भागलपुर में शारदीय नवरात्र के दौरान भक्ति का माहौल है। नाथनगर प्रखंड के घोसी टोला स्थित सुजापुर दुर्गा मंदिर में करीब 150 साल पुरानी परंपरा निभाई जा रही है। यहां मां दुर्गा की पूजा बंगाली रीति-रिवाज और पारंपरिक विधि-विधान से होती है। सप्तमी पूजा के अवसर पर मंदिर के पट खुलते ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। भक्त मां के दर्शन और आशीर्वाद पाने के लिए पहुंचे। मंदिर परिसर मां के जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। यह मंदिर सिर्फ पूजा का केंद्र नहीं, बल्कि डेढ़ शताब्दी से चली आ रही धार्मिक परंपरा और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक भी है। यहां सांस्कृतिक विरासत आज भी जीवंत है। सप्तमी पर कौड़ी लुटाने की अनूठी परंपरा सुजापुर दुर्गा मंदिर में सप्तमी के दिन कौड़ी लुटाने की विशेष परंपरा निभाई गई। इस दौरान श्रद्धालुओं में खास उत्साह देखने को मिला। भक्तों के बीच कौड़ी पाने को लेकर उमंग और उल्लास का माहौल रहा। स्थानीय मान्यता के अनुसार, कौड़ी को धन-समृद्धि, सौभाग्य और शुभता का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि मां के दरबार में कौड़ी प्राप्त करने को श्रद्धालु विशेष आशीर्वाद के रूप में देखते हैं। भक्तों के लिए यह केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि मां दुर्गा के प्रति उनकी अटूट आस्था और विश्वास से जुड़ी परंपरा है। इसके साथ ही मंदिर में डलिया लुटाने की परंपरा भी निभाई गई। इन पारंपरिक आयोजनों के दौरान श्रद्धालुओं की भागीदारी ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया।
कौड़ी और डलिया लुटाने की परंपरा सुजापुर की धार्मिक पहचान का अहम हिस्सा है। वर्षों से चली आ रही इन परंपराओं को आज भी पूरे श्रद्धाभाव से निभाया जाना इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक समय में भी लोक आस्था की जड़ें कितनी गहरी हैं। सुजापुर दुर्गा स्थान का इतिहास करीब डेढ़ सौ वर्ष पुराना बताया जाता है। यहां बंगाली रीति-रिवाज के अनुसार मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा समिति के अध्यक्ष ने बताया कि मंदिर में वर्षों से चली आ रही परंपराओं का निर्वहन पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यहां के मेढ़पति राजेश मोहन घोष और उनकी पत्नी पूनम घोष के साथ समाज के लोगों के सहयोग से पूजा का भव्य आयोजन किया जाता है। इस आयोजन में स्थानीय लोगों की भागीदारी मंदिर की परंपरा को और मजबूत बनाती है। मां दुर्गा की आराधना के दौरान बंगाली विधि-विधान, पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान और विशेष रस्मों का पालन किया जाता है। इन परंपराओं के कारण सुजापुर का दुर्गा मंदिर नाथनगर ही नहीं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यहां की पूजा में धार्मिक आस्था के साथ बंगाली संस्कृति की झलक भी दिखाई देती है। यही वजह है कि हर साल नवरात्र के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता है। मेढ़पति राजेश मोहन घोष ने बताया मां के आगमन और विसर्जन का विधान मंदिर के मेढ़पति राजेश मोहन घोष ने बताया कि उनके यहां सदियों पुरानी बंगाली परंपरा के अनुसार पारंपरिक तरीके से पूजा-पाठ होता आ रहा है। मां भगवती की आराधना से लेकर प्रतिमा स्थापना और विसर्जन तक प्रत्येक धार्मिक विधान का पालन पूरी श्रद्धा के साथ किया जाता है। उन्होंने बताया कि यहां मां भगवती के स्वरूप और उनके आगमन से जुड़ी पारंपरिक मान्यताएं भी विशेष महत्व रखती हैं। स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार, मां भगवती शाखा धारण कर, दर्शन देकर और अपने दसों हाथों के दिव्य स्वरूप के साथ गंगा से आने की मान्यता से जुड़ी हैं। इसी मान्यता और परंपरा के अनुरूप मां की स्थापना की जाती है। राजेश मोहन घोष ने कहा कि पूजा के दौरान बंगाली रीति-रिवाजों और नियम-धर्म का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसमें पूजा समिति के पदाधिकारियों, स्थानीय लोगों और पूरे समाज का सहयोग मिलता है। सामूहिक सहभागिता से यह धार्मिक आयोजन श्रद्धा, सद्भाव और उल्लास के साथ संपन्न होता है। उन्होंने यह भी बताया कि मां की प्रतिमा का विसर्जन चंपा नदी में किया जाता है। विसर्जन की यह परंपरा भी मंदिर की धार्मिक पहचान से जुड़ी हुई है। कंधे पर मां की विदाई, 21 तारीख को निकलेगी विसर्जन यात्रा सुजापुर दुर्गा मंदिर में मां की आराधना के साथ विसर्जन की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। पूजा समिति के अनुसार, 21 तारीख को बंगाली परंपरा के अनुसार मां दुर्गा की प्रतिमा का कंधे पर विसर्जन किया जाएगा।
परंपरागत तरीके से मां को विदाई देने का यह आयोजन श्रद्धालुओं के लिए भावुक और विशेष महत्व रखने वाला होता है। मां के आगमन पर जहां भक्तों के चेहरे खिल उठते हैं, वहीं विसर्जन के समय भक्तिभाव के साथ विदाई देने की परंपरा निभाई जाती है। इसके अलावा, 22 तारीख को घोसी टोला के पास विसर्जन शिविर लगाया जाएगा। यहां रोशनी और ध्वनि व्यवस्था की तैयारी की जाएगी। आयोजन के दौरान जिलाधिकारी सहित प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी भी प्रस्तावित बताई गई है, ताकि विसर्जन से संबंधित व्यवस्थाएं सुचारु रूप से संचालित हो सकें। पूजा समिति और स्थानीय समाज की ओर से आयोजन को शांतिपूर्ण तथा व्यवस्थित तरीके से संपन्न कराने की तैयारी की जा रही है। प्रशासन और समाज का सहयोग, सद्भाव की मिसाल बना आयोजन सुजापुर के ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर में पूजा का आयोजन धार्मिक परंपरा के साथ सामाजिक एकजुटता का भी उदाहरण प्रस्तुत करता है। पूजा समिति के पदाधिकारी, मेढ़पति परिवार और स्थानीय लोग मिलकर आयोजन को भव्य बनाने में योगदान देते हैं। प्रशासन की ओर से मिलने वाला सहयोग भी आयोजन की व्यवस्थाओं को सुचारु बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। श्रद्धालुओं की भागीदारी और सामूहिक प्रयास से मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण बना हुआ है। नाथनगर और आसपास के इलाकों में भी नवरात्र को लेकर उत्साह चरम पर है। विभिन्न स्थानों पर मां दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। हर तरफ पूजा-अर्चना, भजन, जयकारे और धार्मिक आयोजनों की धूम है। लेकिन सुजापुर के दुर्गा मंदिर की पहचान उसकी डेढ़ सौ साल पुरानी विरासत और बंगाली परंपरा के कारण अलग दिखाई देती है। आस्था की विरासत, जो पीढ़ियों तक रहेगी जीवंत सुजापुर का ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर इस बात का प्रतीक है कि परंपराएं केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर नहीं रह जातीं, बल्कि जब समाज उन्हें श्रद्धा से अपनाता है, तो वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बनी रहती हैं। करीब डेढ़ सौ वर्षों से मां दुर्गा की आराधना, बंगाली रीति-रिवाज से पूजा, सप्तमी पर कौड़ी लुटाने की परंपरा और कंधे पर प्रतिमा विसर्जन की प्रथा इस मंदिर को विशिष्ट बनाती है। मां के दरबार में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह आस्था, विश्वास और आध्यात्मिक शांति का केंद्र है। यहां हर जयकारे में भक्ति है, हर पूजा में समर्पण है और हर परंपरा में पूर्वजों की विरासत की झलक है। भागलपुर में शारदीय नवरात्र के दौरान भक्ति का माहौल है। नाथनगर प्रखंड के घोसी टोला स्थित सुजापुर दुर्गा मंदिर में करीब 150 साल पुरानी परंपरा निभाई जा रही है। यहां मां दुर्गा की पूजा बंगाली रीति-रिवाज और पारंपरिक विधि-विधान से होती है। सप्तमी पूजा के अवसर पर मंदिर के पट खुलते ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। भक्त मां के दर्शन और आशीर्वाद पाने के लिए पहुंचे। मंदिर परिसर मां के जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। यह मंदिर सिर्फ पूजा का केंद्र नहीं, बल्कि डेढ़ शताब्दी से चली आ रही धार्मिक परंपरा और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक भी है। यहां सांस्कृतिक विरासत आज भी जीवंत है। सप्तमी पर कौड़ी लुटाने की अनूठी परंपरा सुजापुर दुर्गा मंदिर में सप्तमी के दिन कौड़ी लुटाने की विशेष परंपरा निभाई गई। इस दौरान श्रद्धालुओं में खास उत्साह देखने को मिला। भक्तों के बीच कौड़ी पाने को लेकर उमंग और उल्लास का माहौल रहा। स्थानीय मान्यता के अनुसार, कौड़ी को धन-समृद्धि, सौभाग्य और शुभता का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि मां के दरबार में कौड़ी प्राप्त करने को श्रद्धालु विशेष आशीर्वाद के रूप में देखते हैं। भक्तों के लिए यह केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि मां दुर्गा के प्रति उनकी अटूट आस्था और विश्वास से जुड़ी परंपरा है। इसके साथ ही मंदिर में डलिया लुटाने की परंपरा भी निभाई गई। इन पारंपरिक आयोजनों के दौरान श्रद्धालुओं की भागीदारी ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया।
कौड़ी और डलिया लुटाने की परंपरा सुजापुर की धार्मिक पहचान का अहम हिस्सा है। वर्षों से चली आ रही इन परंपराओं को आज भी पूरे श्रद्धाभाव से निभाया जाना इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक समय में भी लोक आस्था की जड़ें कितनी गहरी हैं। सुजापुर दुर्गा स्थान का इतिहास करीब डेढ़ सौ वर्ष पुराना बताया जाता है। यहां बंगाली रीति-रिवाज के अनुसार मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा समिति के अध्यक्ष ने बताया कि मंदिर में वर्षों से चली आ रही परंपराओं का निर्वहन पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यहां के मेढ़पति राजेश मोहन घोष और उनकी पत्नी पूनम घोष के साथ समाज के लोगों के सहयोग से पूजा का भव्य आयोजन किया जाता है। इस आयोजन में स्थानीय लोगों की भागीदारी मंदिर की परंपरा को और मजबूत बनाती है। मां दुर्गा की आराधना के दौरान बंगाली विधि-विधान, पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान और विशेष रस्मों का पालन किया जाता है। इन परंपराओं के कारण सुजापुर का दुर्गा मंदिर नाथनगर ही नहीं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यहां की पूजा में धार्मिक आस्था के साथ बंगाली संस्कृति की झलक भी दिखाई देती है। यही वजह है कि हर साल नवरात्र के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता है। मेढ़पति राजेश मोहन घोष ने बताया मां के आगमन और विसर्जन का विधान मंदिर के मेढ़पति राजेश मोहन घोष ने बताया कि उनके यहां सदियों पुरानी बंगाली परंपरा के अनुसार पारंपरिक तरीके से पूजा-पाठ होता आ रहा है। मां भगवती की आराधना से लेकर प्रतिमा स्थापना और विसर्जन तक प्रत्येक धार्मिक विधान का पालन पूरी श्रद्धा के साथ किया जाता है। उन्होंने बताया कि यहां मां भगवती के स्वरूप और उनके आगमन से जुड़ी पारंपरिक मान्यताएं भी विशेष महत्व रखती हैं। स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार, मां भगवती शाखा धारण कर, दर्शन देकर और अपने दसों हाथों के दिव्य स्वरूप के साथ गंगा से आने की मान्यता से जुड़ी हैं। इसी मान्यता और परंपरा के अनुरूप मां की स्थापना की जाती है। राजेश मोहन घोष ने कहा कि पूजा के दौरान बंगाली रीति-रिवाजों और नियम-धर्म का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसमें पूजा समिति के पदाधिकारियों, स्थानीय लोगों और पूरे समाज का सहयोग मिलता है। सामूहिक सहभागिता से यह धार्मिक आयोजन श्रद्धा, सद्भाव और उल्लास के साथ संपन्न होता है। उन्होंने यह भी बताया कि मां की प्रतिमा का विसर्जन चंपा नदी में किया जाता है। विसर्जन की यह परंपरा भी मंदिर की धार्मिक पहचान से जुड़ी हुई है। कंधे पर मां की विदाई, 21 तारीख को निकलेगी विसर्जन यात्रा सुजापुर दुर्गा मंदिर में मां की आराधना के साथ विसर्जन की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। पूजा समिति के अनुसार, 21 तारीख को बंगाली परंपरा के अनुसार मां दुर्गा की प्रतिमा का कंधे पर विसर्जन किया जाएगा।
परंपरागत तरीके से मां को विदाई देने का यह आयोजन श्रद्धालुओं के लिए भावुक और विशेष महत्व रखने वाला होता है। मां के आगमन पर जहां भक्तों के चेहरे खिल उठते हैं, वहीं विसर्जन के समय भक्तिभाव के साथ विदाई देने की परंपरा निभाई जाती है। इसके अलावा, 22 तारीख को घोसी टोला के पास विसर्जन शिविर लगाया जाएगा। यहां रोशनी और ध्वनि व्यवस्था की तैयारी की जाएगी। आयोजन के दौरान जिलाधिकारी सहित प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी भी प्रस्तावित बताई गई है, ताकि विसर्जन से संबंधित व्यवस्थाएं सुचारु रूप से संचालित हो सकें। पूजा समिति और स्थानीय समाज की ओर से आयोजन को शांतिपूर्ण तथा व्यवस्थित तरीके से संपन्न कराने की तैयारी की जा रही है। प्रशासन और समाज का सहयोग, सद्भाव की मिसाल बना आयोजन सुजापुर के ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर में पूजा का आयोजन धार्मिक परंपरा के साथ सामाजिक एकजुटता का भी उदाहरण प्रस्तुत करता है। पूजा समिति के पदाधिकारी, मेढ़पति परिवार और स्थानीय लोग मिलकर आयोजन को भव्य बनाने में योगदान देते हैं। प्रशासन की ओर से मिलने वाला सहयोग भी आयोजन की व्यवस्थाओं को सुचारु बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। श्रद्धालुओं की भागीदारी और सामूहिक प्रयास से मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण बना हुआ है। नाथनगर और आसपास के इलाकों में भी नवरात्र को लेकर उत्साह चरम पर है। विभिन्न स्थानों पर मां दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। हर तरफ पूजा-अर्चना, भजन, जयकारे और धार्मिक आयोजनों की धूम है। लेकिन सुजापुर के दुर्गा मंदिर की पहचान उसकी डेढ़ सौ साल पुरानी विरासत और बंगाली परंपरा के कारण अलग दिखाई देती है। आस्था की विरासत, जो पीढ़ियों तक रहेगी जीवंत सुजापुर का ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर इस बात का प्रतीक है कि परंपराएं केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर नहीं रह जातीं, बल्कि जब समाज उन्हें श्रद्धा से अपनाता है, तो वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बनी रहती हैं। करीब डेढ़ सौ वर्षों से मां दुर्गा की आराधना, बंगाली रीति-रिवाज से पूजा, सप्तमी पर कौड़ी लुटाने की परंपरा और कंधे पर प्रतिमा विसर्जन की प्रथा इस मंदिर को विशिष्ट बनाती है। मां के दरबार में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह आस्था, विश्वास और आध्यात्मिक शांति का केंद्र है। यहां हर जयकारे में भक्ति है, हर पूजा में समर्पण है और हर परंपरा में पूर्वजों की विरासत की झलक है।

