मुजफ्फरपुर में जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) रहते हुए अजय कुमार सिंह के कार्यकाल में हुई कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला एक बार फिर चर्चा में है। बिहार ओपन स्कूलिंग एंड एग्जामिनेशन बोर्ड के डिप्टी डायरेक्टर अजय कुमार सिंह के कई ठिकानों पर आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की छापेमारी के बाद उनकी संपत्ति और मुजफ्फरपुर में उनके कार्यकाल के दौरान हुए कामों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। EOU ने अजय कुमार सिंह के खिलाफ 3 करोड़ 43 लाख 78 हजार 300 रुपए की आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया है। इसी कार्रवाई के बाद विधान पार्षद वंशीधर बृजवासी ने उनके मुजफ्फरपुर कार्यकाल को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि, उनके द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। बृजवासी का कहना है कि उन्होंने इन मामलों को पहले भी विधान परिषद में उठाया था। ‘कार्रवाई बहुत देर से हुई’ EOU की कार्रवाई पर बृजवासी ने कहा कि यह कार्रवाई काफी देर से हुई है। उनका दावा है कि देरी के कारण अजय कुमार सिंह की कथित वास्तविक संपत्ति और काली कमाई का बहुत छोटा हिस्सा ही जांच एजेंसी के सामने आया है। जो संपत्ति अब सामने आई है, वह उनके अनुसार अर्जित की गई कुल संपत्ति का 5% भी नहीं है। ₹119 करोड़ की योजनाओं का दावा बृजवासी के अनुसार, अजय कुमार सिंह के DEO कार्यकाल में मुजफ्फरपुर में करीब 119 करोड़ रुपए की योजनाएं संचालित हुईं। उनका आरोप है कि इनमें कई काम जमीन पर पूरी तरह नहीं हुए, जबकि भुगतान कागजों पर कर दिया गया। उन्होंने कहा कि बाद के कार्यकाल को जोड़ दें तो शिक्षा विभाग की योजनाओं में करीब 200 करोड़ रुपए तक का खर्च हुआ। उनका सवाल है कि जिले में करीब 3300 स्कूल होने के बावजूद अगर सभी स्कूलों में समान रूप से काम नहीं हुआ, तो जिन स्कूलों में योजनाएं चलीं, वहां बड़ी रकम कैसे खर्च हुई। पैतृक गांव में अजय कुमार सिंह के घर की तस्वीरें… ‘35% कमीशन का था खेल’ बृजवासी ने आरोप लगाया कि इन योजनाओं में 35% तक कमीशन लिए जाने की बात उस समय खुले तौर पर चर्चा में थी। उनका दावा है कि 119 करोड़ रुपए की योजनाओं में अगर 35% कमीशन की बात को आधार बनाया जाए तो रकम करीब 40 करोड़ रुपए से अधिक बैठती है।
‘कागज पर बना काम, जमीन पर कुछ नहीं’ बृजवासी ने आरोप लगाया कि कई स्कूलों में समर्सिबल और पानी की टंकी लगाने के नाम पर भुगतान हुआ, लेकिन मौके पर या तो काम अधूरा था या सामान खराब पड़ा था। उनका कहना है कि उन्होंने खुद कई स्कूलों में जाकर इन कामों की स्थिति देखी थी। उन्होंने कहा कि ‘समर्सिबल लगाने का उद्देश्य पानी निकालना नहीं, पैसा निकालना था।’ हालांकि यह उनका आरोप है, जिसकी जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी। एक जैसा एस्टीमेट, अलग-अलग स्कूल बृजवासी ने जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि कई स्कूलों में मरम्मत और निर्माण कार्यों के लिए एक जैसे एस्टीमेट बनाए गए। उनका सवाल है कि हर स्कूल की बिल्डिंग, कमरे और जरूरत अलग होने के बावजूद सभी जगह एक जैसा एस्टीमेट कैसे बनाया गया।
फर्जी हस्ताक्षर से भुगतान का आरोप बृजवासी ने दावा किया कि कुछ स्कूलों के प्रधानाध्यापकों के फर्जी हस्ताक्षर से बिल-वाउचर तैयार कर भुगतान कराया गया। उन्होंने बताया कि कम से कम सात प्रधानाध्यापकों ने लिखित रूप से शिकायत की थी कि उनके हस्ताक्षर का गलत इस्तेमाल हुआ है। उनका कहना है कि ऐसी शिकायतों की जांच केवल कागजों के आधार पर नहीं, बल्कि हर स्कूल में जाकर होनी चाहिए थी। किस स्कूल में कितनी राशि खर्च हुई, कौन-सा काम हुआ और उसका वास्तविक मूल्य क्या है—इसकी स्कूलवार जांच की मांग उन्होंने की। ‘चाय की दुकान पर तैयार होती थी संचिका’ बृजवासी ने एक और गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि शिक्षा भवन के बाहर चाय की दुकान के आसपास ही कई संचिकाएं तैयार की जाती थीं। उनका दावा है कि फर्जी बिल-वाउचर लगाकर फाइल तैयार की जाती थी और फिर भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ती थी। एक संचिका तैयार करने के लिए कथित तौर पर 5-6 हजार रुपये तक लिए जाने की बात सामने आई थी। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ‘119 करोड़ में 35% का हिसाब हो तो…’ बृजवासी ने कहा कि यदि 119 करोड़ रुपए की योजनाओं में उनके बताए 35% कमीशन के आरोप की जांच की जाए तो बड़ी रकम का हिसाब सामने आ सकता है। उन्होंने जांच एजेंसियों से स्कूलवार और योजनावार खर्च का पूरा रिकॉर्ड लेकर मौके पर भौतिक सत्यापन कराने की मांग की है।
जांच रिपोर्ट पर भी उठाए सवाल बृजवासी ने दावा किया कि मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन की ओर से शिक्षा विभाग को भेजी गई जांच रिपोर्ट में भी कई अनियमितताओं का जिक्र है। उनके अनुसार, एक रिपोर्ट 2024 में और दूसरी रिपोर्ट 2026 में भेजी गई थी। ‘शिक्षकों पर बनाया जाता था दबाव’ बृजवासी का आरोप है कि जिन प्रधानाध्यापकों या शिक्षकों ने योजनाओं में गड़बड़ी का विरोध किया, उन पर विभागीय कार्रवाई का दबाव बनाया गया। उन्होंने अपने खिलाफ हुई कार्रवाई को भी इसी विरोध से जोड़ते हुए कहा कि लगातार इन मामलों को उठाया था। दावा है कि कई शिक्षक काम लेने या दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से इनकार करते थे तो उन पर कार्रवाई की जाती थी। अब स्कूलवार जांच की मांग EOU की मौजूदा कार्रवाई के बाद बृजवासी ने मांग की है कि अजय कुमार सिंह के DEO रहने के दौरान मुजफ्फरपुर में हुई सभी योजनाओं की स्कूलवार और योजनावार जांच कराई जाए। कागजों में दर्ज रकम और जमीन पर हुए काम का मिलान किया जाए। उन्होंने कहा कि सिर्फ अजय कुमार सिंह की संपत्ति की जांच से पूरी तस्वीर सामने नहीं आएगी। जिन योजनाओं में बड़ी रकम खर्च हुई, उनके भुगतान, बिल-वाउचर, एस्टीमेट, मापी पुस्तिका और वास्तविक काम की भी जांच होनी चाहिए। फिलहाल EOU की कार्रवाई और जांच जारी है। अजय कुमार सिंह पर लगाए गए वित्तीय अनियमितता और कमीशन से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी। मुजफ्फरपुर में जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) रहते हुए अजय कुमार सिंह के कार्यकाल में हुई कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला एक बार फिर चर्चा में है। बिहार ओपन स्कूलिंग एंड एग्जामिनेशन बोर्ड के डिप्टी डायरेक्टर अजय कुमार सिंह के कई ठिकानों पर आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की छापेमारी के बाद उनकी संपत्ति और मुजफ्फरपुर में उनके कार्यकाल के दौरान हुए कामों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। EOU ने अजय कुमार सिंह के खिलाफ 3 करोड़ 43 लाख 78 हजार 300 रुपए की आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया है। इसी कार्रवाई के बाद विधान पार्षद वंशीधर बृजवासी ने उनके मुजफ्फरपुर कार्यकाल को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि, उनके द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। बृजवासी का कहना है कि उन्होंने इन मामलों को पहले भी विधान परिषद में उठाया था। ‘कार्रवाई बहुत देर से हुई’ EOU की कार्रवाई पर बृजवासी ने कहा कि यह कार्रवाई काफी देर से हुई है। उनका दावा है कि देरी के कारण अजय कुमार सिंह की कथित वास्तविक संपत्ति और काली कमाई का बहुत छोटा हिस्सा ही जांच एजेंसी के सामने आया है। जो संपत्ति अब सामने आई है, वह उनके अनुसार अर्जित की गई कुल संपत्ति का 5% भी नहीं है। ₹119 करोड़ की योजनाओं का दावा बृजवासी के अनुसार, अजय कुमार सिंह के DEO कार्यकाल में मुजफ्फरपुर में करीब 119 करोड़ रुपए की योजनाएं संचालित हुईं। उनका आरोप है कि इनमें कई काम जमीन पर पूरी तरह नहीं हुए, जबकि भुगतान कागजों पर कर दिया गया। उन्होंने कहा कि बाद के कार्यकाल को जोड़ दें तो शिक्षा विभाग की योजनाओं में करीब 200 करोड़ रुपए तक का खर्च हुआ। उनका सवाल है कि जिले में करीब 3300 स्कूल होने के बावजूद अगर सभी स्कूलों में समान रूप से काम नहीं हुआ, तो जिन स्कूलों में योजनाएं चलीं, वहां बड़ी रकम कैसे खर्च हुई। पैतृक गांव में अजय कुमार सिंह के घर की तस्वीरें… ‘35% कमीशन का था खेल’ बृजवासी ने आरोप लगाया कि इन योजनाओं में 35% तक कमीशन लिए जाने की बात उस समय खुले तौर पर चर्चा में थी। उनका दावा है कि 119 करोड़ रुपए की योजनाओं में अगर 35% कमीशन की बात को आधार बनाया जाए तो रकम करीब 40 करोड़ रुपए से अधिक बैठती है।
‘कागज पर बना काम, जमीन पर कुछ नहीं’ बृजवासी ने आरोप लगाया कि कई स्कूलों में समर्सिबल और पानी की टंकी लगाने के नाम पर भुगतान हुआ, लेकिन मौके पर या तो काम अधूरा था या सामान खराब पड़ा था। उनका कहना है कि उन्होंने खुद कई स्कूलों में जाकर इन कामों की स्थिति देखी थी। उन्होंने कहा कि ‘समर्सिबल लगाने का उद्देश्य पानी निकालना नहीं, पैसा निकालना था।’ हालांकि यह उनका आरोप है, जिसकी जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी। एक जैसा एस्टीमेट, अलग-अलग स्कूल बृजवासी ने जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि कई स्कूलों में मरम्मत और निर्माण कार्यों के लिए एक जैसे एस्टीमेट बनाए गए। उनका सवाल है कि हर स्कूल की बिल्डिंग, कमरे और जरूरत अलग होने के बावजूद सभी जगह एक जैसा एस्टीमेट कैसे बनाया गया।
फर्जी हस्ताक्षर से भुगतान का आरोप बृजवासी ने दावा किया कि कुछ स्कूलों के प्रधानाध्यापकों के फर्जी हस्ताक्षर से बिल-वाउचर तैयार कर भुगतान कराया गया। उन्होंने बताया कि कम से कम सात प्रधानाध्यापकों ने लिखित रूप से शिकायत की थी कि उनके हस्ताक्षर का गलत इस्तेमाल हुआ है। उनका कहना है कि ऐसी शिकायतों की जांच केवल कागजों के आधार पर नहीं, बल्कि हर स्कूल में जाकर होनी चाहिए थी। किस स्कूल में कितनी राशि खर्च हुई, कौन-सा काम हुआ और उसका वास्तविक मूल्य क्या है—इसकी स्कूलवार जांच की मांग उन्होंने की। ‘चाय की दुकान पर तैयार होती थी संचिका’ बृजवासी ने एक और गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि शिक्षा भवन के बाहर चाय की दुकान के आसपास ही कई संचिकाएं तैयार की जाती थीं। उनका दावा है कि फर्जी बिल-वाउचर लगाकर फाइल तैयार की जाती थी और फिर भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ती थी। एक संचिका तैयार करने के लिए कथित तौर पर 5-6 हजार रुपये तक लिए जाने की बात सामने आई थी। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ‘119 करोड़ में 35% का हिसाब हो तो…’ बृजवासी ने कहा कि यदि 119 करोड़ रुपए की योजनाओं में उनके बताए 35% कमीशन के आरोप की जांच की जाए तो बड़ी रकम का हिसाब सामने आ सकता है। उन्होंने जांच एजेंसियों से स्कूलवार और योजनावार खर्च का पूरा रिकॉर्ड लेकर मौके पर भौतिक सत्यापन कराने की मांग की है।
जांच रिपोर्ट पर भी उठाए सवाल बृजवासी ने दावा किया कि मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन की ओर से शिक्षा विभाग को भेजी गई जांच रिपोर्ट में भी कई अनियमितताओं का जिक्र है। उनके अनुसार, एक रिपोर्ट 2024 में और दूसरी रिपोर्ट 2026 में भेजी गई थी। ‘शिक्षकों पर बनाया जाता था दबाव’ बृजवासी का आरोप है कि जिन प्रधानाध्यापकों या शिक्षकों ने योजनाओं में गड़बड़ी का विरोध किया, उन पर विभागीय कार्रवाई का दबाव बनाया गया। उन्होंने अपने खिलाफ हुई कार्रवाई को भी इसी विरोध से जोड़ते हुए कहा कि लगातार इन मामलों को उठाया था। दावा है कि कई शिक्षक काम लेने या दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से इनकार करते थे तो उन पर कार्रवाई की जाती थी। अब स्कूलवार जांच की मांग EOU की मौजूदा कार्रवाई के बाद बृजवासी ने मांग की है कि अजय कुमार सिंह के DEO रहने के दौरान मुजफ्फरपुर में हुई सभी योजनाओं की स्कूलवार और योजनावार जांच कराई जाए। कागजों में दर्ज रकम और जमीन पर हुए काम का मिलान किया जाए। उन्होंने कहा कि सिर्फ अजय कुमार सिंह की संपत्ति की जांच से पूरी तस्वीर सामने नहीं आएगी। जिन योजनाओं में बड़ी रकम खर्च हुई, उनके भुगतान, बिल-वाउचर, एस्टीमेट, मापी पुस्तिका और वास्तविक काम की भी जांच होनी चाहिए। फिलहाल EOU की कार्रवाई और जांच जारी है। अजय कुमार सिंह पर लगाए गए वित्तीय अनियमितता और कमीशन से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।

