शिक्षक पात्रता परीक्षा को लेकर कर्मचारी चयन मंडल द्वारा आवेदन बुलाए जाने और परीक्षा तिथि का ऐलान किए जाने के बीच एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में विविध आवेदन दायर किया गया है। ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन मध्यप्रदेश ने वर्ष 2005 से 2009 के बीच नियुक्त शिक्षकों को दोबारा शिक्षक पात्रता परीक्षा देने की अनिवार्यता से राहत दिलाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में यह विविध आवेदन दायर किया है। ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन मप्र की ओर से दायर आवेदन का डायरी क्रमांक 53251/2026 है l स्कूल शिक्षा विभाग पहले ही इस मामले में याचिका लगा चुका है। ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन मध्यप्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष डीके सिंगौर ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से पुनर्विचार याचिका में एक महत्वपूर्ण मुद्दा बहस के दौरान उठाया गया था, लेकिन वह आधार पुनर्विचार याचिका में उसी मजबूती और विस्तार से लिखित रूप में सामने नहीं आया। न्यायालय में मौखिक रूप से कही गई बात और याचिका में विधिवत उठाए गए कानूनी आधार का प्रभाव अलग होता है। सिंगौर ने कहा कि सरकार एक प्रतिवादी के रूप में कानून, प्रशासनिक व्यवस्था और अपने निर्णयों के दायरे में रहकर ही अपना पक्ष रख सकती है। इसके विपरीत प्रभावित शिक्षक अपने व्यक्तिगत अधिकारों, नियुक्ति की परिस्थितियों, वर्षों की सेवा, अर्जित अधिकारों और नौकरी पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभाव को सीधे और व्यापक रूप से न्यायालय के समक्ष रख सकते हैं। यह याचिका नई दिल्ली में 30 अगस्त को शिक्षकों के देशव्यापी प्रदर्शन के बीच लगाई गई है। ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन की याचिका में शिक्षकों का पक्ष एसोसिएशन का कहना है कि मध्यप्रदेश शासन की पुनर्विचार याचिका और ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन द्वारा दायर विविध आवेदन में अंतर है। दोनों के उद्देश्य में कुछ समानता दिखाई दे सकती है, लेकिन प्रभावित पक्ष की स्थिति, नियुक्ति की वैधानिकता, उस समय प्राप्त पात्रता और बाद में लागू किए गए शिक्षक पात्रता परीक्षा के प्रावधानों के प्रभाव जैसे मुद्दों को एसोसिएशन ने शिक्षकों के दृष्टिकोण से व्यापक रूप से उठाया है। डीके सिंगौर ने कहा कि “हमारा उद्देश्य शिक्षक पात्रता परीक्षा का विरोध करना नहीं, बल्कि उन शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा करना है, जिन्होंने उस समय लागू वैधानिक व्यवस्था के अनुसार नियुक्त होकर वर्षों तक शिक्षक के रूप में सेवा दी है। उनके ऊपर बाद में लागू व्यवस्था को किस सीमा तक प्रभावी किया जा सकता है, यही इस पूरे विवाद का महत्वपूर्ण प्रश्न है।” एसोसिएशन का कहना है कि जिन शिक्षकों ने उस समय लागू व्यवस्था के अंतर्गत पात्रता हासिल कर नियुक्ति पाई, वर्षों तक सेवा दी और अपने दायित्वों का निर्वहन किया, उनके मामले को बाद में लागू पात्रता व्यवस्था के संदर्भ में अलग दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। जनजातीय कार्य विभाग और शिक्षा विभाग के लगभग 70 हजार शिक्षक इस कानूनी प्रयास से लाभान्वित हो सकते हैं, यदि सर्वोच्च न्यायालय प्रभावित शिक्षकों के पक्ष में उचित राहत प्रदान करता है।

