मध्यकालीन भारत के सिक्के सिर्फ लेन-देन का माध्यम नहीं थे, बल्कि उस दौर की सत्ता, संस्कृति, भाषा और अर्थव्यवस्था के दस्तावेज भी हैं। सिक्कों पर दर्ज शासकों के नाम, उपाधियां और अभिलेख तत्कालीन इतिहास की कई अहम जानकारियां देते हैं। शुक्रवार को उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्त्व निदेशालय की कार्यशाला में विशेषज्ञ ने इन पहलुओं को उदाहरणों के साथ समझाया। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्त्व निदेशालय की ओर से 29 से 31 अक्टूबर तक आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला ‘भारतीय मुद्राशास्त्र : परंपरा, विकास एवं परिवर्तन’ के दूसरे दिन मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के प्रो. दानिश मोइन ने व्याख्यान दिया। उन्होंने ‘मध्यकालीन भारतीय मुद्रा : निरंतरता और बदलाव’ विषय पर सचित्र प्रस्तुति दी। भाषा और लिपि में आए बदलावों को समझाया प्रो. मोइन ने बताया कि मध्यकालीन सिक्कों का अध्ययन उनके चित्रांकन और अभिलेखों के आधार पर किया जा सकता है। कुछ सिक्कों पर चित्र और लेख दोनों मिलते हैं, जबकि कुछ पर केवल अभिलेख अंकित होते हैं। उन्होंने महमूद गजनवी, अलाउद्दीन खिलजी और गयासुद्दीन तुगलक के शासनकाल के द्विभाषी सिक्कों के उदाहरण पेश किए। इनके माध्यम से सिक्कों की धातु, भार, आकार, भाषा और लिपि में आए बदलावों को समझाया। इल्तुतमिश के मुद्रा सुधारों पर विशेष चर्चा व्याख्यान में दिल्ली सल्तनत की मुद्रा व्यवस्था का भी जिक्र हुआ। प्रो. मोइन ने बताया कि ममलूक शासक इल्तुतमिश ने मुद्रा व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए चांदी का टंका और तांबे का जीतल प्रचलित किया था। इन मुद्राओं ने सल्तनत की आर्थिक व्यवस्था को संगठित स्वरूप दिया। आगे के शासकों की मुद्रा परंपरा पर भी इसका प्रभाव पड़ा। उन्होंने सिक्कों पर अंकित अरबी और फारसी अभिलेखों, धार्मिक उद्घोषों, शासकीय उपाधियों और लेखन शैली की विशेषताओं को भी समझाया। कहा कि सिक्कों पर दर्ज नाम, उपाधियां और तिथियां तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के प्रमाण हैं। 150 से अधिक प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा कार्यक्रम की शुरुआत में निदेशक रेनू द्विवेदी ने कहा कि इस तरह के अकादमिक आयोजन विद्यार्थियों, शोधार्थियों और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी हैं। इससे इतिहास के अध्ययन और अनुसंधान को नई दिशा मिलती है।

