राज्य सरकार ने किसानों की आय बढ़ाने और जैविक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वर्मी कंपोस्ट एवं बायोगैस इकाई की स्थापना पर अनुदान के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया शुरू कर दी है। कृषि विभाग के अनुसार, इच्छुक किसान 30 सितंबर 2026 तक आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। इस योजना का लाभ उठाने के लिए किसानों का कृषि विभाग के डीबीटी पोर्टल पर पंजीकृत होना अनिवार्य है। किसान आधिकारिक वेबसाइट dbtagriculture.bihar.gov.in पर जाकर ‘अनुदान के लिए आवेदन’ मेनू में ‘पक्का वर्मी कंपोस्ट अनुदान’ श्रेणी का चयन कर अपना आवेदन दर्ज कर सकते हैं। सरकार पक्का वर्मी कंपोस्ट इकाई के निर्माण पर कुल लागत का 50 प्रतिशत या अधिकतम 5,000 रुपये प्रति इकाई का अनुदान प्रदान कर रही है। यह वित्तीय सहायता किसानों को जैविक खाद उत्पादन में मदद करेगी। यह योजना केवल नए आवेदकों के लिए है। जिन किसानों ने पिछले वर्षों में इस योजना के तहत अनुदान प्राप्त किया है, वे दोबारा आवेदन करने के पात्र नहीं होंगे। कृषि विभाग ने सभी पात्र किसानों से अंतिम तिथि का इंतजार किए बिना समय पर ऑनलाइन आवेदन करने की अपील की है। इस पहल से मिट्टी की उर्वरता में सुधार होगा और किसानों की उत्पादन लागत में भी कमी आएगी। राज्य सरकार ने किसानों की आय बढ़ाने और जैविक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वर्मी कंपोस्ट एवं बायोगैस इकाई की स्थापना पर अनुदान के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया शुरू कर दी है। कृषि विभाग के अनुसार, इच्छुक किसान 30 सितंबर 2026 तक आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। इस योजना का लाभ उठाने के लिए किसानों का कृषि विभाग के डीबीटी पोर्टल पर पंजीकृत होना अनिवार्य है। किसान आधिकारिक वेबसाइट dbtagriculture.bihar.gov.in पर जाकर ‘अनुदान के लिए आवेदन’ मेनू में ‘पक्का वर्मी कंपोस्ट अनुदान’ श्रेणी का चयन कर अपना आवेदन दर्ज कर सकते हैं। सरकार पक्का वर्मी कंपोस्ट इकाई के निर्माण पर कुल लागत का 50 प्रतिशत या अधिकतम 5,000 रुपये प्रति इकाई का अनुदान प्रदान कर रही है। यह वित्तीय सहायता किसानों को जैविक खाद उत्पादन में मदद करेगी। यह योजना केवल नए आवेदकों के लिए है। जिन किसानों ने पिछले वर्षों में इस योजना के तहत अनुदान प्राप्त किया है, वे दोबारा आवेदन करने के पात्र नहीं होंगे। कृषि विभाग ने सभी पात्र किसानों से अंतिम तिथि का इंतजार किए बिना समय पर ऑनलाइन आवेदन करने की अपील की है। इस पहल से मिट्टी की उर्वरता में सुधार होगा और किसानों की उत्पादन लागत में भी कमी आएगी।

