लदनियां में खाद के लिए भटक रहे किसान:जमाबंदी न होने से नहीं बना फार्मर आईडी, दुकान का चक्कर काटने को मजबूर

लदनियां में खाद के लिए भटक रहे किसान:जमाबंदी न होने से नहीं बना फार्मर आईडी, दुकान का चक्कर काटने को मजबूर

मधुबनी में लदनियां प्रखंड के देहाती इलाकों में इन दिनों किसानों के लिए खाद खरीदना मुश्किल हो गया है। कृषि विभाग की नई ऑनलाइन व्यवस्था और नियमों के कारण किसान भटकने को मजबूर हैं। खाद की कालाबाजारी रोकने के लिए विभाग ने फार्मर आईडी और आधार कार्ड के जरिए ही खाद बेचने का निर्देश दिया है। लेकिन, यह व्यवस्था किसानों के लिए परेशानी बन गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान ऑनलाइन प्रक्रिया से बच रहे हैं। इसकी दो मुख्य वजहें सामने आ रही हैं। पहली, पुश्तैनी जमीन का दाखिल-खारिज न होना। अधिकांश छोटे और सीमांत किसानों की जमीन अभी भी उनके पूर्वजों के नाम पर दर्ज है। जमाबंदी अपने नाम न होने के कारण उनकी ‘फार्मर आईडी’ नहीं बन पा रही है, जिससे वे खाद नहीं खरीद पा रहे हैं। दूसरी वजह, ओटीपी से साइबर ठगी का डर है। जिन किसानों ने किसी तरह फार्मर आईडी बनवा भी ली है, वे अब तकनीकी प्रक्रिया से डर रहे हैं। खाद खरीदते समय विक्रेता द्वारा मोबाइल पर भेजे जाने वाले ओटीपी को साझा करने से किसान हिचक रहे हैं। क्षेत्र में लगातार हो रही साइबर ठगी की घटनाओं के कारण किसानों को डर लगता है कि कहीं ओटीपी बताते ही उनके बैंक खाते से पैसे न निकल जाएं। नियमों के इस चक्कर और ऑनलाइन प्रक्रिया की बाध्यता के कारण प्रखंड की खाद दुकानों पर रोज किसानों की भीड़ लग रही है। खाद विक्रेता सरकारी निर्देशों का हवाला देते हुए बिना ऑनलाइन एंट्री और बिना आधार आईडी के खाद देने से मना कर रहे हैं। वहीं, किसान पारंपरिक तरीके से खाद की मांग कर रहे हैं। बदलते नियमों और प्रावधानों के बीच फिलहाल प्रखंड में असमंजस और परेशानी बनी हुई है। इससे समय पर फसलों को खाद न मिल पाने का संकट बढ़ रहा है। मधुबनी में लदनियां प्रखंड के देहाती इलाकों में इन दिनों किसानों के लिए खाद खरीदना मुश्किल हो गया है। कृषि विभाग की नई ऑनलाइन व्यवस्था और नियमों के कारण किसान भटकने को मजबूर हैं। खाद की कालाबाजारी रोकने के लिए विभाग ने फार्मर आईडी और आधार कार्ड के जरिए ही खाद बेचने का निर्देश दिया है। लेकिन, यह व्यवस्था किसानों के लिए परेशानी बन गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान ऑनलाइन प्रक्रिया से बच रहे हैं। इसकी दो मुख्य वजहें सामने आ रही हैं। पहली, पुश्तैनी जमीन का दाखिल-खारिज न होना। अधिकांश छोटे और सीमांत किसानों की जमीन अभी भी उनके पूर्वजों के नाम पर दर्ज है। जमाबंदी अपने नाम न होने के कारण उनकी ‘फार्मर आईडी’ नहीं बन पा रही है, जिससे वे खाद नहीं खरीद पा रहे हैं। दूसरी वजह, ओटीपी से साइबर ठगी का डर है। जिन किसानों ने किसी तरह फार्मर आईडी बनवा भी ली है, वे अब तकनीकी प्रक्रिया से डर रहे हैं। खाद खरीदते समय विक्रेता द्वारा मोबाइल पर भेजे जाने वाले ओटीपी को साझा करने से किसान हिचक रहे हैं। क्षेत्र में लगातार हो रही साइबर ठगी की घटनाओं के कारण किसानों को डर लगता है कि कहीं ओटीपी बताते ही उनके बैंक खाते से पैसे न निकल जाएं। नियमों के इस चक्कर और ऑनलाइन प्रक्रिया की बाध्यता के कारण प्रखंड की खाद दुकानों पर रोज किसानों की भीड़ लग रही है। खाद विक्रेता सरकारी निर्देशों का हवाला देते हुए बिना ऑनलाइन एंट्री और बिना आधार आईडी के खाद देने से मना कर रहे हैं। वहीं, किसान पारंपरिक तरीके से खाद की मांग कर रहे हैं। बदलते नियमों और प्रावधानों के बीच फिलहाल प्रखंड में असमंजस और परेशानी बनी हुई है। इससे समय पर फसलों को खाद न मिल पाने का संकट बढ़ रहा है।  

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