मुजफ्फरपुर में 10 हजार से ज्यादा ट्रैफिक चालानों का निपटारा:अदालत में छूट के लिए हजारों लोग लाइन में; 1000 के चालान पर 500 की राहत

मुजफ्फरपुर में 10 हजार से ज्यादा ट्रैफिक चालानों का निपटारा:अदालत में छूट के लिए हजारों लोग लाइन में; 1000 के चालान पर 500 की राहत

राष्ट्रीय लोक अदालत में शनिवार को सबसे ज्यादा भीड़ ट्रैफिक चालान के निपटारे के लिए सिकंदरपुर स्टेडियम में दिखी। चालान में छूट मिलने की उम्मीद लेकर सुबह से ही हजारों लोग पहुंचते रहे। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ने पिछली बार की भीड़ को देखते हुए इस बार 5 से 11 सितंबर तक प्री-वेरिफिकेशन की व्यवस्था की थी। इसके बावजूद शनिवार को स्टेडियम में लंबी कतारें लगी रहीं। कई लोगों के लिए चालान की राशि में मिली छूट से ज्यादा आने-जाने का खर्च, दिनभर का इंतजार और दिहाड़ी का नुकसान भारी पड़ गया। लोगों के मुताबिक, पहले प्री-वेरिफिकेशन के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा और शनिवार को चालान जमा करने के लिए फिर लाइन में लगना पड़ा। कई लोग चार-चार घंटे तक कतार में खड़े रहे। स्टेडियम में 12 बेंचों के जरिए चालानों का निपटारा किया गया। शाम करीब 5 बजे तक 10 हजार से अधिक मामलों के निष्पादन की बात सामने आई। ‘1000 के चालान पर 500 की छूट, लेकिन खर्च हो गए 1500’ SKMCH के पास रहने वाले प्रभात कुमार ने बताया कि उनका एक हजार रुपए का चालान था। इसके निपटारे के लिए उन्होंने शुक्रवार को टोकन लिया था, जिसमें करीब तीन घंटे लग गए। शनिवार को फिर सुबह से लाइन में लगे रहे। प्रभात ने कहा कि चालान में 500 रुपए की छूट मिली, लेकिन दो दिन आने-जाने में पेट्रोल का खर्च, सुबह से लाइन में रहने के दौरान चाय-खाने का खर्च और एक दिन की दिहाड़ी मिलाकर उन्हें करीब 1500 रुपए का अतिरिक्त नुकसान हो गया। उन्होंने कहा, “500 रुपए की छूट के लिए दो दिन लग गए। आने-जाने और दिहाड़ी का हिसाब लगाएं तो चालान से ज्यादा खर्च हो गया।” नौ चालान थे, ज्यादातर बिना हेलमेट के मझौलिया की प्रियंका अपने नौ चालानों का निपटारा कराने पहुंचीं। उन्होंने बताया कि उनके ज्यादातर चालान बिना हेलमेट के थे। उनका कहना था कि कई बार उनकी गाड़ी दूसरे लोग लेकर गए और उसी दौरान चालान कट गया। प्रियंका ने कहा कि इस अनुभव से उन्हें एक सीख मिली है कि अब वह अपनी गाड़ी किसी को देने से पहले ज्यादा सावधानी बरतेंगी। उनके मुताबिक, वाहन मालिक के नाम चालान आने के बाद उसका निपटारा कराने की जिम्मेदारी भी उसी पर आ जाती है। ‘चालान जमा करना महंगा पड़ गया’ उदय प्रताप सिंह ने कहा कि चालान माफी की उम्मीद में आए, लेकिन पूरा दिन लाइन में चला गया। उन्होंने बताया कि करीब चार घंटे से कतार में लगे हैं और आने-जाने समेत 1500 से 2000 रुपए तक का खर्च हो गया। उदय ने कहा कि सरकार की ओर से चालान निपटाने और छूट देने की व्यवस्था अच्छी है, लेकिन लोगों की सुविधा के लिए प्रक्रिया को और आसान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “चालान जमा करना महंगा पड़ गया। आगे कोशिश रहेगी कि चालान कटे ही नहीं और अगर कटता है तो समय पर जमा कर देंगे।” 30 हजार का चालान, 15 हजार में निपटाने पूरा परिवार पहुंचा मीनापुर के धर्मपुर निवासी मोहम्मद महबूब ऑटो चलाते हैं। उनके ऑटो पर करीब 30 हजार रुपए का चालान था। उन्होंने बताया कि इसमें ज्यादातर चालान इंश्योरेंस फेल होने से जुड़े थे। लोक अदालत में छूट के बाद वह इसे करीब 15 हजार रुपए में जमा कर रहे हैं। महबूब ने बताया कि ऑटो से ही परिवार का खर्च चलता है। चालान लंबित रहने पर परेशानी बढ़ रही थी, इसलिए शनिवार को पूरा परिवार सिकंदरपुर स्टेडियम पहुंचा। वह छोटे बच्चे को गोद में लेकर खड़े थे, जबकि उनकी पत्नी लाइन में लगी थीं। ‘चौक पर घर है, रोज-रोज चालान कट गया’ बनारस बैंक चौक के जयप्रकाश शर्मा ने चालान काटने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया। उनका करीब चार हजार रुपए का चालान था, जिसे लोक अदालत में दो हजार रुपए में निपटाने पहुंचे। जयप्रकाश ने कहा कि उनके घर के पास ही चौक है और वाहन से घर से निकलते समय कई बार चालान कट गया। उनका आरोप है कि डबल हेलमेट के चालान की शुरुआत से पहले लोगों को पर्याप्त जागरूक किया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि नियम लागू करने से पहले लोगों को इसकी जानकारी देने और जागरूक करने की जरूरत थी। उनका कहना था कि चालान में छूट की व्यवस्था ठीक है, लेकिन लोगों के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि उन्हें घंटों कतार में खड़ा न रहना पड़े। छूट मिली, लेकिन ‘समय और खर्च’ की कीमत भी चुकानी पड़ी सिकंदरपुर स्टेडियम में पहुंचे लोगों की परेशानी की तस्वीर अलग-अलग थी, लेकिन शिकायत लगभग एक जैसी रही—चालान में राहत मिली, पर उसे हासिल करने में समय और पैसा दोनों खर्च हुए। किसी ने दिहाड़ी गंवाई, किसी का पेट्रोल और खाने-पीने में खर्च बढ़ा तो कोई दोबारा लाइन में लगने से परेशान रहा। हालांकि कई वाहन मालिकों ने यह भी माना कि लंबित चालान निपटाने और राशि में छूट देने से उन्हें राहत मिली है। लोगों की मुख्य मांग रही कि भविष्य में ऐसी व्यवस्था हो जिसमें प्री-वेरिफिकेशन और भुगतान की प्रक्रिया और ज्यादा सुगम हो तथा लोगों को घंटों लाइन में खड़ा न रहना पड़े। राष्ट्रीय लोक अदालत में शनिवार को सबसे ज्यादा भीड़ ट्रैफिक चालान के निपटारे के लिए सिकंदरपुर स्टेडियम में दिखी। चालान में छूट मिलने की उम्मीद लेकर सुबह से ही हजारों लोग पहुंचते रहे। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ने पिछली बार की भीड़ को देखते हुए इस बार 5 से 11 सितंबर तक प्री-वेरिफिकेशन की व्यवस्था की थी। इसके बावजूद शनिवार को स्टेडियम में लंबी कतारें लगी रहीं। कई लोगों के लिए चालान की राशि में मिली छूट से ज्यादा आने-जाने का खर्च, दिनभर का इंतजार और दिहाड़ी का नुकसान भारी पड़ गया। लोगों के मुताबिक, पहले प्री-वेरिफिकेशन के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा और शनिवार को चालान जमा करने के लिए फिर लाइन में लगना पड़ा। कई लोग चार-चार घंटे तक कतार में खड़े रहे। स्टेडियम में 12 बेंचों के जरिए चालानों का निपटारा किया गया। शाम करीब 5 बजे तक 10 हजार से अधिक मामलों के निष्पादन की बात सामने आई। ‘1000 के चालान पर 500 की छूट, लेकिन खर्च हो गए 1500’ SKMCH के पास रहने वाले प्रभात कुमार ने बताया कि उनका एक हजार रुपए का चालान था। इसके निपटारे के लिए उन्होंने शुक्रवार को टोकन लिया था, जिसमें करीब तीन घंटे लग गए। शनिवार को फिर सुबह से लाइन में लगे रहे। प्रभात ने कहा कि चालान में 500 रुपए की छूट मिली, लेकिन दो दिन आने-जाने में पेट्रोल का खर्च, सुबह से लाइन में रहने के दौरान चाय-खाने का खर्च और एक दिन की दिहाड़ी मिलाकर उन्हें करीब 1500 रुपए का अतिरिक्त नुकसान हो गया। उन्होंने कहा, “500 रुपए की छूट के लिए दो दिन लग गए। आने-जाने और दिहाड़ी का हिसाब लगाएं तो चालान से ज्यादा खर्च हो गया।” नौ चालान थे, ज्यादातर बिना हेलमेट के मझौलिया की प्रियंका अपने नौ चालानों का निपटारा कराने पहुंचीं। उन्होंने बताया कि उनके ज्यादातर चालान बिना हेलमेट के थे। उनका कहना था कि कई बार उनकी गाड़ी दूसरे लोग लेकर गए और उसी दौरान चालान कट गया। प्रियंका ने कहा कि इस अनुभव से उन्हें एक सीख मिली है कि अब वह अपनी गाड़ी किसी को देने से पहले ज्यादा सावधानी बरतेंगी। उनके मुताबिक, वाहन मालिक के नाम चालान आने के बाद उसका निपटारा कराने की जिम्मेदारी भी उसी पर आ जाती है। ‘चालान जमा करना महंगा पड़ गया’ उदय प्रताप सिंह ने कहा कि चालान माफी की उम्मीद में आए, लेकिन पूरा दिन लाइन में चला गया। उन्होंने बताया कि करीब चार घंटे से कतार में लगे हैं और आने-जाने समेत 1500 से 2000 रुपए तक का खर्च हो गया। उदय ने कहा कि सरकार की ओर से चालान निपटाने और छूट देने की व्यवस्था अच्छी है, लेकिन लोगों की सुविधा के लिए प्रक्रिया को और आसान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “चालान जमा करना महंगा पड़ गया। आगे कोशिश रहेगी कि चालान कटे ही नहीं और अगर कटता है तो समय पर जमा कर देंगे।” 30 हजार का चालान, 15 हजार में निपटाने पूरा परिवार पहुंचा मीनापुर के धर्मपुर निवासी मोहम्मद महबूब ऑटो चलाते हैं। उनके ऑटो पर करीब 30 हजार रुपए का चालान था। उन्होंने बताया कि इसमें ज्यादातर चालान इंश्योरेंस फेल होने से जुड़े थे। लोक अदालत में छूट के बाद वह इसे करीब 15 हजार रुपए में जमा कर रहे हैं। महबूब ने बताया कि ऑटो से ही परिवार का खर्च चलता है। चालान लंबित रहने पर परेशानी बढ़ रही थी, इसलिए शनिवार को पूरा परिवार सिकंदरपुर स्टेडियम पहुंचा। वह छोटे बच्चे को गोद में लेकर खड़े थे, जबकि उनकी पत्नी लाइन में लगी थीं। ‘चौक पर घर है, रोज-रोज चालान कट गया’ बनारस बैंक चौक के जयप्रकाश शर्मा ने चालान काटने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया। उनका करीब चार हजार रुपए का चालान था, जिसे लोक अदालत में दो हजार रुपए में निपटाने पहुंचे। जयप्रकाश ने कहा कि उनके घर के पास ही चौक है और वाहन से घर से निकलते समय कई बार चालान कट गया। उनका आरोप है कि डबल हेलमेट के चालान की शुरुआत से पहले लोगों को पर्याप्त जागरूक किया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि नियम लागू करने से पहले लोगों को इसकी जानकारी देने और जागरूक करने की जरूरत थी। उनका कहना था कि चालान में छूट की व्यवस्था ठीक है, लेकिन लोगों के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि उन्हें घंटों कतार में खड़ा न रहना पड़े। छूट मिली, लेकिन ‘समय और खर्च’ की कीमत भी चुकानी पड़ी सिकंदरपुर स्टेडियम में पहुंचे लोगों की परेशानी की तस्वीर अलग-अलग थी, लेकिन शिकायत लगभग एक जैसी रही—चालान में राहत मिली, पर उसे हासिल करने में समय और पैसा दोनों खर्च हुए। किसी ने दिहाड़ी गंवाई, किसी का पेट्रोल और खाने-पीने में खर्च बढ़ा तो कोई दोबारा लाइन में लगने से परेशान रहा। हालांकि कई वाहन मालिकों ने यह भी माना कि लंबित चालान निपटाने और राशि में छूट देने से उन्हें राहत मिली है। लोगों की मुख्य मांग रही कि भविष्य में ऐसी व्यवस्था हो जिसमें प्री-वेरिफिकेशन और भुगतान की प्रक्रिया और ज्यादा सुगम हो तथा लोगों को घंटों लाइन में खड़ा न रहना पड़े।  

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