ने शिक्षा को वैचारिक संघर्ष के साथ-साथ अपने शासित राज्यों में सुधार के बड़े एजेंडे के तौर पर आगे बढ़ाने का फैसला किया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और शिक्षा मंत्रियों की बैठक में शिक्षा व्यवस्था को ‘मॉडल’ बनाने का रोडमैप तय किया गया। बैठक में आरएसएस के शिक्षा क्षेत्र में वैचारिक प्रभाव का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा।

पहले राज्यों में मंथन, फिर महीनेभर में रोडमैप

कांग्रेस ने तय किया है कि प्रत्येक कांग्रेस शासित राज्य में शिक्षा विशेषज्ञों और संबंधित हितधारकों के साथ राज्य स्तरीय सेमिनार होंगे। इनमें शिक्षा व्यवस्था, सुधार की जरूरत और राज्यों को मॉडल बनाने के उपायों पर चर्चा होगी। इनके सुझावों के आधार पर मुख्यमंत्री एक महीने के भीतर विस्तृत एक्शन प्लान तैयार करेंगे। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञों के साथ सेमिनार आयोजित कर राज्यों की योजनाओं को लागू करने की साझा व्यवस्था पर मंथन होगा।

प्रेजेंटेशन में आरएसएस के वैचारिक प्रभाव का मुद्दा

बैठक में कांग्रेस ने शिक्षा व्यवस्था में आरएसएस के कथित हस्तक्षेप को भी राजनीतिक मुद्दे के तौर पर उठाया। पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल ने बताया मुख्यमंत्रियों ने आरएसएस के ‘विभाजनकारी एजेंडा’ शिक्षा व्यवस्था के जरिए युवाओं तक पहुंचाने की जानकारी दी। आरएसएस समर्थित विचारधारा वाले कुलपतियों की नियुक्तियों का मुद्दा भी प्रस्तुति में शामिल रहा। कांग्रेस का आरोप है कि विश्वविद्यालयों में ऐसी नियुक्तियों के जरिए शिक्षा व्यवस्था पर वैचारिक प्रभाव बढ़ाया जा रहा है।

‘छात्रों की गूंज’ से सरकारों तक

यह पहल राहुल गांधी के हालिया छात्र संवाद कार्यक्रमों से भी जुड़ती है। ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रमों में शिक्षा, परीक्षा, रोजगार और युवाओं से जुड़े मुद्दों को उठाने के बाद अब पार्टी इन्हें कांग्रेस शासित राज्यों की सरकारों के एजेंडे से जोड़ रही है। यानी छात्र और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को केवल राजनीतिक मंच तक सीमित रखने के बजाय सरकारों के स्तर पर नीतिगत बदलाव की दिशा में ले जाने की तैयारी है।

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