इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड और पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के प्रबंधन, बोर्ड नियुक्तियों तथा चेयरमैन के पद को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को सारहीन पाते हुए खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिका केवल अकादमिक कवायद जैसी प्रतीत होती है और इसमें कोई ठोस जनहित शामिल नहीं है। यह आदेश मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली एवं न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने अधिवक्ता विजय प्रताप सिंह द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। जानिये क्या है मामला याची ने कोर्ट से मांग की थी कि पावर कॉर्पोरेशन और पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के प्रबंधन में व्यावसायिक दृष्टिकोण अपनाया जाए तथा कंपनी के बोर्ड में केवल तकनीकी योग्यता वाले व्यक्तियों को ही नियुक्त किया जाए। कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 104 और आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के अनुच्छेद 42 का हवाला देते हुए यूपीपीसीएल में चेयरमैन का पद समाप्त किया जाए। साथ ही 30 सितंबर 2024 की वार्षिक आम बैठक में आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में किए गए संशोधनों अनुच्छेद 32(i)(बी) व (सी) को अवैध घोषित किया जाए। पावर कॉर्पोरेशन के चेयरमैन की नियुक्ति अवैध कहा यूपी पावर कॉर्पोरेशन के चेयरमैन आशीष गोयल की नियुक्ति को अवैध करार देते हुए क्वो वारंटो रिट जारी की जाए तथा स्वतंत्र निदेशक और कंपनी सेक्रेटरी तत्काल नियुक्त करने का निर्देश दिया जाए। याची का दावा था कि इस याचिका के सफल होने पर गरीब उपभोक्ताओं को उचित दरों पर बिजली उपलब्ध हो सकेगी। कोर्ट ने याचिका का अवलोकन करने के बाद कहा कि याचिका में केवल सामान्य उल्लेख किए गए हैं लेकिन इस बात का कोई ठोस आधार या विवरण नहीं दिया गया है कि मांगी गई राहतों से गरीब उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली कैसे मिलेगी। चेयरमैन की नियुक्ति को चुनौती दी गई थी लेकिन याचिका में उनकी नियुक्ति का आदेश तक संलग्न नहीं किया गया, जो इस तरह की मांग के लिए बुनियादी आवश्यकता है। यह पूरी कवायद केवल अकादमिक प्रतीत होती है और इसका वास्तविक जनहित से कोई सरोकार नहीं है। कोर्ट ने याचिका को बेहद सतही और आधारहीन मानते हुए बिना किसी हस्तक्षेप के खारिज कर दिया।

