लखनऊ में बेगम अख्तर की मजार पर 13वीं हाजिरी हुई:डॉ. संगीता नेरुरकर ने गजलें गाकर दी श्रद्धांजलि, संगीत के सफर को याद किया

लखनऊ में बेगम अख्तर की मजार पर 13वीं हाजिरी हुई:डॉ. संगीता नेरुरकर ने गजलें गाकर दी श्रद्धांजलि, संगीत के सफर को याद किया

लखनऊ के ठाकुरगंज के पसंद बाग स्थित बेगम अख्तर की मजार पर शुक्रवार को 13वीं हाज़िरी का आयोजन किया गया। हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका डॉ. संगीता नेरुरकर ने अपनी गायकी से बेगम अख्तर को सुरों भरी श्रद्धांजलि दी। इस दौरान ग़ज़लों के जरिए अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी से मलिका-ए-ग़ज़ल बनने तक के उनके संगीत के सफर को याद किया गया। कलाकारों की प्रस्तुति ने यादगार बनाया प्रस्तुति से पहले डॉ. संगीता नेरुरकर ने बेगम अख्तर की मजार पर पहुंचकर श्रद्धांजलि दी और ‘सावन घर आ जा’ गाकर अपनी हाज़िरी पेश की। इसके बाद उन्होंने ‘इतना तो जिंदगी में किसी की खलल पड़े’ समेत कई मशहूर ग़ज़लें सुनाईं। उनकी आवाज में बेगम अख्तर की गायकी का अंदाज और शायरी का दर्द महसूस हुआ। उनके साथ तबले पर पंडित विनोद लेले, हारमोनियम पर पंडित धर्मनाथ मिश्र और सारंगी पर विनायक सहाय ने संगत की। तीनों कलाकारों के सुर और ताल ने प्रस्तुति को यादगार बना दिया। ‘बेगम अख्तर ने दिल से गाना सिखाया’ डॉ. संगीता नेरुरकर ने कहा कि मजार पर हाज़िरी में गाना उनके लिए बेहद भावुक अनुभव है। वह खुद को सौभाग्यशाली मानती हैं कि उन्हें इस मौके पर बेगम अख्तर को सुरों के जरिए याद करने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि बेगम अख्तर ने दिल से और खुलकर गाना सिखाया। शास्त्रीय संगीत की गहरी तालीम के कारण वह शायरी को अलग-अलग तालों में खूबसूरती से पिरोती थीं। रागों के सुर और शेरों का मेल ही ग़ज़ल का असली रंग सामने लाता है। यही खास अंदाज उन्हें अपने दौर के दूसरे कलाकारों से अलग पहचान देता था। 2014 से जारी है हाज़िरी की परंपरा बेगम अख्तर की मजार पर हाज़िरी देने की परंपरा 2014 में शुरू हुई थी। इस साल इसका 13वां आयोजन किया गया। अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी के नाम से संगीत की दुनिया में कदम रखने वाली बेगम अख्तर ने करीब 400 ग़ज़लों को अपनी आवाज दी। ग़ालिब, जिगर मुरादाबादी और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ जैसे शायरों के कलाम को उन्होंने अपनी गायकी से अमर कर दिया।

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